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अनदेखी की धरोहर

मैं मुंबई से वास्तुकला में डिग्री लेकर दिल्ली आ गया था। चार-पांच वर्षों से एक प्राइवेट कंपनी में वास्तुकार था।
Author May 4, 2017 05:41 am
प्रतीकात्मक चित्र।

नरेंद्र नागदेव

सन 1973 में दिल्ली के प्रगति मैदान में विभिन्न राज्यों और अन्य सरकारी विभागों के पेविलियन एक-एक करके खड़े हो रहे थे। मेले अंतरराष्ट्रीय स्तर के होने जा रहे थे, इसलिए उन्हें आकर्षक बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ी जा रही थी। मध्यप्रदेश के पेविलियन के लिए भी डिजाइन प्रतियोगिता घोषित हुई। मैं मुंबई से वास्तुकला में डिग्री लेकर दिल्ली आ गया था। चार-पांच वर्षों से एक प्राइवेट कंपनी में वास्तुकार था। मुझे लगा यह अच्छा अवसर है। मैंने उस प्रतियोगिता में भाग लिया और खुशी का ठिकाना नहीं रहा, जब मेरी डिजाइन को प्रतियोगिता में सर्वश्रेष्ठ घोषित कर दिया गया। बाद में वह पेविलियन मेरी डिजाइन के अनुरूप निर्मित भी हुआ।

निर्माण कार्य शुरू होने के साथ ही प्रगति मैदान में मेरा आना-जाना शुरू हुआ। ‘हॉल आॅफ नेशंस’ और ‘हॉल आॅफ इंडस्ट्रीज’ के मुख्य पेविलियन तब तक बन चुके थे। उन्हें वहां प्रत्यक्ष देखना विरल अनुभव होता था। वे उस समय भीतरी खंभों के बिना कंक्रीट में बने सबसे बड़े हॉल थे। इतने दशक बीत जाने के बाद उन्हें यह गौरव अभी भी प्राप्त था। स्टील की ‘स्पेस फ्रेम’ के ऐसे विशाल ढांचे तो और भी बहुत हैं। लेकिन कंक्रीट में वैसा बना देना अकल्पनीय था। न सिर्फ उसके भीतर की जगह, बल्कि पिरामिडों की शक्ल के उनके बाहरी रूपाकार भी हैरान करते थे।स्वाभाविक ही ‘हॉल आॅफ नेशंस’ और ‘हॉल आॅफ इंडस्ट्रीज’ को आधुनिक भारत में वास्तुकला के विकास में मील का पत्थर माना गया। वास्तुकला पर लिखी गई ऐसी कोई किताब नहीं होती थी, जिसमें उनके सचित्र विवरण नहीं हों। मैं उन तस्वीरों को गौर से देखता और पृष्ठभूमि में कहीं अपने डिजाइन किए हुए पेविलियन की आकृति देख कर खुश हो जाता। राज रेवाल, जो उन भवनों के वास्तुकार थे, देश के आधुनिक युग के सर्वश्रेष्ठ वास्तुकारों में से एक रहे हैं। उतना ही महत्त्वपूर्ण भाग था महेंद्र राज का, जो स्ट्रक्चरल इंजीनियर थे और जिनकी गणना भी अपने क्षेत्र के सर्वश्रेष्ठ में होती रही है। एक नए इंजीनियरिंग कन्सेप्ट को लेकर सर्वथा भिन्न वास्तुशिल्प का सृजन कैसे किया जा सकता है, इसका बेहतरीन उदाहरण थे ये भवन, जो इन दोनों श्रेष्ठ विशेषज्ञों के बेहतरीन तालमेल से संभव हो सके थे। जाहिर है कि प्रोजेक्ट बेहद सफल रहा और बाद में चार दशकों से अधिक समय तक राजधानी में होने वाले तमाम विश्व मेलों की गहमागहमी और सामाजिक-सांस्कृतिक गतिविधियों का केंद्र बना रहा।

लेकिन 24 अप्रैल 2017 को वह सब अतीत हो गया। सुना कि अचानक बुलडोजर आए और वास्तुकला के इन मील के पत्थरों को, राजधानी की इन सांस्कृतिक धरोहरों को ध्वस्त करके चले गए। यकीन नहीं होता कि ऐसा भी हो सकता है। यह सुनने में तो आ रहा था कि बदले हुए समय और कई गुना बढ़ चुकी आवश्यकताओं को समाहित करके अब वहां एक बड़ा आधुनिक निर्माण किया जाएगा। लेकिन क्या उसे इस तरह नहीं बनाया जा सकता था कि ‘हॉल आॅफ नेशंस’ और ‘हॉल आॅफ इंडस्ट्रीज’ के भवनों को सुरक्षित रखते हुए शेष भूमि पर नया भवन विकसित किया जाता और इन निर्माणों को धरोहर भवनों के रूप में उनके साथ संबद्ध कर दिया जाता? खुद एक वास्तुकार होने के नाते मैं कह सकता हूं कि ऐसा अवश्य किया जा सकता था। बल्कि नए परिसर के बीच इन धरोहरों की उपस्थिति उसे अतिरिक्त आकर्षण और भव्यता भी प्रदान करती। लेकिन वैसा नहीं किया गया।

देश ही नहीं, विदेशों के भी तमाम वास्तुकारों के संगठनों और सांस्कृतिक संस्थाओं ने उच्चतम स्तर तक पुरजोर अपील की थी कि उन्हें बचा लिया जाए, क्योंकि ये इमारतें इस देश की वास्तुकला की धरोहर हैं और साथ ही देश की इंजीनियरिंग प्रतिभा की भी अद्भुत मिसाल। लेकिन तमाम अपीलें बहरे कानों पर पड़ीं और आखिर उन पर बुलडोजर चल ही गए। मैं हैरान हूं कि अर्बन आर्ट कमीशन ने, जो सांस्कृतिक धरोहरों को लेकर इतना संवेदनशील रहता आया है, इतना असंवेदनशील निर्णय ले कैसे लिया होगा! भविष्य में जब भी आधुनिक वास्तुकला का इतिहास लिखा जाएगा तो इस हादसे की परछाई उसका पीछा करती रहेगी। एक ‘हादसा’, जिसे यकीनन टाला जा सकता था!पिछले साल चौदह नवंबर को जब अंतरराष्ट्रीय व्यापार मेला शुरू हुआ, तभी पता चल गया था कि यह अंतिम है। उसके बाद इसे तोड़ दिया जाएगा। इसलिए तबियत नासाज होने के बावजूद मैं वहां गया। अपने मोबाइल कैमरे में उसके भीतर-बाहर की तस्वीरें कैद करता रहा। इसलिए कि उन आकारों के साथ मेरी युवावस्था के उन गहमागहमी से भरे दिनों की यादें जुड़ी थीं और कागज पर तब खींची गई अपनी कल्पनाओं के वे साकार रूप थे जो मुझे पता था कि अगले वर्ष वहां नहीं होंगे! कुछ नए, दूसरे आकारों के लिए वे जगह खाली कर चुके होंगे।

 

 

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