December 09, 2016

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दुनिया मेरे आगे: जिज्ञासा का पाठ

स्कूल से लौटते समय मैं सोच रही थी कि हमारे मन में अच्छे स्कूल के मायने क्या है! क्या अच्छा भवन, बच्चों की अधिक संख्या और उनका बिल्कुल शांत बैठना ही एक अच्छे स्कूल का पैमाना है?

Author November 16, 2016 00:46 am
एग्जाम घाटी के 1000 से ज्यादा सेंटर्स पर होंगे, जिसमें एक लाख से ज्यादा छात्र परीक्षा में शामिल होंगे।

प्रेरणा मालवीया

कुछ समय पहले एक स्कूल की प्रधानाध्यापक से काफी देर बातचीत हुई। चर्चा मुख्य रूप से बच्चों के नामांकन, समुदाय, शिक्षा का अधिकार और अनुशासन पर केंद्रित रही। उन्होंने इस बात को कई बार रेखांकित किया कि जब वे यहां आई थीं, उस समय स्कूल में बच्चे काफी कम थे। मगर अब बच्चों की संख्या में काफी इजाफा हुआ है। साथ ही स्कूल के व्यवस्थागत ढांचे में भी पहले से कई सारे सुधार हुए हैं उनके आने के बाद। उन्होंने हमें पूरा स्कूल दिखाया और इस दौरान जब कक्षाओं में गए तो बच्चे शांति से अपनी कॉपी में बोर्ड से कुछ उतार रहे थे। या फिर शिक्षिका जो कह रही थीं, उसे बिना कोई प्रश्न किए चुपचाप सुन रहे थे। कहीं कोई शोर-शराबा नहीं था। लग ही नहीं रहा था कि स्कूल में इतने सारे बच्चे मौजूद हैं। बस शिक्षिकाओं की आवाज वातावरण में गूंज रही थी। मेरे लिए यह हैरानी और दुख की बात थी। स्कूल परिसर में पसरी इस शांति के बारे में बताते हुए प्रधानाध्यापक बहुत गौरवान्वित महसूस कर रही थीं और इसका पूरा श्रेय अपने कर्मचारियों को दे रही थीं।

बहरहाल, स्कूल से लौटते समय मैं सोच रही थी कि हमारे मन में अच्छे स्कूल के मायने क्या है! क्या अच्छा भवन, बच्चों की अधिक संख्या और उनका बिल्कुल शांत बैठना ही एक अच्छे स्कूल का पैमाना है? स्कूल में बच्चे शांत बैठें, क्या इसका मतलब यह है कि वे अच्छे बच्चे हैं? यानी प्रश्न पूछने की गुंजाईश ही नहीं है। बच्चे चुपचाप अपना काम करते रहे और जो पढ़ाया जा रहा है, वह उन्हें जितना समझ में आ रहा था, समझते रहे। मगर वे कोई भी प्रश्न न करें। मुझे अच्छे से याद है कि जब मैं स्कूल में पढ़ती थी, उस समय अगर कोई चीज समझ में न आए तो सिर्फ इसी कारण नहीं पूछती थी कि बाकी बच्चे क्या सोचेंगे। कई बार कक्षा खत्म होने के बाद अन्य दोस्तों से पता चलता था कि उन्हें भी समझ में नहीं आया था, मगर उन्होंने भी संकोचवश नहीं पूछा।

आज लोगों की नजर भले इस ओर जा रही है, लेकिन सच यह है कि पारंपरिक तौर पर हमारे यहां प्रश्न पूछना अच्छा नहीं माना जाता है। जो बच्चे सवाल करते हैं, उन्हें ‘जुबान लड़ाने वाला’ या ‘बड़ों की बेअदबी करने वाला’ बच्चा कहा जाता है। प्रश्न पूछने की संस्कृति बहुत कमजोर हो रही है, वह घर में अपने बड़े हों या फिर स्कूल में शिक्षक। दिलचस्प है कि यह बात सिर्फ बच्चों पर लागू नहीं होती, बल्कि हम बड़े भी ‘प्रश्न-बाधा’ से गुजरते हैं। किसी कार्यशाला या समूह बैठकों में हम अक्सर अपनी बात सिर्फ इसी डर से नहीं रखते कि शायद वह सही नहीं है। फिर जब कोई दूसरा वही बात कहता है तब कहते हैं कि यही बात मेरे मन में भी थी, लेकिन हमें समझ में नहीं आ रहा था कि बात कैसे रखी जाए।

दरअसल, एक आम हालत यही है कि घर में माता-पिता बच्चों को अच्छा बच्चा बता कर उसके प्रश्न पूछने की आदत को हतोत्साहित करते हैं। कहा जाता है कि अच्छे बच्चे ज्यादा प्रश्न नहीं करते हैं। इसके बाद हम बच्चों से अपेक्षा करते हैं कि वे सोचने-समझने वाले और चिंतनशील नागरिक बनें। जाहिर है, यह कौशल अपने आप या अचानक ही विकसित नहीं होगा। इसके लिए बच्चों को मौका देना होगा और उनके भीतर सवाल पूछने का उत्साह जगाना होगा। ऐसा माहौल विकसित करना होगा, जहां बच्चे प्रश्न पूछ सकें। अपनी जिज्ञासाओं को बिना डर और झिझक के सामने रख सकें। उन्हें इस बात का भय या संकोच न हो कि वे जो पूछ रहे हैं, वह सही है या नहीं। प्रश्न कोई भी सही या गलत नहीं होता। प्रश्न पूछने का यह आशय कतई नहीं है कि जो व्यक्ति या बच्चा प्रश्न पूछ रहा है वह बुद्धू है। हो सकता है कि वह अपनी राय को और पुख्ता करने के लिए प्रश्न कर रहा हो या उससे संबंधित कोई और विचार उसके मन में चल रहे हों।

प्रश्न दबाने के दूरगामी परिणाम ये होते हैं कि बच्चा अपने आसपास घटित होने वाली किसी भी घटना पर कोई प्रतिक्रिया नहीं देता है, अपना पक्ष नहीं रखता है, क्योंकि समाज में वह यही देखता आ रहा है। चाहे समाज में फैली दहेज प्रथा हो या पिता का शराब पीकर पत्नी को पीटना। जबकि एक जागरूक नागरिक होने के नाते हमें अपने आसपास की घटनाओं के प्रति सचेत होना चाहिए और उनके कारणों पर अपनी राय बना कर उस पर अपना विरोध दर्ज करना चाहिए। इसकी शुरुआत स्कूल से होनी चाहिए। हमारा पाठ्यक्रम और शिक्षण विधियां ऐसी हों जो बच्चों को प्रश्न पूछने के लिए प्रोत्साहित करें। कल्पना करें कि वह कैसा समाज होगा, जहां सब अपने स्वार्थ के लिए खुद में गुम जी रहे हैं और दूसरों से कोई सरोकार नहीं है।

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First Published on November 16, 2016 12:46 am

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