April 28, 2017

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खानपान का मजहब

आगे की ‘रणनीति’ पर कुछ विचार करने से पहले ही दोस्तों ने शायद मजाक सुझाया कि ‘तुम जैन मील मांग लेना! उसमें गारंटी है कि तुम्हारा धर्म कतई भ्रष्ट नहीं होगा!’

Author April 4, 2017 06:17 am
इलाहाबाद में एक मीट दुकानदार अपनी दुकान पर खाली बैठा हुआ। (REUTERS/Jitendra Prakash)

अलका कौशिक

हांगकांग से दिल्ली की उड़ान का टिकट मेरे पास पहुंच गया था। बाकी तो सब ठीक लगा, लेकिन खाने की पसंद वाले कॉलम में दर्ज ‘हिंदू मील’ यानी ‘हिंदू भोजन’ ने मुझे चौंकाया था। टिकट बनवाते समय मैंने सोचा जरूर था कि राष्ट्रीयता में ‘भारतीय’ दर्ज करने और ‘शाकाहारी’ भोजन की पसंद के चलते ही मुझे हिंदू भी मान लिया गया होगा। यों भी मेरा नाम और चेहरा-मोहरा हिंदुस्तानी ही है, सो लगे हाथों ‘हिंदू’ भी कह लेने में क्या हर्ज था! शुक्र था कि मेरे मांसाहारी दोस्त उस सफर में साथ थे, जिन्होंने पहले ही चेतावनी दे दी थी कि मेरे रात के खाने में मांस भी हो सकता है। अब क्या होगा? क्या अपनी पसंद का शाकाहारी खाना मिलेगा?

कहीं सफर में भूखे तो नहीं रह जाना होगा? यों भी, मुझे मेवे-शेवे और खाखड़ा-फाकड़ा अपने बस्ते में लेकर चलने की कतई आदत नहीं है।नाश्ते की मेज से जो सेब बस्ते में रखा था, उसे सुरक्षा के नाम पर हवाई अड्डे पर पहले ही ‘जब्त’ किया जा चुका था। आगे की ‘रणनीति’ पर कुछ विचार करने से पहले ही दोस्तों ने शायद मजाक सुझाया कि ‘तुम जैन मील मांग लेना! उसमें गारंटी है कि तुम्हारा धर्म कतई भ्रष्ट नहीं होगा!’ यह बताते हुए उनके गालों तक फैल चुके होंठों की हंसी बता रही थी कि उन्हें मुझसे कितनी हमदर्दी है। हवाई जहाज में ट्रेन जैसा मामला नहीं होता कि दोपहर या रात के खाने या फिर नाश्ते के ‘आॅर्डर’ लेने आपके पास कोई दौड़ा आए। टिकट बनवाते वक्त ही सारी फरमाइशें भी रिकार्ड हो जाती हैं, जैसे ‘किस्मत का पन्ना’ सीलबंद हो गया हो।

उस रात केटी ने डिनर के पैकेट बांटने से पहले हर किसी की सीट पर जाकर यह पुष्टि कर ली थी कि कौन क्या खाएगा। यों इस ‘हर किसी’ में सारे यात्री शुमार नहीं थे। ये मेरे जैसे वे गिने-चुने जीव थे, जिन्होंने ‘वेज फूड’, ‘हिंदू मील’, ‘वीगन मील’, ‘जैन मील’ जैसे विकल्पों को पहले से चुन रखा था। केटी से मैंने दो टूक पूछ लिया कि किस खाने में मछली, अंडा और मांस नहीं है। ‘आपको एशियन शाकाहारी खाना लेना चाहिए!’ -उसने अंग्रेजी में कहा। वह मेरे शाकाहारी मन को समझ चुकी थी और उसी फरमाइश को पूरी करने विमान के पिछले हिस्से में दौड़ी। ‘लेकिन ये ‘हिंदू मील’ क्या है?’ मेरा सवाल मेरे मुंह में ही अटका पड़ा रहा और मेरी ट्रे-टेबल पर एशियन शाकाहारी खाना परोसा जा चुका था। खाना इतना बवाल भी हो सकता है, यह उस दिन मालूम पड़ा।

घर, दफ्तर, रेल, बस, कार, स्टेशन और प्लेटफार्मों पर, हवाई अड्डों के प्रतीक्षा कक्ष से हवाई जहाज तक में इससे पहले अनगिनत यात्राओं के दौर से गुजरने के बावजूद ऐसी गफलत से दो-चार कभी नहीं होना पड़ा था। किस्म-किस्म के खाने के पैकेट जहाज के केबिन में बंट रहे थे। केटी बड़ी सावधानी से एक पन्ने में बाकायदा पढ़ती थी और फिर यात्रियों से पूछ-पूछ कर उनका वाला पैकेट उन्हें थमाती। अपने डिब्बे को धीरे-धीरे खोल कर मैं उसके हर कोने में मुआयना कर आई थी। साथ बैठे दोस्त ने समझाया- ‘खा लो, आंख बंद करके, एशियन शाकाहारी खाना यानी ऐसा भोजन, जिसमें किसी भी तरह का मांस-मछली और अंडा नहीं होता।’ अब मेरा दूसरा सवाल तैयार था- ‘तो फिर ये हिंदू मील क्या बला होती है?’ दोस्त ने कहा- ‘बला नहीं, वह दरअसल उन ‘हिंदुओं’ के लिए परोसा जाने वाला भोजन है जो तुम्हारी तरह सख्त शाकाहारी नहीं होते।

यानी जो मांस-मछली, अंडे-डेयरी उत्पाद खाने से परहेज नहीं करते। ‘हिंदू मील’ इसलिए कि उसमें मांस हो सकता है, ‘बीफ’ नहीं।’ खाने को लेकर इतनी चर्चा और इतना ‘ज्ञानवर्धन’ इससे पहले कब हुआ था, मुझे याद नहीं है। मुझ जैसे सादा खानपान पसंद शाकाहारी के लिए भोजन कभी बातचीत का विषय नहीं हो सकता था। लेकिन उस रोज ‘हिंदू मील’ के बहाने एक सिलसिला बना तो लगा कि खाने के साथ कितनी संवेदनाएं जुड़ी हैं। ‘वीगन’ और ‘वेजीटेरियन’ तक का खयाल एक एयरलाइंस ऐसे रख रही थी, जैसे मां अपने उस बच्चे के खानपान का रखती है जिसका अन्नप्राशन चार रोज पहले ही हुआ होता है!

लेकिन विमान की उस सीमित काया में दुनिया जहां के ढेरों राष्ट्रीयताओं के लोगों की किस्म-किस्म के खाने की पसंद और प्राथमिकता को लेकर जिस समझ-बूझ और सम्मान का अहसास कराया जा रहा है, उसका छंटाक भर भी हमारे फेसबुक के ‘योद्धा’ दिखलाते तो यकीन हो जाता कि सभ्यता का चरम दौर है। हर प्रतिबंध, हर विरोध, हर बहिष्कार के पीछे एक तबके के द्वारा दूसरे को हरा देने की जो होड़ दिख रही है, मीडिया में शाकाहार-मांसाहार को लेकर इन दिनों जिस बहस से वास्ता पड़ रहा है, उसके बरक्स मुझे दुबली-पतली काया में सिमटी केटी रह-रह कर याद आती है।

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First Published on April 4, 2017 6:03 am

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