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मनमानी का इलाज

एक अनुमान के मुताबिक भारत में तीन क रोड़ से ज्यादा दिल के मरीज हैं।
Author March 1, 2017 06:53 am
कम पढ़े-लिखे लोगों को दिल का दौरा पड़ने के चांस पढ़े लिखों की तुलना में ज्यादा होता है।

संदीप जोशी

महात्मा गांधी ने ‘हिंद स्वराज’ में डॉक्टरी के पेशे को लेकर सबको आगाह कर दिया था। लेकिन आज चिकित्सा पेशे और स्वास्थ्य के समूचे तंत्र की जो हालत है, उसे देखते हुए यह कहना मुश्किल होजाता है कि इस पेशे को कि इसे बुनियाद पर जन-कल्याण का कोई काम माना जाए! एक अनुमान के मुताबिक भारत में तीन क रोड़ से ज्यादा दिल के मरीज हैं। अध्ययनों में यह बात सामने आ चुकी है कि हर साल लाखों लोग दिल की धड़कन रुक जानेया दिल का दौरा पड़ने से मर जाते हैं। देश में हरसाल दिल की धमनियों को खोलने के दो लाख ऑपरेशन होते हैं। इन धमनियों को खोलने के लिएलगने वाले ‘स्टेंट’ आज आवश्यक हो गए हैं। बल्कि यों क हें कि ‘स्टेंट’ क ी जरू रत ने देश मेंअसाधारण स्थिति पैदा क र दी है। अब यह क ौननहीं जानता-समझता कि दिल के चलने के क ारणही जान है और जान है तो जहान है। मगर सच यहहै कि इस दिल को सहेज क र रखने वाला बाजार आज उदारवादी नहीं रह गया है। यह एक धंधा होचुक ा है और इसमें लगे लोग एक तरह क ी लूटपाटमें लगे हैं। दुखद यह है कि यह सब उसी मानवताके नाम पर हो रहा है, जिसक ी क सम खा क र हममेंसे बहुत लोग डॉक्टरी क ा पेशा शुरू क रते हैं।समय के साथ सामाजिक ता भी बदलती है।बेशक राजनीतिक हलक ों में नेता राज क रने के लिएनीति बनाने में ही लगे रहते हों, मगर सामाजिक ताक्षेत्रों में काम क रने वाले कु छ लोग दूसरों के लिएके वल नसीहत जारी क रने के बजाय खुद समाज क ोसही रास्ता दिखाने और सुधारनेमें लग जाते हैं। समाज टिके गा,तभी राजनीति भी टिक ी रहसक ती है। हरियाणा के बीरेंद्रसांगवान क ो वैसे कु छनेताओं में शुमार कि या जा सक ता है जो अदालत केरास्ते अस्पतालों क ो नैतिक रास्ता दिखाने में लगे हैं।उनक ी पहलक दमी के चलते आज दिल के इलाज क ारास्ता कु छ आसान हो सक ा है।दरअसल, एक हादसे के क ारण हताहत होने केबाद उन्होंने दिल्ली उच्च न्यायालय में जनहितयाचिक ा दायर क ी और अदालत से देश में चल रहेतीन हजार तीन सौ क रोड़ के ‘दिल के व्यापार’ मेंचल रही लूटपाट पर रोक थाम क ी गुहार लगाई।

इसके बाद वे धमनियों क ो खोलने के क ाम में आनेवाले ‘स्टेंट’ के मनमाने दाम पर रोक लगाने क ीमुहिम में लगे। उनक ी क ोशिशों के चलते ही सरक ारक ो मानना पड़ा कि ज्यादातर अस्पताल दिल क ीधमनियों में लगने वाले ‘स्टेंट’ के लिए लागत केमुक ाबले सात सौ से आठ सौ प्रतिशत ज्यादा मुनाफ ाक मा रहे थे। डॉक्टरी क ा जो पेशा आम लोगों केलिए ‘भगवान’ क ी तरह है, उसे आज शुद्ध मुनाफेक ा धंधा बना दिया गया है। हैरानी क ी बात यह थीकि ‘स्टेंट’ के क ारोबार में के वल कु छ अस्पतालशामिल नहीं थे, बल्कि लगभगसमूचे अस्पतालों क ी व्यवस्था‘स्टेंट’ के क ारोबार से बेलगाममुनाफ ा क माने में लगी थी। आधुनिक तक नीक केनाम पर जनता क ो लूटा जा रहा था क ई बार ऐसाभी सामने आया कि जरू रत न होते हुए भीअस्पतालों में मरीजों क ो ‘स्टेंट’ लगा दिए जा रहे थे।उन्होंने सूचना के अधिक ार से जानक ारी हासिलक ी कि राजधानी के चौवन अस्पतालों में धमनियों क ोसाफ क रने के नाम पर जो आॅपरेशन कि ए जाते हैं,उन सभी में ‘स्टेंट’ के दाम लागत से क ई गुना ज्यादावसूले जा रहे थे। बीमारी से डरी जनता क ो लूटा जारहा था। लेकि न जब इस पर उठाए गए सवाल तूलपक ड़ने लगे तब सरक ार क ो बोलना पड़ा। मगरदिसंबर 2014 में सरक ार क ी जो प्रतिक्रि या सामनेआई, उसने सबक ो हैरान कि या। सरक ार ने पूरीगैरजिम्मेदारी के साथ यह माना कि ‘स्टेंट’ दरअसलड्रग एंड क ॉस्मेटिक एक्ट के तहत आते हैं। यानी इन्हेंजीवनरक्षक जरू री यंत्र के बजाय प्रसाधन यंत्र के तौरपर लिया जा रहा था। ‘स्टेंट’ क ो जरू री उपचार क ीसूची में नहीं रखने क ा जिम्मा सरक ार पर रहा है।लेकि न इस सूची में न होने के क ारण ही लूट क ा एकपरोक्ष लाइसेंस अस्पतालों क ो मिलता रहा। मगर जबइस मसले पर आरटीआइ के तहत जानक ारी देने मेंसरक ार ने टालमटोल क ी तब अदालत में अवमाननायाचिक ा दायर हुई और सरक ार से ‘स्टेंट’ के दाम क ोन्यूनतम क रने क ो क हा गया, ताकि अस्पतालों मेंइसके नाम पर लूट क ो रोक ा जा सके । इसके बादसरक ार ने शायद अदालत के डर से जुलाई 2016 मेंसुधार कि या और ‘स्टेंट’ क ो जरू री सूची में जोड़ा।अब हाल ही में दिल्ली उच्च न्यायालय ने माना हैकि ‘स्टेंट’ बेचने वालों से लेक र अस्पतालों औरडॉक्टरों क ी मिलीभगत से व्यापक मुनाफ ाखोरी क ाधंधा जारी था और आम जनता क ो दिल के इलाजके नाम पर लूटा जा रहा था। जाहिर है, जीवन क ा भय दिखा क र चल रही ऐसी लूट पर लगाम लगानेके लिए जिसने समर्पित भाव से क ाम कि

 

 

 

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