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जीवन की सांझ

इधर बहुत दिनों के बाद मेरा अपने एक आत्मीय बुजुर्ग दंपति के घर जाना हुआ।
Author May 16, 2017 05:47 am
प्रतीकात्मक चित्र

कविता भाटिया

इधर बहुत दिनों के बाद मेरा अपने एक आत्मीय बुजुर्ग दंपति के घर जाना हुआ। लेकिन इस बार मिलने पर उनके चेहरे की रेखाएं ज्यादा गाढ़ी दिख रही थीं। घर में सन्नाटा और आंखों में सूनापन पसरा हुआ था। कुछ देर इधर-उधर की बातों के बाद मैंने संकोच के साथ ही अपनी जिज्ञासा उनसे साझा की और उनकी बहू और नटखट पोते के बारे में पूछा। मेरे इस सवाल पर दंपति ने एक-दूसरे की आंखों में देखा और बताया कि उनकी बहू उनके पोते सहित घर छोड़ मायके चली गई है। कमरे के एक कोने में पोते की मुस्कराती तस्वीर को देख उन्होंने आह भरी। मेरी नजरों से छिपने की विफल कोशिश करते हुए उन्होंने फुर्ती से अपना चश्मा उतार कर आंखों के नम कोरों को पोंछ लिया। कुछ विस्तार से उन्होंने जो बताया, उससे यही लगा कि युवाओं में अपनी तरह से स्वच्छंद जिंदगी जीने की चाह, अपनी निजता, बुजुर्गों को बोझ समझना और इससे मिलते-जुलते अनेक कारण इसके मूल में हैं। उस उदास बातचीत के बाद मेरा ध्यान अपनी एक परिचित की ओर भी गया जो पिछले पंद्रह सालों से अपने इकलौते बेटे और बहू से अलग रह रही थी। यहां भी बहू का ह्यमैंह्ण और निजता के साथ स्वभाव ही अलग होने का कारण बना था। ऐसे में लकवाग्रस्त मौसा की तबियत अचानक बिगड़ने या कोई अन्य जरूरत पड़ने पर मौसी एंबुलेंस बुला कर उन्हें अस्पताल ले जाती थीं।

ऐसी घटनाएं और दृश्य आज हर दूसरे घर में दिखाई देते हैं। वास्तव में उम्र के चौथे पायदान की इस अवस्था में वृद्ध व्यक्ति को अपनी संतान से शारीरिक, नैतिक, वित्तीय और सबसे अधिक भावनात्मक सहारे की आवश्यकता होती है। लेकिन आज के भौतिकवादी स्वार्थी समय में हमारी धरोहर कहे जाने वाले ये बुजुर्ग लगातार उपेक्षित हो रहे हैं। युवा पीढ़ी से ह्यजेनरेशन गैपह्ण के कारण ये नागरिक परिवार और समाज से अलग-थलग हाशिये का जीवन जीने को अभिशप्त हैं। समय के साथ न चलने का आरोप इन पर अक्सर लगाया जाता है और नई पीढ़ी के साथ इन्हें कदमताल करने में असमर्थ माना जाता है। युवा पीढ़ी इन्हें बोझ मान कर इनकी उपेक्षा करने लगती है। संयुक्त परिवारों की बुनियाद पर टिकी कौटुंबिक भावना आज छीज रही है। नतीजतन, समाज में भी विशृंखलता आई है। ह्यघरह्ण की अवधारणा सिमट रही है। ऐसे में तनाव, कुंठा, उपेक्षा, खालीपन और अकेलेपन का अहसास इन नागरिकों के ह्यस्वह्ण को लहूलुहान करता है और आज यह वर्ग अपनों की नजर में ही गैरजरूरी और बोझिल बन गया है।

आज विडंबना यह है कि पूरे परिवार पर बरगद की तरह छांव फैलाने वाला व्यक्ति वृद्धावस्था में अकेला, असहाय और बहिष्कृत जीवन जीता है। आज आपाधापी के युग में बुजुर्गों के सम्मान की संस्कृति सिकुड़ने लगी है। अपनी संतान से मिली उपेक्षा और अवमानना उन्हें अकेला और अवसादग्रस्त बना देती है। ऐसे में परिवार में अपनी अहमियत में कमी आने के कारण शहर, कस्बे और कॉलोनी में बने पार्कों में इनके समूह देखे जा सकते है, जहां ये लोग सुबह-शाम आपस में मिल बैठ कर अपने सुख-दुख साझा करते हैं।हेल्प एज इंडिया के एक शोध के अनुसार अपने परिवार के साथ रह रहे लगभग चालीस प्रतिशत बुजुर्गों को मानसिक और शारीरिक प्रताड़ना का शिकार होना पड़ता है। जीवन का विशद अनुभव होने के बावजूद कोई उनकी राय न तो लेना चाहता है और न ही उनकी राय को महत्त्व दिया जाता है। आज हमें अपनी संतान की परवरिश का तो ध्यान है, पर अपने माता-पिता के लिए समय निकालना हमें गैरजरूरी लगता है। उनके प्रति हम अपने कर्तव्य से विमुख हो रहे हैं। देश-विदेश में वृद्धाश्रमों की बढ़ती संख्या उनकी इसी उपेक्षा का प्रमाण है। समाज कल्याण के मोटे अनुमान के मुताबिक 2009-10 में देश में वृद्धाश्रमों की संख्या सवा सात सौ से ऊपर थी और यह संख्या लगातार बढ़ रही है।

वृद्धाश्रमों की संस्कृति ने बडेÞ शहरों को ही नहीं, बल्कि छोटे शहरों को भी अपनी चपेट में लेना शुरू कर दिया है। विकसित देशों में तो ह्यओल्ड एज होमह्ण सामान्य-सी बात हो गए हैं।बुजुर्ग या वरिष्ठ नागरिक समाज की अमूल्य विरासत होते हैं। उन्हें जीवन के विभिन्न क्षेत्रों का अनुभव होता है। आज का युवा समाज और देश को ऊंचाइयों पर ले जाने के लिए इनके अनुभव का लाभ उठा सकता है। जीवन की सांध्य वेला में उन्हें यह अहसास कराए जाने की जरूरत है कि वे हमारे लिए बहुत महत्त्व रखते हैं। हमें यह सामाजिक चेतना फैलानी होगी कि वृद्ध हमारी जिम्मेदारी नहीं, आवश्यकता हैं। हमें सोचना है कि कल हमें भी इसी अवस्था में पहुंचना है और हमारे बच्चों को युवा होना है। वे जीवन के अनुभवों के खजाने हैं, जिन्हें सहेज कर रखना हर समाज और संस्कृति का नैतिक दायित्व है।

 

 

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First Published on May 16, 2017 5:47 am

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