March 31, 2017

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दुनिया मेरे आगे: चिठिया हो तो

पति-पत्नी और प्रेमियों के लिए चिट्ठी दुर्लभ वस्तु की तरह होती थी, जिसे वे सीने से लगाए रखते थे।

Author October 8, 2016 05:09 am
बचपन।

नरेंद्र जांगिड़

कभी एक गीत मुझे इतना प्रिय था कि जब भी रेडियो पर उसे सुनता तो मुग्ध हो जाता था- ‘डाकिया डाक लाया…’। उसके बाद एक और गीत सबका प्रिय बना- ‘चिट्ठी आई है आई है चिट्ठी..!’ लेकिन आज इन जैसे गीतों के अर्थ समय के सीने में समा गए हैं। अब खत में फूल भेजना तो दूर, कोई किसी को खत भी नहीं लिखता। अब शायद किसी को डाकिये का इंतजार नहीं रह गया है। दिल की बात, सुख-दुख, हंसी का अहसास कराने वाली चिट्ठियां अब मोबाइल फोन में खो गई हैं। और इसी के साथ खत्म होती जा रही हैं हमारी संवेदनाएं और हमारे अहसास। अब तो नए साल पर कोई ग्रीटिंग कार्ड भी नहीं आता, मोबाइल फोन पर एसएमएस जरूर आते हैं। एक समय था जब चिट्ठी पाने के लिए अधीरता से इंतजार रहता था। चिट्ठी मिलने पर अहसास होता था कि लिखने वाला सशरीर उसके पास खड़ा है। एक ही चिट्ठी को कई बार पढ़ा जाता था और हर बार उससे जुड़ी यादों में मन खो जाता था। पति-पत्नी और प्रेमियों के लिए चिट्ठी दुर्लभ वस्तु की तरह होती थी, जिसे वे सीने से लगाए रखते थे। अब मोबाइल फोन पर आवाज तो सुनने को मिलती है, लेकिन वह अहसास नहीं होता। पहले चिट्ठी को सालों तक सहेज कर रखा जाता था, अब इधर वाट्सऐप या इनबॉक्स में एसएमएस आया, उधर उसे डिलीट कर दिया। पत्रों से किसी के व्यक्तित्व और लेखन शैली का पता चलता था, लेकिन अब यह स्कूली पाठ्यक्रम का हिस्सा भर रह गई है।

मुझे याद है कि जब बचपन में हम लोग ननिहाल जाते थे तो वहां दीवार में बनी अलमारी के दो हैंडलों पर दो लोहे की तार टंगी रहती थी। एक में पुराने खत और दूसरी में पुराने बिजली पानी के बिल होते थे। तब हमें इन सबके बारे में सोचने की फुर्सत ही कहां होती थी। अब सोचता हूं तो बहुत हंसी आती है कि कोई खतों वाली एक तार उठा ले तो सारे खानदान का इतिहास-भूगोल समझ में आ जाए। लेकिन सच यह भी है कि तब छिपाने के लिए कुछ नहीं होता था, सबको सब कुछ पता रहता था। ये छिपने-छिपाने की बीमारियां इस नए दौर की देन हैं। जब हम लोग पोस्टकार्ड या लिफाफा डाक-पेटी के सुपुर्द करने जाते थे तो हमारे मन में एक बात घर कर चुकी थी कि खत अंदर गिरने की आवाज आनी चाहिए। शक था कि कहीं उस डिब्बे में ऊपर ही अटक तो नहीं गया होगा।

एक होता था ‘जवाबी पोस्टकार्ड’। इसका इस्तेमाल लोग आमतौर पर वैसे बंधुओं के लिए करते थे जो खतों का जवाब नहीं देते थे। उन दिनों में सब कुछ विश्वास पर ही चलता था। चिट्ठी डाली है तो मतलब पहुंच ही जाएगी। डाकिए और डाक विभाग पर पूरा भरोसा। जिसे चिट्ठी भेजी है, उस पर भी यकीन कि वह जवाब भिजवा ही देगा। लेकिन अब शादी-ब्याह के कार्ड भी लोग स्पीड-पोस्ट से भिजवाते हैं या फिर कूरियर से। जितनी लंबी लाइनें आजकल स्पीड-पोस्ट के लिए होती हैं, उससे तो यही लगता है कि लोग अब चिट्ठी-पत्री पर भरोसा ही नहीं करते। यहां तक कि रजिस्ट्री भी लोग कम ही करवाते हैं। नौकरी के लिए आवेदन करने वाले स्पीड-पोस्ट करवाते हैं तो बात समझ में आती है। आजकल इतनी धांधलियां हो रही हैं कि आवेदन भेजने का कुछ तो ठोस सबूत चाहिए।

पहले के जमाने में बड़े-बुजुर्ग घर में घुसते ही पूछते थे कि कोई चिट्ठी आई! पांच पैसे के पोस्टकार्ड पर हाथ से लिखे अक्षर घरों का माहौल खुशनुमा बना दिया करते थे। उन्हें परिवार का हर सदस्य पढ़ता और फिर उसे संभाल कर रख दिया जाता। अब तो हर पांच मिनट पर वाट्सऐप देखना। वह जमाना भी था जब चिट्ठियां छिप कर लिखी जातीं और पढ़ने वाले भी इन्हें छिप कर ही पढ़ा करते थे। लेकिन अब चिट्ठियों के रंग-रूप नक्शे के साथ भेजने और पढ़ने के तरीके भी बदले हैं। मेरे पिताजी बताते हैं कि उनकी मां कहती थीं कि डाकिया दिखे तो बाबूजी का नाम बता कर पूछ लेना कि कोई चिट्ठी आई है या नहीं। डाकिये की साइकिल की घंटी की आवाज सुनते ही दौड़ कर उसके साइकिल के हैंडल से लटक कर घंटी बजाने लगता और फिर पूछता बाबूजी की इस बार चिट्ठी आई ही होगी डाकिया चाचा? जब चिट्ठियों के बंडल देख कर वे बोलते कि रामू और सोहन की चिट्ठी हैं, पर बाबू की नहीं, तो मन मायूस हो जाता था।आज वह समय नहीं है। मगर आज चिट्ठियों का लेन-देन बड़े बुद्धिजीवियों के बीच हो रहा है। मोबाइल फोन की सुविधा ने दूरियां तो जरूर कम कर दी हैं, पर अहसासों की दूरियां बढ़ गई हैं। पहले लोग मिल कर रहते थे, क्योंकि उन्हें चिट्ठी लिखवाने और पढ़ने की जरूरत होती थी। अब तो पांच साल के बच्चे की जेब में भी दस हजार का स्मार्टफोन होगा, जो जेब से आधा बहार झलकता दिखाई देता है।

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First Published on October 8, 2016 5:09 am

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