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दुनिया मेरे आगे- सहयोग का समाज

लोगों ने इसे न सिर्फ महिला बनाम पुरुष का सवाल बना दिया, बल्कि इस बहाने औरत की शारीरिक क्षमता पर भी सवाल खड़े करने शुरू कर दिए। छुट्टी न देने के पीछे ऐसे लोगों की दलील है कि इससे समाज में यह संदेश जाएगा कि औरतें शारीरिक रूप से कमजोर होती हैं। यह तर्क देने वाले यहीं नहीं रुके।
Author August 9, 2017 05:39 am
इस तस्वीर का इस्तेमाल केवल प्रतीक के तौर पर किया गया है। (Source: Express Archives)

स्नेहा

हाल ही में केरल में एक मीडिया संगठन ने माहवारी के दौरान महिलाओं को एक दिन की छुट्टी देने की घोषणा की है। जब मैं अपने काम के दौरान यह खबर देख रही थी तब मन में आया कि सारे संस्थानों को एक बार इस विषय पर जरूर गौर फरमाना चाहिए। मेरे मन में तब बिल्कुल भी यह खयाल नहीं आया था कि इस छुट्टी को लोग महिला बनाम पुरुष का मुद्दा बना डालेंगे। लेकिन मैं गलत थी! लोगों ने इसे न सिर्फ महिला बनाम पुरुष का सवाल बना दिया, बल्कि इस बहाने औरत की शारीरिक क्षमता पर भी सवाल खड़े करने शुरू कर दिए। छुट्टी न देने के पीछे ऐसे लोगों की दलील है कि इससे समाज में यह संदेश जाएगा कि औरतें शारीरिक रूप से कमजोर होती हैं। यह तर्क देने वाले यहीं नहीं रुके। उन्होंने यहां तक कह दिया कि इस छुट्टी का गलत फायदा भी उठाया जा सकता है। पहली बात तो यह है कि मासिक धर्म का औरत की शारीरिक क्षमता से क्या लेना-देना हो सकता है, इसके बारे में काफी कुछ लिखा जा चुका है और जिन्हें वाकई इस मसले पर ठीक से समझना होगा, वे पढ़ लेंगे। लेकिन अगर किसी को अब भी लगता है कि औरतें नियमित रूप से अपनी शारीरिक और मानसिक क्षमता की अग्निपरीक्षा देती रहें तो फिर रहने दिया जाए। औरतों को अब अपनी शारीरिक और मानसिक क्षमता को लेकर कुछ भी साबित करने की जरूरत नहीं रह गई है। इसलिए यह चुनौती देना बंद कर दिया जाना चाहिए कि तुम फलां काम नहीं कर सकती। यह समय अब बीत चुका है।

पत्रकारिता के क्षेत्र में ही काम करते हुए या दूसरे क्षेत्र में काम करने वाली महिलाओं, स्कूल जाने वाली लड़कियों, घर में मम्मी-चाची से बात करते हुए यह पता है कि मासिक धर्म के दौरान हर स्त्री का शरीर अलग-अलग तरीके से काम करता है। हर स्त्री के पास इसे लेकर अलग-अलग तरह की परेशानियां हैं। उनमें से कई ऐसी भी होती हैं, जिन्हें इससे संबंधित कोई परेशानी नहीं होती। लेकिन ऐसी भी तमाम महिलाएं या लड़कियां हैं, जिन्हें इससे समस्या होती है और वे कहीं नौकरी भी कर रही होती हैं। ऐसे में संबंधित संस्थान का दायित्व होता है कि वह अपने कर्मचारियों की शारीरिक स्थिति और उसमें होने वाली सुविधा-असुविधा का खयाल रखे। इसी दायित्व बोध की वजह से कुछ संस्थान माहवारी को ध्यान में रख कर एक दिन की छुट्टी की पेशकश लेकर आ रहे हैं।यों बिहार में सरकारी कार्यालयों में महिलाओं को महीने में दो दिनों का विशेष अवकाश मिलता है, ताकि वे माहवारी के दौरान अपनी सेहत और सुविधा-असुविधा का खयाल रख सकें। एक सभ्य समाज में इस पहल का विरोध करने के बजाय स्वागत होना चाहिए। दूसरी ओर, हकीकत यह है कि ऐसे बहुत सारे संस्थानों में गर्भवती महिलाओं के लिए कोई ऐसी जगह नहीं होती है, जहां जाकर वे थोड़ी देर आराम कर सकें। अगर कुछ संस्थानों में महिलाओं को इस तरह की सुविधा दी जाती है तो वहां इसे महिला बनाम पुरुष का सवाल बना कर बंद कर दिया जाता है। मैंने इस तरह के कक्ष को कुछ पुरुषों के विरोध की वजह से बंद होते देखा है।

सन 2014 में दिल्ली के विज्ञान भवन में आयोजित ‘विमेन इन मीडिया’ विषय पर हुई बातचीत के दौरान कई वरिष्ठ महिला पत्रकारों ने बताया था कि वर्षों के संघर्ष के बाद उनके दफ्तरों में महिलाओं के लिए अलग वॉशरूम की व्यवस्था हुई। उनकी यह मांग कई लोगों को उस समय भी जायज नहीं लग रही थी। लेकिन दो साल पहले एक जगह नौकरी की शुरुआत करने के दौरान मुझे समस्या का सामना करना पड़ा था। यही नहीं, ज्यादातर संस्थानों के भीतर सैनिटरी नैपकिन खरीदने या मिलने की कोई सुविधा उपलब्ध नहीं है, ताकि अचानक जरूरत पड़ने पर उसका उपयोग किया जा सके। हो सकता है कि हममें से कई लोगों को यह मांग बेकार लगे, लेकिन जिन्होंने इस स्थिति की असुविधा को झेला है, वे समझ सकती हैं कि यह कितनी जरूरी चीज है। यह बहुत छोटी-सी लेकिन जायज मांग है और सभी दफ्तरों और संगठनों में सैनिटरी नैपकिन खरीदने या मिलने की सुविधा उपलब्ध होनी चाहिए।
ये बहुत ही छोटी-छोटी जरूरतें हैं। इन्हें पूरा करने के लिए हमें आपसी सहयोग की जरूरत है, न कि विरोध की। इसमें विरोध करने जैसी कोई चीज है भी नहीं। अच्छा होगा कि इन सारी चीजों को हमारा समाज और संगठन किसी की शारीरिक क्षमता पर सवाल खड़े करने के बजाय एक प्राकृतिक शारीरिक प्रक्रिया के तौर पर समझने का प्रयास करे और लोगों में इसके प्रति जागरूकता फैलाए। हमारे देश में माहवारी केवल एक वर्ज्य विषय नहीं है, बल्कि बहुत सारे पुरुषों के आज भी लिए रहस्य है, क्योंकि इस बारे में बात करना नैतिकता और लोकाचार का उल्लंघन लगता है। इससे जुड़े सारे भ्रम इसी अज्ञान से पैदा होते हैं।

 

 

 

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