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दुनिया मेरे आगे- सोचने की सीमा

आन्या लिखने की सुविधा के लिए चुना गया एक नाम और उदाहरण भर है। वह इसी साल पहली कक्षा में गई है।
Author May 3, 2017 05:26 am
इस तस्वीर का इस्तेमाल केवल प्रतीक के तौर पर किया गया है।

अमित चमड़िया

आन्या लिखने की सुविधा के लिए चुना गया एक नाम और उदाहरण भर है। वह इसी साल पहली कक्षा में गई है। उसके भीतर नई कक्षा में जाने का अलग-सा उत्साह था, लेकिन कक्षा में जाने के बाद वह थोड़ी उदास हो गई। कुछ उसके दोस्त परीक्षा में तय मानदंड के अनुसार अंक नहीं ला सके, इसलिए उन लोगों को उसी कक्षा में रहना पड़ा। कुछ बच्चों ने उसी कक्षा में रहने की शर्त के चलते स्कूल से अपना नाम कटवा लिया। लेकिन इस ‘पास-फेल’ के चक्कर में आन्या के कई दोस्त उससे बिछड़ गए। आन्या अपनी बातों में दोस्तों के बिछुड़ने का जिक्र अक्सर करती है। आन्या का दोस्त सौरभ परीक्षा में पास होने के लिए निर्धारित नंबर तो ले आया। इसके बावजूद वह नई कक्षा में नहीं जाएगा। सौरभ की मां नहीं चाहती है कि उनका बेटा पहली कक्षा में जाए। वे स्कूल के शिक्षक को कहती हैं कि सौरभ अभी पहली कक्षा की किताबों का बोझ नहीं उठा पाएगा। आपके स्कूल में पहली कक्षा के पाठ्यक्रम में बहुत सारी किताबें चलती हैं। और अभी सौरभ के खेलने की उम्र है। मैं नहीं चाहती हूं कि इसका सारा समय किताबों के बीच ही बीत जाए। इसलिए इसे इसी कक्षा में रहने दीजिए।
दरअसल, सौरभ की मां की बातें हमारी शिक्षा प्रणाली पर एक सवाल तो खड़ा करती ही हैं कि कैसे हम मासूमों के कंधों पर किताबों का बोझ डालते हैं। साथ ही साथ उन सभी बच्चों की मां या अभिभावकों को एक संदेश भी देती हैं जो जल्दी से जल्दी अपने बच्चों की स्कूली शिक्षा पूरी कराने के लिए उनसे ज्यादा खुद मेहनत कर रहे हैं और केवल परीक्षा पास करने को शिक्षा का उद्देश्य समझते हैं। देश की शिक्षा की पद्धति भी अजीब है जो इतनी कम उम्र में बच्चों को ‘पास-फेल के खेल’ में फंसाती है। इसके चलते बच्चे ज्यादा से ज्यादा नंबर लाने वाली ‘मशीन’ के रूप में तब्दील हो जाते हैं। उनकी पढ़ाई का उद्देश्य केवल परीक्षा में अच्छे नंबर लाना हो जाता है। यों देश में कुछ स्कूल ऐसे भी हैं जहां कक्षा छह तक परीक्षा नहीं होती है। इससे बच्चों को पास-फेल के चक्र से मुक्ति तो मिल ही जाती है, साथ ही दोस्तों के बिछड़ने का दुख भी नहीं झेलना पड़ता है।

बहरहाल, अब आन्या अपनी नई क्लास में कुछ नए दोस्तों के साथ धीरे-धीरे रमने लगती है। इसी बीच एक दिन उसके शिक्षक ने क्लास में बच्चों को खुद और अपने माता-पिता के बारे में लिखने के लिए कहा। आन्या के लिए यह नई बात नहीं थी। वह पहले के क्लास में भी यह लिख चुकी थी। इसलिए उसने इनके बारे में लिख कर अपने शिक्षक को दिखा दिया, लेकिन लिखते वक्त उसके मन में एक सवाल भी चल रहा था। वह सवाल अपने शिक्षक से न पूछ कर मां से पूछती है। वह सवाल करती है कि मां, टीचर हमेशा अपने और अपने माता-पिता और भाई-बहन के बारे में ही लिखने के लिए क्यों बोलती हैं? क्यों नहीं टीचर यह कहती हैं कि तुम सब अपने दोस्तों के बारे में लिखो?

आन्या की मां इस सवाल के जवाब में अपनी बेटी से सिर्फ इतना कहती है कि वह इस संदर्भ में टीचर से बात करेगी। दरअसल, शिक्षक का क्लास में बच्चों को यह सब लिखने के लिए देना उनके पाठ्यक्रम का हिस्सा है। यों भी हमारे स्कूल और वहां एक तय शैली और पाठ्यक्रम के तहत पढ़ाने वाले शिक्षक पाठ्यक्रम के बाहर जाकर कुछ भी नया करने का जोखिम नहीं उठा पाते हैं। ऐसे में शिक्षकों की ओर से रचनात्मकता के स्तर पर कोई भी नया प्रयोग नहीं हो पाता है, न बच्चों को अपनी सोच-समझ के मुताबिक कुछ नया करने का मौका मिलता है। यही वजह है कि हम बच्चों को कुछ नया नहीं सिखा पाते हैं और इससे बहुत सारे बच्चों की स्वाभाविक प्रतिभा पनपने और बढ़ने से पहले ही दम तोड़ देती है।
इस बच्ची का सवाल किसी टीचर और किसी मां के लिए सामान्य-सी लगने वाली बात हो सकती है। लेकिन यह सवाल हमें एक बात तो जरूर बताता है कि बच्चों की दुनिया और उनके सोचने की सीमा उनकी उम्र से काफी बड़ी हैं। उनकी दुनिया में केवल ‘कुछ अपने’ शामिल नहीं हैं, वे एक ऐसी दुनिया बनाना चाहते हैं, जिसमें उनके दोस्तों की भी जगह हो। यह तो हमारी शिक्षा व्यवस्था और इससे जुड़े पाठ्यक्रमों की कमी है जो बच्चों की सोच के दायरे को फैलने नहीं देते हैं। हमेशा पाठ्यक्रम के नाम पर बच्चों को बांध कर रखा जाता है। शिक्षा की सार्थकता तभी है, जब इसका दृष्टिकोण व्यापक हो। वास्तव में बच्चों की दुनिया उम्मीद से भरी हुई है और जीवन को एक सुखद अनुभव देती है।

 

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