December 10, 2016

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दुनिया मेरे आगे: आंसुओं से उभरती मुस्कान

जोहान्सबर्ग के गांधी स्क्वायर को दिखाते हुए हमारी गाड़ी के अश्वेत ड्राइवर की आंखों में अपार श्रद्धा दिखी।

राष्ट्रपिता महात्मा गांधी।

सन 1908 में जोहान्सबर्ग की जिस अदालत में बैरिस्टर मोहनदास करमचंद गांधी को नागरिक अवज्ञा के जुर्म में पहली बार जेल की सजा सुनाई गई थी, उसी के ठीक सामने आज शहर की बहुमंजिली इमारतों के बीच गांधीजी की प्रतिमा खड़ी है। एक काली शिला, जिस पर एक आभारी देश की श्रद्धांजलि अंकित है। जोहान्सबर्ग के गांधी स्क्वायर को दिखाते हुए हमारी गाड़ी के अश्वेत ड्राइवर की आंखों में अपार श्रद्धा दिखी। यह श्रद्धा उस महात्मा के प्रति थी, जिसके बताए मार्ग पर चल कर नेल्सन मंडेला ने दक्षिण अफ्रीका को रंगभेद से मुक्त कराया। मंडेला रंगभेद-नीति के विरुद्ध सविनय अवज्ञा आंदोलन चलाने के जुर्म में सत्ताईस साल जेलों में बंद रहे। इनमें से दो दशक से भी अधिक समय वे रोब्बेन नामक द्वीप पर कैद रहे। केपटाउन में अटलांटिक सागर की लहरों के बीच तट से सात किलोमीटर दूर उभरे हुए इस द्वीप को दूर से ही देख कर हम नतमस्तक हो गए थे। बाद में हमने जोहान्सबर्ग के समृद्ध व्यापारिक इलाके में नेल्सन मंडेला स्क्वायर भी देखा। लेकिन एक और संयोग विचित्र रहा। मैं कहीं भी घूमने के दौरान पढ़ने के लिए कुछ सामग्री साथ जरूर रखता हूं। इस बार साथ गई पुस्तक थी डॉ तुलसीराम की ‘मुर्दहिया’, जिसके हृदयविदारक प्रसंगों को पढ़ते हुए बार-बार आंखें नम हो जाती थीं। यह ‘मुर्दहिया’ मेरे अपने गाजीपुर के निकट ही है। उसे पढ़ते हुए बार-बार अपने पूर्वजों की निर्दयतापूर्ण सोच को लेकर अपराध-भावना सताती रही। लेकिन जैसे ‘मुर्दहिया’ में आंसुओं के बीच कई विनोदपूर्ण प्रसंग भी हैं, उसी तरह कई मनोरंजक प्रसंग हमारे अश्वेत ड्राइवर की रंग-भेद की करुण चर्चा के बीच उभर आते थे। त्वचा के रंग को लेकर जो क्रूरतापूर्ण अपमान उसने बचपन में झेला, उसके अवसाद को दूर करने के लिए विनोद उसके व्यक्तित्व का एक हिस्सा बन गया था।

हिंदी में रंग-भेद शब्द अफ्रीकांस भाषा के अपर्थायड शब्द का अनुवाद है जो खुद ही अंग्रेजी अपार्ट-हुड यानी विलगाव का अपभ्रंश है। 1960 में अल्पसंख्यक गोरों की नेशनलिस्ट पार्टी ने दक्षिण अफ्रीका में त्वचा के रंग के आधार पर विलगाव के लिए नागरिक पंजीकरण का कानून बना कर सारे देशवासियों को काले, गोरे, रंगीन (कलर्ड) और हिंदुस्तानी- चार जातियों में बांट दिया। गोरे नागरिकों के हाथ में सारे नागरिक अधिकार सौंपने के बाद अन्य श्रेणियों को रोजगार, शिक्षा, चिकित्सा सुविधाओं से लेकर जन-सुविधाओं के उपयोग तक में निकृष्ट श्रेणी का जीव बना दिया गया। काली और रंगीन चमड़ी के इंसानों और कुत्तों के बीच कोई विशेष अंतर नहीं बचा। सदियों तक क्रूरता और अपमान झेलते अश्वेतों में अगर विनोदी प्रवृत्ति न रही होती तो शायद वे अपने आंसुओं और जख्मों के बीच कभी के दफ्न हो गए होते। यह विनोदी प्रवृत्ति हमें वहां कई बार देखने को मिली।

मोसेल्स खाड़ी के रमणीक क्षेत्र में एक शुतुरमुर्ग फार्म में हमें शुतुरमुर्ग के चार-पांच किलो भारी अंडे दिखा कर हमें बताया गया कि एक अंडे से दस-बारह लोगों के लिए आॅमलेट बनता है। कई सफेद अंडों के बीच एक काले रंग के अंडे के बारे में पता चला कि वह पुरुष शुतुरमुर्ग का अंडा था। हमारे आश्चर्य का ठिकाना नहीं था, लेकिन हमारे अज्ञान पर दुख प्रकट कर लेने के बाद गाइड ने हंसते हुए बताया कि वह अंडा दरअसल काले रंग से पुता हुआ एक सफेद अंडा ही था। हम कितने भोले थे कि हमने उसकी बात सच मान ली थी। फिर उसने बताया कि अंडे इतने मजबूत थे कि एक औसत वजन का व्यक्ति उन्हें बिना तोड़े उन पर खड़ा हो सकता था। सैलानियों में से एक महिला को इस प्रयोग के लिए आमंत्रित किया गया। वह जैसे ही अंडे पर खड़ी हुई, जोर से धड़ाम की आवाज हुई। बेचारी घबरा गई। गाइड ने हंसते हुए आश्वस्त किया कि उसने एक छिपा हुआ पटाखा बजाया था। अंडा वास्तव में टूटा नहीं था।

केपटाउन के निकट हमने आलूवेरा से प्रसाधन और दवाइयां बनाने की एक बड़ी फैक्ट्री देखी। सौ गज दूर से ही एक तीस-चालीस फुट ऊंचा पेड़ दिखाते हुए ड्राइवर ने बताया कि वह दुनिया का सबसे बड़ा आलूवेरा का पेड़ था। हम आश्चर्यचकित थे, क्योंकि आमतौर पर आलूवेरा का पौधा तीन-चार फुट से ऊंचा नहीं होता। उस विशालकाय पौधे के पास पहुंचने पर ड्राइवर ने वह बोर्ड दिखाया, जिस पर लिखा था ढाई हजार किलो कंक्रीट और प्लास्टिक से वह कई महीनों में बनाया गया था। और फिर ड्राइवर महोदय के मोती जैसे दांत उनके चेहरे पर चमकने लगे।ऐसी सहज विनोदप्रियता के बिना सदियों से गुलामी झेलती और दशकों तक रंगभेद कानून के अपमान और क्रूरता के दंश से डसी जाती अश्वेतों की प्रजाति ही शायद विलुप्त हो गई होती। शायद बालक तुलसीराम के बचपन के विनोदी प्रसंगों ने भी उनकी जिजीविषा को ऐसी ही चट्टानों के बीच खिलते फूल की तरह अंकुरित होने दिया होगा।

 

 

 

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First Published on November 21, 2016 2:48 am

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