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दुनिया मेरे आगे: सम्मान का परदा

जनगणना के आंकड़े बताते हैं कि हम एक अशिक्षित समाज से शिक्षित समाज में तब्दील हो चुके हैं।
Author November 8, 2016 05:02 am
प्रतीकात्मक तस्वीर।

प्रतिभा कटियार

हम पढ़ने-लिखने वाले लोग और समाज हैं। जनगणना के आंकड़े बताते हैं कि हम एक अशिक्षित समाज से शिक्षित समाज में तब्दील हो चुके हैं। हमने पहले की अपेक्षा ज्यादा डॉक्टर, इंजीनियर, आइएएस पैदा किए हैं। लेकिन यह डिग्रीधारी समाज सचमुच शिक्षित हुआ भी है क्या, इस पर काफी सवाल हैं। हमारी सोचने-विचारने की गति और दिशा कहां से तय होती है? क्या हम खुद तार्किक होते हैं या हवाओं के रुख के साथ चल पड़ते हैं। परंपरा से चले आ रहे व्रत या त्योहारों के सारे विधान सहज होकर पूरा करते हुए शायद ही कोई इसके निहितार्थों के बारे में विचार करता है। मैंने जब सोचना शुरू किया था तब बहुत बोलने का मन करता था। लेकिन जब आसपास के समाज को खुद में मशगूल देखती रही तो मैंने चुप्पी को चुन लिया। लेकिन इस बार कुछ समय पहले जब करवाचौथ गुजरा तो कम से कम हमारे उत्तराखंड में एक नया पहलू जुड़ गया, जब राज्य सरकार ने इस व्रत के दिन ही छुट्टी घोषित की और इसे ‘महिला सम्मान दिवस’ के रूप में मनाने का फैसला किया। इस खबर ने सुबह-सुबह अदरक-इलायची वाली चाय का जायका बिगाड़ दिया।

दरअसल, पितृसत्ता का यह खेल स्त्रियों के खिलाफ है और ऐसा लग रहा है मानो यह महिलाओं के हक में लिया गया कोई फैसला है। सवाल है कि महिला सम्मान दिवस मनाने के लिए स्त्रियों द्वारा पति की लंबी आयु की कामना करने वाले इस निर्जला उपवास को क्यों चुना गया? इस तरह तो बहुत सारे व्रत-उपवासों को भी ऐसे ही देखे जाने की जरूरत होगी? ऐसी कवायदों के पीछे खेल यह है कि बाजार-प्रिय व्रत-त्योहारों के बढ़ते जाने से सबका फायदा है, सिवाय उस स्त्री के, जो इसके निशाने पर है। वह खुशी-खुशी सज-संवर कर, तैयार होकर न सिर्फ पितृसत्ता की जड़ें मजबूत कर रही है, इससे खुश भी है। सवाल सिर्फ करवाचौथ का नहीं है, संपूर्णता में हमारे सोचने और विचार करने का है। क्यों किसी स्त्री ने खुद आवाज नहीं उठाई कि ‘महिला सम्मान दिवस’ के तौर पर मनाने के लिए क्या यही त्योहार मिला था? यह स्त्रियों को तोहफा नहीं है, पितृसत्ता को मजबूत करने की एक और कवायद है। सरकार की भूमिका होती है कि वह ऐसे समाज का निर्माण करे जहां सबके हितों की रक्षा हो। मगर समता, समानता के समाज की संविधान की परिकल्पना को सरकारें इस तरह मुह चिढ़ाएंगी तो क्या उम्मीद की जा सकती है!

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अभी हम इन बातों पर बहस में उलझे थे कि हमारी शिक्षा हमें कितना तार्किक बना रही है! क्या हम वैज्ञानिक सोच के समाज होने की ओर अग्रसर हो सकेंगे कभी? लेकिन अब ऐसा लगता है कि भविष्य में पाठ्यपुस्तकों में करवाचौथ, अहोई अष्टमी आदि की कथाएं शामिल हो जाएं तो हैरानी की बात नहीं। महिला सम्मान दिवस के तौर पर करवा-चौथ मनाते हुए शायद ही किसी के मन में खयाल आए कि यह असल में महिलाओं के अस्तित्व और अस्मिता के सवाल को खारिज कर पीछे जाने के रास्ते पर बढ़ना है। पितसत्ता का खेल ही यह है कि सवाल उठाती और अपने अधिकारों को लेकर सजग होती स्त्री को एक सिंहासन बना कर उस पर बिठा दिया जाए। उनकी ममता और समर्पण, उनकी खामोश रह कर सब सहने की शक्ति, अपने नहीं दूसरों के लिए सोचने, खुद भूखे रह कर परिवार का पेट भरने, खुद एनीमिया से जूझते हुए मुस्कुराते रहने, बीमारी की हालत हो या गर्भ का नौवां महीना, उनके निर्जला व्रत रह कर पति और पुत्र की लंबी आयु की कामना करने के जयकारे लगाए जाएं। उन्हें बताया जाए कि देखो महिलाओ, तुम्हारे इस सब ‘त्याग’ को महिला सम्मान दिवस से विभूषित किया गया है।

महिलाओं के लिए शिक्षा, सेहत और रोजगार सुनिश्चित करने, अस्तित्व और अस्मिता के सवालों से जूझने के लिए चेतना के स्तर पर विकास के रास्ते की मांग करती और अधिकारों के लिए लड़ती स्त्री सम्मान के काबिल नहीं है। इन सबके बजाय परंपरा के नाम पर अपने बजाय दूसरों के जीवन की कामना करने को महिला सम्मान के रूप पेश करना एक अजूबा ही है। कई बार ऐसा लगता है कि गैरबराबरी की बुनियाद पर टिके पितृसत्ता के सिंहासन पर बैठना स्त्रियों को भी अच्छा लगता है। अक्सर प्रगतिशील महिलाएं भी अपनी प्रगतिशीलता को कुछ देर के लिए स्थगित कर देती हैं। मेहंदी, चूड़ी, गहनों से चमकता बाजार खींचता है। धर्म, आस्था, फैशन और बाजार तक आते हुए हम भूल गए कि भाई द्वारा ढेर सारा सामान लेकर न पहुंचने पर छोटी बहू को ताने मारने वाली करवाचौथ की कथा के भीतर किस तरह का मर्म है छिपा है। पति की लंबी आयु के लिए एक भाई का होना जरूरी है, उसका धन-धान्य से परिपूर्ण होना जरूरी है तभी व्रत सफल होगा! बाजार के उत्सवों की चमक को बढ़ाने वाले व्रत के जरिए महिलाओं के सम्मान का खयाल इस तरह किया जाएगा, यह सोच कर हैरानी होती है।

 

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