December 04, 2016

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दुनिया मेरे आगे: अमूर्तन बनाम यथार्थ

एक ही शैली में रंग-रेखाओं का संयोजन, जहां कला जीवन की त्रासदी बन रहा है, वहीं वह मानव जीवन से सही सरोकार बना पाने की स्थिति में भी नहीं है।

प्रतिकात्मक तस्वीर।

कला में आकृतियों की एकरसता से अघाए दर्शकों को इस परिणाम की प्रतीक्षा बड़ी बैचेनी से है जब चित्रफलक आमजन के सुख-दुख से जुड़ कर मानवीय संवेदनाओं से अपना तारतम्य बनाएंगे। एक ही शैली में रंग-रेखाओं का संयोजन, जहां कला जीवन की त्रासदी बन रहा है, वहीं वह मानव जीवन से सही सरोकार बना पाने की स्थिति में भी नहीं है। आधुनिक चित्रकला में बिना भाव-बोध के निष्प्राण चित्रों की संरचनाएं बोझिलता को जन्म दे रही हैं और कला-साधना का मार्ग भी त्याग रही हैं। रंग और रेखाओं का स्वप्निल संसार रचने वाली और दिप-दिपकर चौंधियाने वाली चित्राकृतियां कौतूहल और देखने के चाव से ज्यादा गहरे तक आघात नहीं कर रहीं तो मनुष्य जीवन के लिए उनकी प्रासंगिकता और उपादेयता का अर्थ रह क्या जाता है!

ऐसा लगता है कि दोनों ही पीढ़ियों में कला माध्यम से भाव संप्रेषण कला को काठ मार गया है। हमारे सामयिक जीवन के संत्रास और असंगतिपूर्ण बिंब चित्रफलक से बाहर हैं और एक घुप्प सन्नाटा अपने पांव पसार रहा है। चित्र बन रहे हैं, ढेर लग रहे हैं, लेकिन गुणवत्ता के स्तर पर उनका मूल्यांकन करने की फुर्सत किसी को नहीं। बस सब संख्यात्मक कोण से एक-दूसरे को चौंकाने और ‘हतप्रभ करने’ के खेल में मशगूल हैं। कला का हश्र अगर यही था तो इसका आविर्भाव क्यों हुआ? कला कोई निस्सार भाव तो थी नहीं जो शौकिया रूप से स्वीकार कर ली गई हो! उसका एक व्याकरण, अर्थ और संभावना थी, जिसे लेकर कला-वीथियां समृद्ध होती रहीं। अब सवाल यह है कि कला का सापेक्ष अर्थ क्या है और उसे मनुष्य जीवन से साधे रहने की दृष्टि कैसी हो? कला शिक्षण संस्थाओं से जो चितेरे आ रहे हैं, उन्हें सैद्धांतिक रूप में भी कला को मनुष्य जीवन से जोड़ कर नहीं बताया जा रहा। उसे दुरूह और रंगों की कौतूहलपूर्ण रंग-बिरंगी चित्राकृति के रूप में चित्रित किया जा रहा है। ऐसी स्थिति में सृजनकर्ता का लक्ष्य भी भला कैसे साफ हो सकता है?

जिस कला में मनुष्य के अंतर्मन की चेतना का जीवंत भावचित्र बना कर वर्तमान, अतीत और भविष्य की त्रिकालदर्शी संभावनाएं तलाशी जा रही थीं, वह मात्र रंगों की बनावट में सिमट जाए तो, चिंता की बात क्यों नहीं होगी! अकादमियों ने कभी किसी संगोष्ठी में इस बात को लेकर चिंता नहीं जताई गई कि कला का मनुष्य जीवन से संपर्क क्यों टूट रहा है या इसका टूटना कालांतर में कितना घातक होगा! नए चित्रकारों के लिए कार्यशालाएं इस दृष्टि से नहीं लगाई गर्इं, जिनमें बताया जाता कि हमारी चित्रकला मनुष्य जीवन के लिए है, न कि किसी कपोल-कल्पित वायावी अन्य संसार के लिए! इस तरह पीढ़ी-दर-पीढ़ी भटकाव का दर्शन गहराया और चित्रकार बन जाने पर मुगालते की परत घनी होती गई। साहित्यकार शब्दों से एक संसार रचता है और चित्रकार, चित्र बना कर उन बेचैनियों को उठाता है। आधुनिक चित्रकला इस भाव संप्रेषण में पिछड़ रहे हैं और ऊहापोह से घिरे निस्संगता से बेबाक रंग नहीं उभार पा रहे।

हमें कला के लिए बहुत साधना चाहिए और एक ऐसा ‘विजन’ भी जो मानवतावाद के साथ-साथ यथार्थ के कठोर धरातल से भी जुड़ा हुआ हो। मनुष्य की भूख-प्यास, छल-कपट, प्रपंच, धोखा, चालाकी, स्वार्थपरकता, प्रेम, निश्छलता, हथियारों की होड़, बढ़ते युद्ध, प्रकृति के साथ होने वाला अनाचार, रिश्ते-नातों में आई गिरावट, अलगाव और आतंकवाद, लोकतंत्र की आड़ में राजनीतिक भ्रष्टाचार, बढ़ती बेरोजगारी, अशिक्षा, गरीबी, अनैतिक अन्याय और अनाचार के चित्र कौन खींचेगा? नगर बन रहे हैं महानगर, आदमी एक-दूसरे से अजनबी हो रहा है, मनुष्यता पूरी तरह यांत्रिकता को समर्पित हो रही है, बच्चों का भविष्य कोई दिखाई नहीं देता, चकाचौंध और भौतिकता की ललक में पगलाया आदमी पथभ्रष्ट हो रहा है। इसको कौन देखेगा?

यह दायित्व विभिन्न प्रतीकों के जरिए कलाकार अपने चित्र फलकों में उभार सकते हैं। लेकिन यथार्थ को चित्रित न करके सब कुछ सुंदर बताया जाना क्या षड्यंत्र नहीं है? क्या यह समाज के साथ धोखा नहीं है? चित्र केवल बैठक कक्षों में सजाए जाने वाले ‘पीस’ नहीं है, बल्कि वे वह कालपात्र हैं जो इतिहास बनाते हैं। ये चित्र ही थे, जिनसे हमने मनुष्य सभ्यता के प्रादुर्भाव और विकास का पता लगाया। हमें भी आगे के पांच सौ साल बाद के लिए ऐसा भाव चित्रण सौंप कर जाना चाहिए, जिससे हमारे कला और मनुष्य जीवन का पता चल सके।

कला, कला होती है। उसकी अपनी आकृतियां होती हैं और वह मनुष्य को आनंद प्रदान कर सुख-सागर में गोते लगाने का अवसर देती है। उसे अपने समाज या वर्तमान से बेखबर रह कर ऐसे फलक तैयार करते रहने पड़ते हैं जो कलात्मक भव्य छवियों में उपलब्ध हों, जो लोग कला को सिर्फ इतना-सा मानते हैं, वे भूलते हैं और अपनी नासमझी को छिपाते हैं। एक अच्छा चित्र आंखों को भला लगता है तो उसका मात्र अर्थ चित्र नहीं, बल्कि वह अपने साथ एक इतिहास तथा यथार्थ जीवन के उन आयामों को भी समेटता है जो उसमें चित्रित होते हैं। लेकिन नूतन चित्रकला के नाम पर अमूर्त चित्रण की ललक में हम आकृतियों को नकारेंगे तो निश्चित रूप से कला में निष्प्राण भाव ही संचरित होंगे।

 

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First Published on October 26, 2016 4:53 am

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