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दुनिया मेरे आगे- धारणाओंं की धुरी

मुझे यह समझ दी कि साफ-सफाई के काम को छोड़ कर कम से कम शहरों में अब बहुत सारे काम-धंधे का धर्म या जाति से बहुत ज्यादा लेना-देना नहीं है।
Author May 9, 2017 05:08 am
प्रतीकात्मक चित्र

रेणु राकेश   

हम एक बंटे हुए समाज में रहते हैं, जिसमें आमतौर पर लोगों के व्यवसाय भी निर्धारित माने जाते हैं! हमारी सोच भी इसी बनी-बनाई धारणा के इर्द-गिर्द घूमती है। हम बिना देखे-जाने यह मान लेते हैं कि अमुक व्यवसाय में लगा व्यक्ति अमुक धर्म या जाति का होगा। मैं जिस दुकान से मटन-चिकेन लेने अक्सर जाती हूं, कुछ समय पहले वहां गई तो मैंने रमजान का खयाल कर अनायास ही दुकानदार से पूछ लिया कि भाई साहब, आजकल तो आपके रोजे चल रहे होंगे! उन्होंने बिना बोले अपनी कुर्सी पर बैठे-बैठे ऊपर की ओर इशारा किया। मैं अपनी मतांधता पर शर्मिंदा हो गई। मेरी आंखों की सीध में मंदिर था, उसमें शिव की मूर्ति थी। लेकिन यह मेरे भीतर पैठी भ्रामक धारणा ही थी, जिसने मेरी खुली आंखों पर भी परदा डाल रखा था!

इस घटना ने मुझे यह समझ दी कि साफ-सफाई के काम को छोड़ कर कम से कम शहरों में अब बहुत सारे काम-धंधे का धर्म या जाति से बहुत ज्यादा लेना-देना नहीं है। लेकिन अपनी राजनीति की रोटियां सेंकने वाले इन्हीं को मुद्दा बना कर जन-भावनाओं का दोहन करते हैं। आज जब देश की जनता भूख, गरीबी, अशिक्षा, बेरोजगारी से जूझ रही है, स्वास्थ्य और पर्यावरण की चुनौतियां मुंह बाए खड़ी हैं, ऐसे में हम धर्म, जाति, संप्रदाय, गाय, सूअर के नाम पर खून-खराबा मचा रहे हैं। इसी क्रम में हाल के एक अनुभव ने मुझे उद्विग्न कर दिया। सब्जी मंडी में गायों का होना आम बात है। उसका सब्जी के ठेलों और दुकानों पर मुंह मार देना और दुकानदार का उसे भगाना बड़ा स्वाभाविक है। इसे लेकर सभी सहज हैं। कुछ समय पहले मैं जिस दुकान से सब्जी लेने पहुंची वहां मुझसे पहले एक सज्जन सब्जी लेकर स्कूटर स्टार्ट कर रहे थे कि अचानक गाय ने सब्जी पर मुंह मार दिया। दुकानदार ने उसे हटाने के लिए आनन-फानन में बट्टा उठा कर हल्के से चलाया। बट्टा गाय की गर्दन के निचले हिस्से को छूता हुआ जमीन पर गिरा। शायद दुकानदार भी उसे सिर्फ डराना चाहता हो! अचानक स्कूटर पर सवार व्यक्ति आगे आया और आवेश में बोला- ‘तुझे शर्म नहीं आती, हिंदू होकर गाय को मारता है? मुसलमान है क्या?’ उसने दो-चार गालियां भी दीं। जब वहां उसके साथ कोई और नहीं बोला तो खुद को अकेला पाकर वह निकल गया, लेकिन मेरे सामने कई सवाल छोड़ गया। उसे कैसे मालूम कि दुकानदार हिंदू ही है! क्या केवल हिंदू ने गाय की रक्षा का जिम्मा उठा रखा है? क्या केवल गाय रक्षणीय है, पशु मात्र की रक्षा क्या मनुष्य का दायित्व नहीं? आजकल जब गाय पर राजनीति गरमाई हुई है, गायों की रक्षा के नाम पर कुछ लोग इंसानों को बर्बरता से मार रहे हैं, तब इस तरह की सामान्य घटनाएं भी अकल्पनीय रूप ले लेती हैं।

विभाजन की त्रासदी पर आधारित भीष्म साहनी की कहानी ‘अमृतसर आ गया’ इस विडंबना को उघाड़ती है कि बहुसंख्यक का बल पाकर हम भी वही अन्याय करते हैं, जिसका हम विरोध कर रहे होते हैं। किसी भी जीव पर होने वाले अन्याय, अत्याचार, शोषण का विरोध और प्रतिरोध होना ही चाहिए, लेकिन व्यावहारिक तौर पर ऐसा कम ही होता है। ऐसे में अगर सत्ता का संबल मिल जाए तो मनुष्य के भीतर पैठी हिंसक प्रवृत्तियां सक्रिय हो उठती हैं। स्त्री के संदर्भ में भी यही मानसिकता और प्रवृत्तियां संचालित हैं। स्त्री का ‘गऊ’ होना तो समाज में वांछनीय है। दूसरी ओर, जो पुरुष अपनी ‘गऊ’ की रक्षा करता है, वही किसी दूसरी स्त्री का बलात्कार भी कर सकता है और अपनी इन आपराधिक वृत्तियों को कभी धर्म-रक्षा तो कभी जाति के सम्मान का जामा पहना कर ढांपने की कोशिश करता रहता है। गाय की रक्षा की खातिर हत्या करने वालों को सड़कों पर आवारा घूमती, गंदगी खाती गायें दिखाई नहीं देतीं! ज्यादा दूध के लिए जिस तरह हारमोन के इंजेक्शन देकर उनके स्वास्थ्य के साथ खिलवाड़ किया जाता है या बछड़े को पूरे पोषण से वंचित रखा जाता है, क्या यह सब अन्याय नहीं! इन मुद्दों पर चुप्पी क्यों रहती है! गौ-पालक हिंदू ही होता है और वह कभी गाय के प्रति हिंसक नहीं हो सकता, यह भ्रम है।

अपनी संस्कृति पर हरेक को गर्व होना चाहिए, मगर उसकी रक्षा के नाम पर हत्या स्वीकार्य कैसे हो सकती है! हम जिस साझी विरासत के वारिस हैं, उसे ‘हम’ और ‘वे’ में बांट कर न तो उसे बचा पाएंगे, न कुछ हासिल कर पाएंगे। इतिहास से जो सबक नहीं लेता है, वह दीर्घजीवी नहीं हो सकता। आधुनिक मानसिकता ने धर्म को व्यक्तिगत आस्था का विषय बनाया था, तार्किक और बौद्धिक सोच-विचार का मार्ग खोला था। लेकिन आज धर्म को धुरी बना कर, तार्किकता और बौद्धिकता को दरकिनार कर हम अपनी मध्ययुगीन मानसिकता का ही परिचय दे रहे हैं। अगर ऐसे ही चलता रहा तो बहुत जल्द इकबाल की यह पंक्ति झूठी पड़ जाएगी कि ‘कुछ बात है कि हस्ती मिटती नहीं हमारी…!’

 

 

 

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