December 09, 2016

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दुनिया मेरे आगे: मुंडेरों पर वीरानी

मोबाइल फोन की क्रांति ने मुंडेरों पर कौवे और गांव की गलियों में साइकिल की घंटी बजाते खाकी कपड़े पहने डाकिये को भी बदल दिया है।

Author November 14, 2016 02:53 am
प्रतीकात्मक तस्वीर।

कृष्ण कुमार रत्तू

इन दिनों उजड़ते हुए गांवों और बेतरतीब शहरों को देखना ठीक उस उदासी की यात्रा है जो गांव से आया व्यक्ति हर क्षण अपने अंदर महसूस करता है। शेष स्मृतियों से छन कर जो शेष है, वही तो इस उदासी का हासिल है! इस उदासी, व्याकुलता और हताशा से भागता हुआ आम आदमी अपनी उस जमीन, घर और माहौल को देखता है, जहां अब कुछ भी शेष नहीं बचा है, सिवाय कुछ एक टूटते रिश्तों के अवशेषों के। नई बदलती हुई दुनिया और प्रगति की इस तेज रफ्तार दौड़ में आप कहां हैं।

यह सच है कि इन दिनों जिंदा रहने के लिए तरक्की और लगातार विकास की ओर अग्रसर होना अति आवश्यक है। इस बिंदु पर विकास जब इस हद को पार कर जाए कि वह आपके जीवन को संचालित और नियंत्रित करने लगे तो उस अमल को विकास की किस नई परिभाषा के रूप में बयान कर सकते हैं? आज वर्तमान परिप्रेक्ष्य में आम आदमी का अपने गांव से टूटना और जमीन के साथ जंगल और रहन-सहन के ढंग को अमूर्त रूप में खोते हुए चुपचाप देखना एक ऐसी खामोश त्रासदी का आईना है, जहां पर आदमी जिंदा रहने के लिए एक मशीनी मानव बना दिया गया है। उसके लिए महानगरीय जिंदगी एक अभिशाप की तरह बनती जा रही है। शायद इसीलिए वह कहता है अब जीना जहां, मरना जहां, इसके सिवा करना क्या…! क्या जीवन का सच यही सब कुछ है जो विकास के नाम पर घट रहा है?

जीवन हर अगले पल कम होता जा रहा है। इसके बावजूद वह गतिमान है और इसका प्रतिमान आज का उजड़ता हुआ वीरान उदास गांव है, जहां आज सब कुछ बदल रहा है या फिर बदल गया है। कुछ गांव बिल्कुल अधकचरे शहरों की तरह हो गए हैं और कुछ गांव अब गांव न रह कर खंडहरों की मानिंद दिखाई देते हैं। यानी गांव की संस्कृति, उसकी आबोहवा और सौहार्द, सब कुछ तो बदल गया है हमारे देखते-देखते! इन दिनों कुछ गांव भी बढ़ते हुए विकास की सुनामी को ओढ़ते जा रहे हैं। कुछ गांवों के तो नामोनिशान ही खत्म हो गए हैं। जैसे-जैसे अत्याधुनिक तकनीकों से विकसित स्मार्ट शहर धरती पर उग रहे हैं, वैसे-वैसे खंडहर होते गांव का मंजर भी एक दूसरी तस्वीर काल एक आम चेहरा दिखाता है। इस सब के बीच सच के बावजूद अकेला होता जा रहा व्यक्ति अपनी गलती को नहीं मानना चाहता। इसे क्या कहा जाए?

एक सर्वेक्षण में बताया गया है कि नब्बे प्रतिशत गांवों का यही परिदृश्य है। ये अब गांवों की भुतहा तस्वीरें दिखाते हैं। एक ऐसी तस्वीर, जिसमें गांव और वहां के बांशिदें कहीं गायब हैं। अब बदलते हुए नए भारत की नई दुनिया में यह उजड़ा हुआ गांव भारत का नया चेहरा भी बताता है। मोबाइल फोन की क्रांति ने मुंडेरों पर कौवे और गांव की गलियों में साइकिल की घंटी बजाते खाकी कपड़े पहने डाकिये को भी बदल दिया है। इन दिनों गांव की मुंडेरें उदास हैं। बुझी हुई आंखों से अपने खंडहर होते घर को कौन देखना चाहता है। बूढ़े मां-बाप धीरे-धीरे बुझी हुई आंखों से खंडहर घर और वीरान गलियों के मंजर को देख जीने की आस छोड़ते जा रहे हैं।

सच तो यह है कि आज गांव उजड़ते जा रहे हैं और इसके साथ ही बहुत कुछ ऐसा ही मृतप्राय हो गया है जो कभी इस देश की साझी विरासत, सौहार्द, परंपरा, भाईचारा और आम जान-पहचान का परिचायक था। गांव की बदली हुई तस्वीर बताती है कि गांव अपने कच्चे घरों और मुंडेरों पर पक्षियों को देख सहज मन के गंवई गीतों को भी भूल गया है। विकास का यह कैसा मंजर है दोस्तो, जहां सब कुछ खत्म हो गया लगता है! क्या मनुष्य के विकास के लिए ऐसी ही अवधारणा लिये नए शहर, नई सामाजिक कल्पना के स्मार्ट शहर होंगे, जहां पर सब कुछ यांत्रिक होगा?

आंगन में अब कुछ भी शेष नहीं। उदास, वीरान मुंडेरें घोर निराशा और हताशा के दृश्य दिखा रही हैं। एक ऐसा दृश्य, जिसमें भारत खंडहर और समाप्त होता जा रहा है और इंडिया डिजिटल। जीने के लिए क्या चाहिए! रोेजी-रोटी और एक छत। अगर यह भी हम नहीं दे सके तो फिर यह विकास हमारे इस बदलते हुए देश समाज और आम नागरिक को किस दिशा में ले जाएगा? यह सवाल मैं आप सब पर छोड़ता हूं। शायद आप भी इन शेष स्मृतियों से अपनी वीरान मुंडेरों को कुछ पल देख सकें।

 

 

 

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First Published on November 14, 2016 2:53 am

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