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दुनिया मेरे आगे- दीन मीन बिन पंख के

देश की राजधानी दिल्ली का मौसम इस समय चर्चा का विषय बना हुआ है। धुंध में लिपटी दिल्ली किसी को सुहा नहीं रही।
Author November 14, 2017 04:24 am
प्रतीकात्मक तस्वीर। (ANI Photo)

अमरेंद्रनाथ त्रिपाठी 

देश की राजधानी दिल्ली का मौसम इस समय चर्चा का विषय बना हुआ है। धुंध में लिपटी दिल्ली किसी को सुहा नहीं रही। लेकिन इस धुंध को झेलने के लिए सब एक जैसे मजबूर नहीं हैं। इसीलिए इस समस्या पर सबकी हैरानी भी अलग-अलग है। कुछ हैं कि रोज तकलीफ में दुबले हो रहे हैं और डॉक्टर से अपनी समस्या को लेकर मिल रहे हैं तो कुछ ऐसे हैं जिनके पास दिल्ली की समस्या से बचने का उपाय कहीं और निकल जाना है। इसी मौसमी समस्या में कुछ दिन पहले दिल्ली के एक मित्र मुझसे मिले। वे काफी संपन्न हैं। वे भी मानते हैं कि वाकई दिल्ली में बड़ी दिक्कत हो रही है। लेकिन उनके पास इस दिक्कत की निजी काट मौजूद है।
उन्होंने बताया कि जब तक यह मौसम खराब है, तब तक वे दिल्ली से बाहर रहेंगे। क्या जरूरत दिल्ली में रहने की ऐसे में! वे दिल्ली के पुश्तैनी बाशिंदे हैं। उन्होंने फैसला किया कि पहाड़ों की तरफ सपरिवार कूच कर दिया जाए। वे निकल भी गए। मौसमी परिंदों की तरह। भर्तृहरि ने कहा है- सर्वे: गुणा: कांचनमाश्रयन्ते। सारे गुण कंचन में विराजते हैं। जो पैसे वाले हैं, पैसा उनका पंख भी है। उड़ने की कला या गुण भी उनमें है। समस्या आने पर यह विकल्प भी उनके पास है। लेकिन उनका क्या होगा जो गरीब और मजबूर हैं! जो विकल्पहीन हैं। उनके पास पैसों के पंख नहीं हैं। उनकी मजबूरी इस अवधी दोहे में दिखती है जिसे रहीम ने रचा है-
सर सूखै पंछी उड़यं औरय सरन समाहिं।
दीन मीन बिन पंख के कहु रहीम कहं जाहिं
मतलब कि सरोवर या तालाब के सूख जाने पर पक्षी तो उड़ कर दूसरे सरोवर या तालाब की शरण ले लेते हैं लेकिन दयनीय दशा में पड़ी मछलियां आखिर कहां जाएं! उनके तो पंख ही नहीं हैं। बेचारा गुरबा-गरीब कहां जाए, वे तो बिना धन के है।

कुछ लोग ऐसे भी हैं जो बाहर फैली धुंध से बचने के लिए अपने घर में अपने मन का मौसम बना कर दुबके रह सकते हैं। ऐसा वेी कर रहे हैं जिनके पास बैठे खाने-जीने का साधन है। लेकिन वे क्या करें जो रोज काम करके अपनी और अपने परिवार की जीविका संभाल रहे हैं। उनके लिए अपने घर में दुबका रहना संभव नहीं है। स्थायी और अस्थायी नौकरी का फर्क भी ऐसे हालात में समझ में आता है। स्थायी नौकरी वाला छुट्टी ले सकता है। वे कहीं जा सकता है या घर में दुबका रह सकता है। उसका वर्तमान में कुछ खास नहीं बिगड़ेगा और इससे उसके भविष्य पर किसी खतरे की आशंका तो नहीं ही है। लेकिन अस्थायी नौकरी वाला दूनी मार झेलता है। अनाश्वस्त भविष्य के कारण वे छुट्टी नहीं ले सकता और स्थायी नौकरी वाले का ‘वर्कलोड’ भी उसी के माथे मढ़ दिया जाता है। संस्थाओं में स्थायी नौकरी वाले लोग कुछ अस्थायी लोगों के पड़े रहने को इसीलिए भीतर-ही-भीतर सुखद मानते हैं। दीपावली के मौके पर पटाखों के अंधाधुंध दगने से दिल्ली के मौसम की खराबी का अनुभव मुझे भी होता रहा है। ठीक पिछली दीपावली के बाद वाले दिन से हालत काफी खराब थी। कई दिनों तक धुंध की चादर धूप को नहीं आने दे रही थी। इस बार दीपावली आने के कुछ दिन पहले से ही मन सनपाता हुआ था। न्यायालय का आदेश था तो इस बार पटाखों को जलाने पर थोड़ा अंकुश रहा। आदेश की आलोचना अलग-अलग नजरियों से हुई भी लेकिन यह अनुभव तो लगभग सभी को हुआ कि पिछली दीपावली से अलग इस दीपावली पर दूसरे दिन धूप निकली हुई दिखी। प्रकाश-पर्व को सार्थक करती यह धूप देखकर दीपावली और सुंदर हो गई। पटाखों का शोर भी कम रहा। नहीं तो इतना अधिक शोर होता था कि दीपावली की शुभकामनाएं ‘बोलने’ भर की भी इच्छा जाती रहती थी। लेकिन कोर्ट कितना, कब तक और कहां-कहां तक अंकुश लगाएगा! इस बात को भी सबको और बाकी इदारों को शिद्दत से समझना होगा।

इन दिनों धुंध में दिल्ली डूबी है। लोग परेशान हैं। सभी महसूस कर रहे हैं कि प्रदूषण एक बड़ी समस्या है। इसे लोग मान तो लेते हैं लेकिन इस समस्या को दूर करने के लिए किसी तरह का त्याग, अगर इसे त्याग कहें तो, करने के लिए वे तैयार नहीं होते। पटाखे न दागने की बात हो तो उनकी उत्सवी और धार्मिक भावनाएं आहत होने लगती हैं। निजी वाहनों के कम-से-कम इस्तेमाल की बात हो तो उनको बड़ी असुविधा होने लगती है। आड-इवन की बात का ऐसा मजाक-उड़ाऊ खंडन करते हैं जैसे सरकार को नाटकबाजी का भूत सवार है। लेकिन खामी सरकार के मोर्चे पर भी है। इस समस्या को लेकर न केंद्र सक्रिय हो रहा है न दिल्ली सरकार। पराली जलाने की जो परेशानी है, वह तब तक दूर नहीं की जा सकती, जब तक पंजाब-हरियाणा, दिल्ली और केंद्र सरकार मिल कर कोई हल नहीं निकालते। सिर्फ भाग्य और भगवान के भरोसे रहना निरंतर मुश्किलों में इजाफा ही करेगा।

 

 

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