December 10, 2016

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दुनिया मेरे आगे: पूर्वग्रह के रंग

अभिनेत्री फ्रीडा पिंटो को लॉस एंजिल्स में एक गोरी अंग्रेज महिला ने कहा कि ‘काश, मेरा रंग तुम्हारी तरह होता! तुम्हारा रंग बहुत सुंदर है।’ कविता का लेख।

Author November 2, 2016 05:19 am
प्रतीकात्मक चित्र

कविता

अपने आसपास से लेकर संपर्क के दायरे में मौजूद किसी भी व्यक्ति को मैंने सांवले रंग प्रति उतना ही सहज आकर्षित कभी नहीं देखा, जितना कि वे गोरे रंग को लेकर मुग्ध दिखते हैं। एक तरह से यह समाज की सोच में घुल-मिल चुकी वह हकीकत है, जो सांवले रंग के किसी व्यक्ति के भीतर हीनताबोध थोपती है और गोरे रंग वाले किसी व्यक्ति को श्रेष्ठता का तमगा देती है। दरअसल, आज भी हमारा समाज सिर्फ गोरे रंग को ही सौंदर्य का प्रतीक मानता है। इस मानसिकता से आम महिलाओं के साथ-साथ उन अभिनेत्रियों को भी पीड़ित होना पड़ता है, जिनका रंग थोड़ा सांवला है। कुछ समय पहले ‘पार्च्ड’ फिल्म में अपने दमदार अभिनय के लिए तारीफ पानी वाली अभिनेत्री तनिष्ठा चटर्जी को टीवी पर एक कथित कॉमेडी शो में अपने सांवले रंग को लेकर जिस तरह की टिप्पणियां सुननी पड़ीं, वह किसी भी संवेदनशील व्यक्ति को असहज कर देगा। उनसे कहा गया कि लगता है आपको जामुन बहुत पसंद है… आप बचपन से जामुन खा रही हैं, जिसकी वजह से आपका मुंह काला है। तनिष्ठा को ये बातें बहुत बुरी लगीं और वे शो को बीच में ही छोड़ कर चली गर्इं।

हालांकि ऐसा पहली बार नहीं है जब हमारे देश में सांवली रंगत के लिए किसी को निशाना बनाया गया। इस तरह की टिप्पणियों का सामना एक आम सांवली लड़की रोज करती है। भारतीय समाज में न केवल ऐसी लड़कियों को, बल्कि पुरुषों को भी हमेशा कमतर समझा जाता रहा है। सांवले लोगों के लिए रंग ही उनकी पहचान बन जाता है। लोग उन्हें ‘काले रंग’ से संबंधित शब्दों के जरिए पुकारने लगते हैं। पुरुषों को तो फिर भी पितृसत्तात्मक समाज के ढांचे का कुछ फायदा मिल जाता है, लेकिन अगर कोई लड़की सांवली है तो उसे बचपन से ही इस बात का अहसास कराया जाता है कि सांवला होना उसकी सबसे बड़ी खामी है। आसपास के लोग, नाते-रिश्तेदार और यहां तक कि परिवार वाले भी अक्सर किसी न किसी बात के बहाने या फिर कभी मजाक में उसे यह अहसास दिलाते रहते हैं कि उसके शरीर की रंगत अच्छी नहीं है।

किसी लड़की को जब यह कहा जाता है कि ‘बेचारी सांवली है’ तो उसके दुख का सिर्फ अंदाजा ही लगाया जा सकता है, महसूस नहीं किया जा सकता। ‘सांवली है शादी कैसे होगी’, ‘गोरी होती तो अच्छी लगती’, ‘तुम्हारा कलर कितना डस्की है’ जैसी टिप्पणियां आम हैं। अगर किसी लड़की का दुख जाहिर हो गया तो उस पर लोग यह कह कर थोड़ा-सा मरहम लगाने की कोशिश करने लगते हैं कि ‘क्या हुआ सांवली है तो…! नैन-नक्श तो अच्छे हैं!’ इस तरह के रंगभेदी टिप्पणी करने वाले शायद ही कभी यह बात समझ सकें कि वे ऐसी बातें बोल कर न सिर्फ किसी को दुखी करते हैं, बल्कि उसके आत्मविश्वास को कमजोर करके उसे अंदर से खोखला कर देते हैं।

अभिनेत्री फ्रीडा पिंटो को लॉस एंजिल्स में एक गोरी अंग्रेज महिला ने कहा कि ‘काश, मेरा रंग तुम्हारी तरह होता! तुम्हारा रंग बहुत सुंदर है।’ इससे पहले अपने रंग को लेकर पता नहीं कितनी टिप्पणियां झेल चुकी फ्रीडा इस बात पर हैरान रह गर्इं। उन्होंने उस अंग्रेज महिला से कहा कि ‘जिस देश से मैं आई हूं, वहां सबको आप जैसी गोरी रंगत चाहिए।’ फ्रीडा का हैरान होना लाजिमी था, क्योंकि शायद ही कोई सांवली लड़की अपने लिए ऐसे तारीफ के शब्द सुन पाती है। वह कितनी भी पढ़ी-लिखी और कितना भी कौशल रखती हो, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता।

गोरा बनाने वाली क्रीम के विज्ञापन भी समाज की ऐसी ही मानसिकता को दिखाते हैं। मसलन, लड़की गोरी नहीं तो उसे नौकरी नहीं मिलेगी, शादी नहीं होगी, प्रोमोशन नहीं होगा वगैरह। और गोरा बनाने वाली क्रीम लगाते ही सब कुछ बड़ी आसानी से हो जाता है। ऐसा लगता है कि गोरा रंग होना ही अपने आप में एक कामयाबी है। बॉलीवुड के नामचीन सितारे इस तरह गोरा बनाने वाली क्रीम का धड़ल्ले से प्रचार करते हैं।गोरा होने में कोई बुराई नहीं है, लेकिन दुख इस बात का है कि गोरेपन को ही खूबसूरती का पैमाना मान लिया जाता है। लोगों को यह समझने की जरूरत है कि सांवले रंग की खूबसूरती कहीं से भी गोरे रंग से कम नहीं है। यह राहत की बात है कि इस मुद्दे पर कुछ लोग आगे आ रहे हैं।

इसमें बॉलीवुड के कई सितारों ने सांवली रंगत को कमतर मानने को पिछड़ी सोच बताया और फेयर ऐंड लवली जैसी गोरा बनाने वाली क्रीम का प्रचार करने से मना कर दिया। चेन्नई की एक महिला कविता इमैनुअल 2009 से ही ‘डार्क इज ब्यूटीफुल’ नाम से एक अभियान चला रही हैं। इसमें नंदिता दास, विशाखा सिंह जैसी कई मशहूर हस्तियों के साथ-साथ हजारों की संख्या में महिलाएं जुड़ी हैं, जिन्होंने ‘जो गोरा है, वही सुंदर है’ जैसे संदेश देने वाले विज्ञापनों और अवधारणा के खिलाफ अपनी आवाज बुलंद की है। दरअसल, अब वक्त रंग नहीं, सोच बदलने का है।

 

 

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First Published on November 2, 2016 5:19 am

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