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सीखने के पड़ाव

शिक्षकों की ‘हतई’ यानी चौपाल, जहां कुछ दिन पहले सुबह से ही शिक्षक एकत्र हो गए थे।
Author December 27, 2016 02:24 am
प्रतिकात्मक तस्वीर।

कालू राम शर्मा

शिक्षकों की ‘हतई’ यानी चौपाल, जहां कुछ दिन पहले सुबह से ही शिक्षक एकत्र हो गए थे। उस दिन आम कर्मचारी अमूमन अवकाश के मूड में होते हैं, मगर मझोले आकार के शहर के एक शैक्षिक संस्थान में शिक्षक एकत्र होकर शिक्षा के मसलों पर विमर्श कर रहे थे। शिक्षकोें ने मिल कर एक ऐसी मिसाल रची जो समस्त शिक्षक समाज के लिए प्रेरणा और हौसलाअफजाई का विषय बनी। बहुत हो गया अब यह नारा कि ‘शिक्षा बेहाल और शिक्षक बदहाल’। शिक्षक से ही शिक्षा का वास्ता है। कहा जाता है कि किसी भी समाज का स्तर शिक्षक के स्तर से ऊंचा नहीं उठ सकता। शिक्षक ही है जो बच्चों को ‘भविष्य के नागरिक’ के लिए तैयार करता है। यह सही है कि भारत में स्कूली शिक्षा की दशा बेहतर नहीं है। लेकिन अगर हम-आप नकारात्मक बयानबाजी को पकड़ कर बैठे रहेंगे तो आगे तो हरगिज नहीं बढ़ पाएंगे। शिक्षक हतई एक ऐसी ही कोशिश है जहां शिक्षक अपनी तमाम समस्याओं को तज कर विमर्श के लिए आगे आए कि गुणवत्तापूर्ण शिक्षा को मजबूत करने के लिए किस प्रकार हम अपने लिए समर्थन तंत्र को विकसित करे। दरअसल, सरकारी स्कूली शिक्षा तंत्र में जो कुछ बेहतर होता है वह नकारात्मकता की धुंध में दिखाई ही नहीं देता। लेकिन वहां शिक्षकों ने सािबत किया कि वे चाहते हैं कि स्कूली शिक्षा को बेहतर बनाने में उनकी भूमिका अहम हो।

पश्चिमी निमाड़ का खरगोन जिला ग्रामीण भारत का प्रतिनिधित्व करता है। यह इलाका आदिवासी बहुल है जहां आज भी लोग पारंपरिक रूप से जीते हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में आम लोगों के विमर्श के लिए या कहें कि सुस्ताने की सामूहिक जगह होती है। इसे हतई के नाम से जाना जाता है। शिक्षक हतई से आशय है जहां शिक्षक अपने शिक्षकीय पेशे को लेकर विमर्श करते हैं। तो उस दिन मध्यप्रदेश में खरगोन जिले में लगभग ढाई सौ शिक्षक एकत्र हुए थे। पड़ोसी विकास खंडों के शिक्षक भी इसमें शामिल थे, जिन्होंने यहां बिना किसी आदेश के शिरकत की। वहां विभिन्न विषयों के स्टॉल थे जहां शिक्षकों ने अपना वक्त बिताया और उन अवधारणाओं पर काम किया जो अमूमन वे अपनी कक्षाओं में बच्चों के साथ करते हैं। एक स्टॉल शैक्षिक किताबों का बनाया गया जहां शिक्षकों की शैक्षिक तैयारी के लिए पढ़ने वाली किताबें रखी गई थीं।अक्सर शैक्षिक आयोजनों में शिक्षक एक निमित्त भागीदार के रूप में शामिल होता है। शिक्षक की आंखों पर आखिरी दम तक पर्दा पड़ा रहता है और उसे भनक तक नहीं लगती कि उनके लिए आयोजित किए जाने वाले कार्यक्रम में क्या होने वाला है। इसके उलट शिक्षक हतई की संकल्पना से लगा कर आयोजन की समस्त, व्यवस्थागत और शैक्षिक तैयारी में शिक्षक शामिल हुए। शिक्षक दिन में अपने स्कूल जाते, शाम के वक्त मिलते और शिक्षक हतई की तैयारी करते। कोई दबाव नहीं। उल्लेखनीय है कि शिक्षकों के साथ पिछले सालों से काम करते हुए मेरा यह अहसास और दृढ़ होता जा रहा है कि शिक्षक बेहतर करना चाहते हैं। अगर शिक्षक किसी प्रशिक्षण में दिलचस्पी नहीं लेते तो इसमें उनका दोष कम है। क्या हमें एक अलग नजरिए से नहीं सोचना चाहिए? मुझे लगता है कि यह उस प्रशिक्षण की विफलता है जो शिक्षकों को बांधकर नहीं रख पाता या उनकी समस्याओं को हल करने में बाधक बनता है। अब तक ऐसे तमाम उदाहरण सामने आए हैं, जहां शिक्षक शैक्षिक सरोकारों में बढ़-चढ़ कर हिस्सा लेते हुए दिखे हैं।

ये वे शिक्षक थे जो पिछले कुछ महीनों से किसी न किसी तरह से शैक्षिक कार्यशालाओं में सक्रिय रूप से भागीदारी करते आए हैं, जिनका मकसद विषयगत मामलों में समझ बनाना और उसे कक्षाओं में प्रतिबिंबित करना रहा है। शिक्षक हतई एक ऐसा विचार बन गया जो शिक्षकों को आगे भी एक सूत्र में बांधे रख कर उनकी ऊर्जा और उमंग को सहेज कर आगे शैक्षिक विमर्श के रास्ते खोजने का मार्ग प्रशस्त करेगा। शिक्षकों के मनोबल को ऊंचा उठाने के लिए इस प्रकार के प्रयास होने चाहिए। यह प्रयास स्थानीय ठेठ गांव से लेकर राष्ट्रीय स्तर पर होने चाहिए। नीतियों में भी शिक्षकों के उत्थान के लिए ठोस कदम उठाने की अनुशंसाए की गई हैं। शिक्षण के काम के लिए जरूरी है कि शिक्षक स्वैच्छिक रूप से आगे आएं और इस चिंतन को आगे बढ़ाएं कि शिक्षा में कैसे और बेहतर किया जा सकता है। शिक्षक-शिक्षा के लिए बनाई गई ‘एनसीएफटीई’ अनुशंसा करती है कि शिक्षक समुदाय को आपास में अपने अनुभव साझा करने का अवसर मिले, ताकि व्यक्तिगत अनुभवों और नवाचारों की सहायता से एक मजबूत साझा पेशेवर आधार का निर्माण हो। एनसीएफटीई कहती है कि शिक्षक काफी हद तक अपने कार्यों से सरकारी शिक्षा व्यवस्था में फैले इस निराशा के वातावरण को तोड़ कर समाज में इसके प्रति सकारात्मक ऊर्जा का संचार पैदा कर सकता है। शिक्षा में काम करने वाले लोगों के लिए यह और भी आवश्यक है कि वे निरंतर अपनी समझ और ज्ञान को परिष्कृत करते रहें और नया सीखते रहें।

 

 

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