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भोज बनाम भूख

कुछ समय पहले जब एक जुमला जैसा सुना कि ‘थोड़ा पेट खाली, थोड़ी प्लेट खाली’ तो अच्छा लगा। यह एक गहरी बात है।
Author April 10, 2017 05:03 am
हमारे देश की मुख्य समस्याओं में से एक है भुखमरी। (Source: Reuters)

हेमंत कुमार पारीक

कुछ समय पहले जब एक जुमला जैसा सुना कि ‘थोड़ा पेट खाली, थोड़ी प्लेट खाली’ तो अच्छा लगा। यह एक गहरी बात है। इसमें भुखमरी जैसी समस्या को जड़ से पकड़ा गया, जिसका हमें बिल्कुल भान नहीं रहता। आजकल शादी-ब्याह में ‘बुफे’ का चलन है। पहले दोना-पत्तल चलते थे और पंगत लगती थी। एक कतार में बैठे लोग एक साथ भोजन करते थे। धीरे-धीरे बुफे का चलन आया और अब हर जगह वही दिखाई देता है। बुफे में खाने का उद्देश्य है कि जितना जरूरी है, उतना ही भोजन लिया जाए। लेकिन हकीकत में ऐसा दिखाई नहीं देता। नब्बे प्रतिशत लोग प्लेट को इस तरह भर लेते हैं कि उसमें कोई जगह ही नहीं बचती। यही स्थिति दोना और पत्तल के साथ होती थी। पर इतनी जूठन नहीं बचती थी जितनी बुफे सिस्टम में लोग छोड़ते हैं। दोना-पत्तल वाली व्यवस्था में खाना परोसने वाले लोग होते थे और यहां खुद पर निर्भर करता है कि कितनी मात्रा में खाना लिया जाए और क्या-क्या लिया जाए। पेट को स्वेटर समझें, न कि कोट!

हाल ही में एक रिपोर्ट पढ़ी थी कि हमारे देश में शादी-विवाह, भंडारे और जन्मदिन या गृह-प्रवेश जैसे आयोजनों में कुल मिला कर हर साल करोड़ों रुपए का खाना जूठन के रूप में बर्बाद होता है। इस बर्बाद कर दिए खाने से हजारों लोगों की भूख शांत हो सकती है। हमारे पड़ोसी देश पाकिस्तान में सरकार ने इस बर्बादी से बचने के लिए कई तरह की पाबंदियां लगा रखी हैं। इसका लेखा-जोखा सरकार को देना जरूरी है। यह एक अच्छी पहल है। लेकिन हमारे देश में आयोजन स्पर्धा का विषय होते हैं। हमारे प्रतिद्वंद्वी ने स्वागत-भोज कहां दिया, तीन या पांच सितारा होटल में! भोजन की सूची में क्या-क्या था, कितने स्टॉल थे और कितने लोगों को बुलाया था, वगैरह। दरअसल, आयोजनों को यादगार बनाने की कवायद में पैसा पानी की तरह बहाया जाता है।  ऐसी ही एक शादी का निमंत्रण मुझे मिला था। निमंत्रण पत्र देखते ही शादी की भव्यता का अहसास हुआ। वह शादी यादगार रही। कई स्टॉल थे। मसलन, राजस्थानी, पंजाबी, गुजराती, मराठी और दक्षिण भारतीय! कहीं दाल-बाटी दिख रही थी, कहीं मक्के की रोटी और सरसों का साग, कहीं इडली-डोसा, कटलेट और कहीं पावभाजी या नूडल्स! भीड़ बहुत थी। लगभग दो-तीन हजार लोगों को बुलाया गया था स्वागत-भोज में। रईस घर की लड़की की शादी थी। लेकिन पेट तो पेट होता है! लोगों ने इस तरह प्लेट भर रखी थी कि कहीं कोई खाली स्थान ही नजर नहीं आ रहा था। थोड़ा खाया और बाकी छोड़ दिया। क्या मेजबान के लिए इतना निर्मम हो सकता है मेहमान? अगली सुबह बर्बाद खाने के ढेर देखने को मिले। अगर यही खाना भूखे आदमी के पेट में जाता तो? आज स्थिति यह है कि देश की एक बड़ी जनसंख्या भूखे पेट सोती है।

इन प्लेट और पत्तलों की जूठन देख एक पुराना वाकया याद आया। तब मेरी उम्र दस-ग्यारह वर्ष रही होगी। हमारे मकान में एक व्यवसायी किराए पर रहता था। वहीं आवास था और वहीं किराने की दुकान चलाता था। उसका नियम था कि वह सिर्फ एक वक्त भोजन करता था। लोग उसे कंजूस और मक्खी-चूस कहते थे। उन्हीं में मैं भी शामिल था। उसकी कंजूसी के किस्से थे। एक दोपहर मैंने देखा कि वह खाना खा रहा है। उसकी प्लेट में थोड़ी दाल, थोड़े चावल, अचार की एक फांक और एक फुलका यानी ताजा रोटी रखी थी। बीच-बीच में वह अपनी पत्नी को आवाज देता- ‘आधी रोटी!’ पत्नी आधी रोटी लेकर आती। आधी रोटी देख कर मुझे आश्चर्य होता। मैं वहां कुछ पूछ तो नहीं सकता था, लेकिन देख जरूर रहा था। आराम से खाना खत्म किया उसने। पानी पिया और बचा हुआ पानी प्लेट में डाल कर प्लेट हिलाई और पी गया। अगले पल अंगूठे से प्लेट साफ की। फिर पानी डाला और पी गया। अंत में प्लेट झकाझक साफ थी। अन्न का एक कण भी शेष नहीं बचा था। उसके इस कृत्य पर मेरी हंसी छूट गई। उसने मुझे घूर कर देखा। लेकिन खुद को नियंत्रित कर सहजता से बोला- ‘बेटा अन्न है… देवता समान होता है। इसे बर्बाद नहीं करना चाहिए। तुम भी खयाल रखना।’ उस वक्त मैंने उसकी बात पर ध्यान नहीं दिया। लेकिन अब सोचता हूं तो लगता है वाकई वह कितना मितव्ययी और दूरदर्शी था।आज हमारे देश में अन्न के भंडार हैं। वेयर हाउस और गोदाम अनाज से भरे हुए हैं। इसके बावजूद हर साल बारिश के मौसम में सुनाई पड़ता है कि पानी जमा होने से हजारों क्विंटल अनाज सड़ गया। अब सोचिए कि हम और हमारा तंत्र कितना गैर-जिम्मेदार और संवेदनहीन है। इधर अन्न सड़ रहा है और उधर बहुत सारे लोग भूखे पेट सोने पर मजबूर हैं!

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