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दुनिया मेरे आगे: सरोकार का पाठ

लगभग दस-बारह साल पहले दिल्ली के पुस्तकालयों में खूब रौनक और चहल-पहल देखी जा सकती थी।
Author January 31, 2017 04:22 am
किताबों के साथ अनजाने में हुई यह लापरवाही उनके बीच तोहमतों की ऐसी दीवार खड़ी करती है जो दोनों के बीच नाकाबिले बर्दाश्त है।

शिप्रा किरण

लगभग दस-बारह साल पहले दिल्ली के पुस्तकालयों में खूब रौनक और चहल-पहल देखी जा सकती थी। वह वहां रखी किताबों और उनके पाठकों की रौनक थी। तब दिल्ली के कुछ पुराने पुस्तकालयों में से एक दिल्ली पब्लिक लाइब्रेरी की सदस्यता की कई शर्तों में एक यह भी थी कि आपके पास दिल्ली का निवासी होने का कोई एक प्रमाण होना चाहिए। मुझे याद है कि कॉलेज में साथ पढ़ने वाले मूल रूप से दिल्ली के निवासी साथियों की साथ दूसरे शहर से आए साथी भी बड़ी शिद्दत से पुस्तकालय की सदस्यता पाने के रास्ते तलाशते और आखिरकार सफल भी हो जाते। तब सदस्यता-खिड़की के सामने लंबी कतारों में खड़े होकर अपनी बारी की प्रतीक्षा करना और सदस्यता मिल जाने पर लाइब्रेरी कार्ड को हाथों में लेकर गर्व-मिश्रित प्रसन्नता का अनुभव किसी बड़ी उपलब्धि का अहसास कराता। ऐसा लगता जैसे कोई बड़ा खजाना हाथ लग गया हो।

सचमुच वह खजाना ही तो था… किताबों का खजाना… नई-पुरानी किताबों का। किताबों के पन्नों की खुशबू और उनके पीले पड़ गए पन्ने हमारे अतीत और इतिहास का साक्षी बन हम पाठकों की अंगुली थाम अपने साथ लिए जाते। एक अजीब-सा सम्मोहन था पुस्तकों और पाठकों से बने उस माहौल में। लेकिन बीते कुछ सालों में जैसे-जैसे समाज पर बाजार का दबाव बढ़ा और साथ ही हमने तकनीक के स्तर पर भी तरक्की कर ली, वह शिद्दत और रौनक कम होती गई। यह सिर्फ दिल्ली पब्लिक लाइब्रेरी की कहानी नहीं, बल्कि शहर और देश के अन्य पुस्तकालयों की भी लगभग यही स्थिति है। साहित्य अकादेमी के समृद्धतम पुस्तकालय में भी चुनिंदा लोग ही नजर आते हैं। खासकर युवा पाठकों की संख्या तो लगातार कम होती गई है। वहां के अध्ययन कक्ष में गंभीर पाठक के रूप में अधिकतर हमारे वरिष्ठ और बुजुर्ग ही दिखाई देते हैं। गंभीर युवा पाठक इक्का-दुक्का ही दिखाई देंगे।

गलाकाट प्रतिद्वंद्विता के दौर में जैसे-जैसे समय बदल रहा है, वैसे-वैसे विद्यार्थियों और युवाओं में पुस्तकों और पुस्तकालयों का आकर्षण और अधिक बढ़ना चाहिए था। लेकिन आज की युवा पीढ़ी ने खुद को ‘इंस्टेंट फूड’ यानी तत्काल खाना की तरह ‘इंस्टेंट ज्ञान’ तात्कालिक ज्ञान तक ही सीमित कर लिया है। वह कम समय में और सिर्फ काम भर की जानकारी चाहती है। इस शॉर्टकट ज्ञान के मोह में वह पुस्तकालय की तरफ न जाकर इंटरनेट की तरफ भागती है। जहां सूचनाओं की भरमार तो है पर ज्ञान की गहराई और उसकी व्यावहारिक समझ नहीं। विद्यार्थियों को परीक्षा पास करने भर जानकारी तो मिल जाती है, पर ज्ञान उथला रह जाता है।

पुस्तकालय का अर्थ पुस्तकों का भंडार या पुस्तकों को दिया गया एक स्थान मात्र नहीं, बल्कि इससे कहीं ज्यादा है। इसके वृहद सरोकार हैं। ये हमें पीढ़ियों के ज्ञान और उसकी पूरी परंपरा से जोड़ते हैं। यह लगाव केवल मानसिक स्तर पर ही नहीं, बल्कि भावनात्मक स्तर पर भी समृद्ध करता है। हमारे वर्तमान और अतीत के बीच किसी सेतु की तरह दृढ़ता से टिके ये पुस्तकालय ज्ञान के साथ-साथ हमारे सामाजिक-राजनीतिक विकास का भी स्रोत हैं। वैसे भी ज्ञान का अर्थ मात्र कुछ किताबों के अध्ययन तक सीमित नहीं है, बल्कि जानकारियों का आदान-प्रदान भी ज्ञान के ही जरूरी अवयव हैं। पुस्तकालय इस आदान-प्रदान को वृहद माध्यम उपलब्ध कराते हैं।

एक ही छत के नीचे जब व्यक्तियों का समूह कुछ लिख-पढ़ कर उस लिखे-पढ़े पर विचार-विमर्श और बहस करता है तो कहीं न कहीं अपनी सामूहिकता में वह अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के साथ-साथ भारतीय लोकतंत्र की जड़ों और ज्ञान की परंपराओं का आधार मजबूत कर रहा होता है। साथ ही प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष तौर पर वह वैचारिक और सामाजिक सहिष्णुता की तरफ भी कुछ कदम आगे बढ़ता है। वह अपने भीतर भिन्न-भिन्न विचारधाराओं और विपरीत मतों को सम्मान देने की क्षमता का विकास करता है। मशीनी हो चले संबंधों और भावनात्मक अलगाव के इस असंवेदनशील समय में पुस्तकालय हमें ऐसा मंच भी उपलब्ध कराते हैं जहां पुस्तकों के माध्यम से हम सामाजिक और वैयक्तिक स्तर पर भी एक दूसरे से जुड़ पाते हैं।

आज परिवारों और शिक्षकों के लिए बच्चों के भीतर अध्ययन और पठन-पाठन के प्रति रुचि पैदा करना और उनमें पढ़ने की ललक जगाना भविष्य के लिए बहुत जरूरी है। यह किसी चुनौती से कम नहीं। युवा पीढ़ी को भी यह समझना होगा कि अध्ययन एक सतत चलने वाली प्रक्रिया है। इस प्रक्रिया से गुजर कर ही व्यक्तित्व का संपूर्ण विकास संभव है। इसी प्रक्रिया का आधार हैं पुस्तकालय। पुस्तकालयों की मजबूत दीवारों और ऊंची छतों जैसा आकर्षण और सुरक्षा इनके अतिरिक्त कहीं और नहीं। किताबों के पन्नों से निकली ध्वनियां और उन्हें छूकर महसूस हुई आत्मीयता आॅनलाइन पुस्तकालयों और ई-पुस्तकों से नहीं हासिल की जा सकती। यह ठीक है कि तकनीकी विकास किसी भी राष्ट्र के विकास की सहज प्रक्रिया का एक महत्त्वपूर्ण हिस्सा है, लेकिन इन पुस्तकालयों और किताबों का दूसरा कोई विकल्प नहीं।

 

 

 

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