March 23, 2017

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दुनिया मेरे आगे: एकांत का शोर

हमें तो वहीं अच्छे स्कूल में पढ़ने जाना था। अब जब जाना तय है तो छूटता गांव आंख में पानी बन कर तैर क्यों रहा है! शैलजा पाठक का लेख।

Author October 14, 2016 04:25 am
बचपन।

शैलजा पाठक

वह ‘लौवा लाठी चंदन काठी, एक हाथ पचक्का…छ कहता, फिर हमारी हथेलियां जमीन पर बिछा कर रगड़ देता। मैं जब रोने लगूं, तब तक वह हाथ का पचक्का बना कर रखता। जैसे हाथ छोड़ता, वैसे ही भाग जाता। आवाज लगाता हुआ कि जा-जा… शहर जाने वाली है न पढ़ने! ये बचपन के दोस्त भी दूर होने से बहुत डरते थे। अपने मन की कहते तो थे, लेकिन अजीब तरीके से। आखिर बच्चे जो थे। फिर भी जो कहा जाता था, उसका मतलब भी समझ लिया जाता था…! हम भी अपना सामान बांध रहे थे।

हम पास बैठे कच्चे आम कुतर रहे थे। उसकी हथेली पर नमक था। मैं उस नमक में आम छूने गई तो उसने हथेली परे कर ली और कहा कि ऐसा स्वाद होगा जिंदगी में… बेनमक! सुन न..! खारे पानी का सोता हैं मेरी आंखें। जब जिंदगी बेस्वाद लगे, मुझसे मिलने आ जाना। तुम इनाम जीतना स्कूल में! वह सब कुछ हार रहा था जैसे उस वक्त। और इधर मुझे बड़े शहर के बड़े मंच पर नाटक करना था… यूनिफॉर्म पहनना था!पहली बार का शहर आंखों में रात भर नाचता रहता है मेरे! कितनी चमक-दमक से लबरेज शहर है! चारों तरफ चमकती हुई बिजली है वहां… अच्छे दिखने वाले कपडेÞ पहन कर सभी लोग रिक्शा में बैठे सफेद और नीली यूनिफॉर्म पहन कर स्कूल जाते थे। वहां शहर के चौराहे पर एक बड़ा-सा बोर्ड है, जिस पर करीने से टंगी एक सफेद लाइट जलती रहती। उसमें विज्ञापन था- नटराज पेंसिल का… और था अमूल अटली-बटली का प्रचार! हम तो वहीं खड़े होकर देखते रहते… बाप रे… कितना बड़ा फोटो! हमें तो वहीं अच्छे स्कूल में पढ़ने जाना था। अब जब जाना तय है तो छूटता गांव आंख में पानी बन कर तैर क्यों रहा है!

समझ में नहीं आया कि गिल्ली-डंडा वापस करते समय मंजुला क्यों इतनी अनमनी लगी कि पलट कर भाग गई। एक डिब्बे में कंचे भरे तो दोस्तों का शोर क्यों भर गया उस डब्बे में कि हिलाते ही कलेजा कांप जाए जैसे! अब सामान तो सब बांध लिया गया। सब दोस्तों ने अपनी पसंद की निशानी भी दी कि शायद इसे भी पसंद हो। कोई रूमाल, कोई स्याही वाली पेन, कोई नई कहानी की किताब, कोई अपना बनाया हुआ चित्र वगैरह! लेकिन उस रूठे दोस्त का क्या करूं! मेरी हथेलियां जमीन में रगड़ कर कैसे तो भाग गया! गांव के पश्चिम में एक तालाब है। हम वहीं जाकर आसपास की र्इंट बटोर कर उसमें डालते रहते। वहीं होगा शायद!

महिंद्रा की परदे वाली जीप में हमारा सामान रखा जा रहा था। मैं तालाब के किनारे उसे खोजती उसके पास थी, एक नई जोड़ी पेन लेकर- ये ले तेरे लिए…! वह बिना कुछ बोले ले लेता। बदले में चुप…! मैं शहर जा रही हूं जीप से। खूब सामान है साथ में। वह चुप था। उसके पास एक धागा था, जिसे अपनी चारों उंगलियों में फंसा कर उसने मेरी तरफ कर दिया। फिर मुझसे बोला कि इसके बीच में हाथ डाल, पकड़ लिया तो मत जाना… छूट गई तो मैं हारा। तू चली जाना! मैंने हाथ डाला तो डोरिया उलझ गई!

लेकिन मैंने जबरन निकाल लिए अपने हाथ। जीप पर सामान रख दिया गया है। सब अब जाने वाले हैं। मुझे रोशनी वाला शहर बुला रहा है। मैं भाग कर जीप में पिछली सीट पर बैठ गई। गांव धीरे-धीरे पीछे छूट रहा था। तालाब पर पत्थरों की चोट से घायल तालाब का पानी इधर-उधर भाग रहा था। समय आज तालाब, गांव, झील, रोशनी और शहर- सबको पार करता आज ठहर गया है। तुझे कितनी बार याद किया…! शहर के उन बड़े-बड़े प्रचार वाले बोर्ड में बड़ी सफेद लाइट जलती है दोस्त! कई बार उभरता है तेरा चेहरा! जमीन पर मैं खुद रगड़ती हूं अपना हाथ… रोती भी हूं! लेकिन इस बार वजह कुछ और है!
हां, रहते हैं मेरे मन में वे दोस्त, जिनसे एक बार मिलने की खातिर दोहाराऊंगी मैं ऐसी कहानी। कोई मदत (!!!) एक बिसरा दोस्त… तालाब… जीप के पीछे थमा गांव… एकांत का शोर… कंचे में घूमती है दुनिया…! जरा रोक ले कोई! सुन यार हथेली का नमक इधर कर न…! बड़ी बेस्वाद जिंदगी है। एक गुलाबी कांपती हथेली पर कितने मोती ढलक गए! बड़े महानगरों में सच… मन करता है कि कई बार लाल बत्ती जल रही हो और सड़क पार कर लूं!
हिसाब से आंख भी नहीं भरते! किताब में वह छिपा बैठा मुस्कराता है- बचपन के दिन भुला न देना…!

 

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First Published on October 14, 2016 4:25 am

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