January 21, 2017

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दुनिया मेरे आगे: श्रम की चक्की

भारत जैसे देश में इन दिनों ‘अल्कोहलिक’ यानी आदतन शराब पीने वालों की तर्ज पर लोगों के ‘वर्कोहलिक’ यानी काम को नशे की तरह करने वाला होने की उम्मीदें बढ़ गई हैं।

Author October 12, 2016 04:22 am
मजदूरी करता एक बालक।

उमेश चतुर्वेदी

हमें शायद यह पता भी नहीं हो कि हर साल अगर पूरे मनोयोग से भी काम करते हैं, कंपनी या सरकारी दफ्तर को लेकर हमारी निष्ठा बनी रहती है, हमारे नियोक्ता भी बेहतर हैं, इसके बावजूद हमें हर साल अड़तीस दिनों का वेतन नहीं मिलता। यह चौंकने वाली बात है, लेकिन हकीकत यही है। ब्रिटिश शोधकर्ताओं ने इस बारे में दुनिया के कुछ बेहतरीन नियोक्ताओं के यहां काम करने वाले लोगों के कामकाज के तरीके के अध्ययन के बाद यह रिपोर्ट जारी की है। आखिर कैसे निष्ठावान व्यक्ति को भी हर साल कम से कम अड़तीस दिनों का वेतन कम मिलता है। दरअसल, ऐसा कर्मचारी आमतौर पर सत्रह मिनट पहले काम करना शुरू करता है और पंद्रह मिनट देरी तक काम करता रहता है।

कई तो इससे भी ज्यादा देर तक काम करते रहते हैं। प्रतियोगिता के दौर में खासकर निजी क्षेत्र की नौकरियों में भारत जैसे देश में नियोक्ता भी चाहते हैं कि लोग देर तक काम करें और अपनी नौकरी और उपयोगिता बचाए रखने की चाहत और दबाव में कई कर्मचारी खुद भी ज्यादा देर तक काम करते रहते हैं। बहरहाल, हफ्ते में दो दिन के साप्ताहिक अवकाश के बावजूद एक औसत निष्ठावान कर्मचारी साल में तीन सौ पांच घंटे अधिक काम करता है, जिसे दिन के हिसाब के जोड़ें तो यह अड़तीस दिनों के बराबर होता है। जाहिर है, इतने दिनों का अलग से वेतन नहीं मिलता। इस अध्ययन में शामिल दो हजार लोगों में से छह प्रतिशत लोगों की राय यह थी कि उनसे अधिक समय तक काम करने की उम्मीद की जाती है। इनमें से एक तिहाई लोगों ने कहा कि दफ्तर से पहले निकलने में उन्हें अपराधबोध और असहजता महसूस होती है। इतना ही नहीं, काम खत्म होने के बाद घर से भी लोग सोलह मिनट घर से ई-मेल पढ़ने और उन्हें भेजने में लगाते हैं। यह पूरा समय मिला कर रोजाना करीब एक घंटा अठारह मिनट होता है, जो एक हफ्ते में साढ़े छह घंटे हो जाता है। जब लोगों से पूछा गया कि वे काम के घंटे खत्म होने के बाद क्यों काम करते हैं, तो इकतालीस फीसद लोगों ने स्वीकार किया कि उन्हें लगता है अपना काम ठीक से करने का यह एक ही तरीका है।

भारत जैसे देश में इन दिनों ‘अल्कोहलिक’ यानी आदतन शराब पीने वालों की तर्ज पर लोगों के ‘वर्कोहलिक’ यानी काम को नशे की तरह करने वाला होने की उम्मीदें बढ़ गई हैं। अब सरकारें भी इसी प्रवृत्ति को बढ़ावा दे रही हैं। सवा सौ करोड़ की आबादी वाले अपने देश में वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम की रिपोर्ट के मुताबिक सिर्फ 4.9 करोड़ लोग संगठित क्षेत्र में नौकरी कर रहे हैं। उनमें से एक करोड़ छिहत्तर लाख लोग ही सरकारी नौकरियों में हैं। इसके अलावा चौरानबे प्रतिशत लोग असंगठित क्षेत्र से अपनी रोजी-रोटी जुगाड़ने और घिसटते हुए जिंदगी गुजारने के लिए मजबूर हैं। नए काम का सृजन इसलिए नहीं हो पा रहा है कि पूरी व्यवस्था ही मुनाफाखोरी पर केंद्रित हो गई है। अब आर्थिक गतिविधियों के केंद्र में कल्याणकारी और ‘सर्वे भवंतु सुखिन:’ की अवधारणा पीछे छूट गई है। ऐसे में कर्मचारियों का शोषण बढ़ा है। सरकारी तंत्र और नीतियां इस शोषण को रोकने के बजाय श्रम सुधारों के बहाने और ज्यादा बढ़ाने में ही मददगार साबित हो रही हैं।

शायद यही वजह है कि भारत जैसे देशों में ऐसे अध्ययन को कभी मुद्दा नहीं बनने दिया जाएगा। वैसे भी मौजूदा माहौल में ऐसी सोच रखने वाले को ही बेवकूफ और आर्थिक सुधारों की राह का रोड़ा माना जाएगा। लेकिन यह अध्ययन रिपोर्ट एक तथ्य को जरूर सामने लाने में कामयाब हुई है कि श्रम की चक्की में पिसती दुनिया के लिए जिंदगी के मायने सिर्फ दौड़ते रहने तक सिमट गए हैं। भागते और हांफते रहने के बीच भी अगर इंसान अपनी आठ घंटे की ड्यूटी पूरी करने के बावजूद दफ्तर से निकलने को लेकर असहजता महसूस करता है तो मान लेना चाहिए कि सभ्यता बदल चुकी है। इस रिपोर्ट के बहाने एक बार फिर गांधी याद आते हैं। मनुबेन को लिखे अपने एक पत्र में वे कहते हैं कि मौजूदा शिक्षा पद्धति इंसान को जिंदगी भर सिर्फ भगाती रहती है। यही इस सभ्यता का मूल हो गया है। गांधी इसे बदलना चाहते थे, जिसमें इंसान जरूरी श्रम के बाद जिंदगी का पूरा आनंद उठा सके। लेकिन गांधी को हमने कितना स्वीकार किया है! मानवकेंद्रित विचारों की हकीकत की जिंदगी में अवहेलना के बाद सोचने को मजबूर होना पड़ता है कि क्या विचारधाराएं सिर्फ किताबी सोच के लिए होती हैं। उदारीकरण की भूल-भुलैया में मौजूदा सत्तातंत्र की राजनीति जिस तरह घूम रही है, उससे तो ऐसा ही लगता है!

 

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First Published on October 12, 2016 4:22 am

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