May 26, 2017

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ज्ञान की सीमा

यह पिछले महीने की बात है जब प्रदीप रेलवे में नौकरी के लिए परीक्षा देने लखनऊ गया था। इस परीक्षा के लिए उसने रात-दिन किताबों में खुद को समेटे रखा। तैयारी के दौरान वह बाजार से प्रतियोगी परीक्षा के लिए मिलने वाली किताबों को पढ़ता रहता और सूचनाओं को रटता रहता।

Author February 28, 2017 05:55 am
यह पिछले महीने की बात है जब प्रदीप रेलवे में नौकरी के लिए परीक्षा देने लखनऊ गया था। इस परीक्षा के लिए उसने रात-दिन किताबों में खुद को समेटे रखा। तैयारी के दौरान वह बाजार से प्रतियोगी परीक्षा के लिए मिलने वाली किताबों को पढ़ता रहता और सूचनाओं को रटता रहता।

रजनी

यह पिछले महीने की बात है जब प्रदीप रेलवे में नौकरी के लिए परीक्षा देने लखनऊ गया था। इस परीक्षा के लिए उसने रात-दिन किताबों में खुद को समेटे रखा। तैयारी के दौरान वह बाजार से प्रतियोगी परीक्षा के लिए मिलने वाली किताबों को पढ़ता रहता और सूचनाओं को रटता रहता। जब भी किताबों से दूर होता तो किताबों से रटी सामान्य जानकारी का परीक्षण किया करता। इस परीक्षण के लिए वह मुझे और मेरी छोटी बहन को पकड़ता और पूछता कि बताओ ‘भैंस संरक्षण अभयारण’ कहां है? भिंडी में फलां कमी की वजह से फलां रोग होता है, बताओ उस रोग का क्या नाम है? ऐसे सवालों पर मैं उससे कहती कि तुम यह सब कहां से पढ़ते रहते हो पूरे दिन, तो वह झुंझलाहट में कहता कि क्लर्क की नौकरियों की परीक्षा में लिखने के लिए यह सब रटना पड़ता हैं, परीक्षा में यही सब पूछते हैं! जबकि नौकरी मिल जाने के बाद हमारे पास फाइल संभालना और कंप्यूटर पर काम करना होगा तब किसको यह जानने की जरूरत पड़ेगी कि मुझे भिंडी में पाई जाने वाली बीमारी के बारे में पता है कि नहीं। कुछ समय पहले इसी तरह के एक और वाकये से रूबरू हुई। एक दिन दूरदराज के गांव से एक दीदी हमारे पास आर्इं। उन्होंने मेरी बहन से पूछा कि तुम अब क्या कर रही हो; तुम्हारी पढ़ाई पूरी हो गई? बहन ने कहा कि पढ़ाई तो पूरी हो गई लेकिन अब नौकरी के लिए पढ़ रही हूं। मैंने भी यह जवाब सुना और खयाल आया कि यह कितनी विचित्र बात है… पढ़ने के लिए पढ़ना और नौकरी के लिए पढ़ना। हमारी व्यवस्था ने शिक्षा ग्रहण करने की प्रक्रिया को भी दो हिस्सों में बांट दिया है। इसलिए बहुत बड़ी संख्या में स्कूल और कॉलेज के बाद छात्र-छात्राएं कोचिंग सेंटर का रुख करते हुए दिखाई देते हैं।

स्कूल या कॉलेज की पढ़ाई तो परीक्षा पास करने तक की होती है और वह एक तरह से डिग्री-डिप्लोमा प्राप्त करने के लिए ही होती है। जीवन-यापन की दौड़ में और बेहतर नौकरी पाने के लिए संघर्ष बच जाता है जो आजकल हर गली-नुक्कड़ पर खुले सौ प्रतिशत सरकारी नौकरी दिलाने का वादा’ करने वाले कोचिंग सेंटर में जाकर ही पूरा होता है या कई बार अधूरा रह जाता है। हर सुबह युवा विद्यार्थियों को पीठ पर किसी-किसी कोचिंग सेंटर का बैग टांगे देखती हूं और सोचती हूं कि व्यवस्था ने इन युवाओं के जीवन के साथ कितना बड़ा संघर्ष जोड़ दिया है। कैसी विडंबना है कि स्कूल में मिलने वाले ज्ञान और नौकरियों के लिए दिए जाने वाला ज्ञान अलग-अलग हो गए हैं। किसी को ठहर के यह सोचने की फुर्सत नहीं है कि ज्ञान के ये दो भाग कब और कैसे बन गए! हमारे स्कूल-कॉलेज में शिक्षा की क्या गुणवत्ता रह गई है जो अपने विद्यार्थियों को यह विश्वास ही नहीं दिला पा रही है कि उन्होंने जो यहां पढ़ा, लिखा या समझा वह उन्हें जीवन जीने के लिए सक्षम बना सकता है।

क्यों हमारी शिक्षा व्यवस्था अपने विद्यार्थियों को यह विश्वास नहीं दिला पाती कि शिक्षा खुद में छिपी प्रतिभा को जानने, दुनिया को समझने का एक सशक्त माध्यम भी है। लगातार स्कूल और कॉलेजों में एक ऐसे विचार को प्रोत्साहित किया जा रहा है, जिसमें केवल दूसरे से आगे निकलने की प्रतियोगिता है और सूचनाओं को अधिक से अधिक रट लेना है। क्यों ऐसा होता है कि स्कूल में समझा गया ज्ञान किसी व्यक्ति को नौकरी नहीं दिला पाता? क्या मसला सिर्फ ज्ञान को जानने का ही है या उससे भी कहीं आगे है?
पिछले दशकों में देखे तो युवा बेरोजगारी तेजी से बढ़ी है और सरकारी नौकरियां पाने के अवसर भी लगातर घटे हैं। इसलिए किसी भी सरकारी नौकरी को पा लेने की जुगत अब और भी मुश्किल हो गई है। साथ ही अगर हम सरकारी नौकरियों के चयन की प्रक्रिया को देखें तो पाएंगे कि कुछ एक नौकरियों को छोड़ दिया जाए तो नौकरियों के चयन के लिए जो प्रतियोगी परीक्षाएं ली जाती हैं, वे अधिकतर तथ्यात्मक सूचनाओं पर आधारित होती हैं। वहां समझ को परखने के अवसर नाममात्र के लिए ही होते हैं। ऐसे में ज्ञान के दो वर्ग बन जाते हैं- एक ज्ञान जानने के लिए होता है और दूसरा ज्ञान नौकरी पाने लिए सूचनापरक रटा हुआ ज्ञान। ज्ञान के इन दोनों वर्गों में कोई संबंध नहीं रह पाता। शायद इसलिए युवा मन यही सोच कर कुंद होता रहता कि क्लर्क की नौकरी में सब्जियों में पाई जाने वाली बीमारियों से संबंधित ज्ञान का क्या महत्त्व है!

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First Published on February 28, 2017 5:55 am

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