December 03, 2016

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दुनिया मेरे आगे: परिवेश का पाठ

दूसरा घटक तकनीक है, जिसने धीरे-धीरे बच्चों की पारंपरिक सहगामी क्रियाओं, खेलों, मनोरंजनों का गला घोंटा दिया।

Author October 24, 2016 04:28 am
प्रतिकात्मक तस्वीर।

अपनी सामाजिक रिवायतों के बीच पलते-बढ़ते और बच्चों के प्रति एक खास मानस में जीते हुए हम कैसे अपनी भावी पीढ़ियों को नुकसान पहुंचाते हैं, यह हमें शायद पता भी नहीं चलता। मसलन, आज हम बच्चों पर होने वाले चौतरफा प्रहार को बेशक नजरअंदाज कर दें, लेकिन उसके दूरगामी घातक परिणाम आखिर हमें ही झेलने पड़ते हैं। हम अंदाजा भी नहीं लगा सके कि नब्बे के दशक के बाद और इस सदी के शुरुआती दौर में बच्चों पर कई प्रकार के दबाव और तकनीकी प्रभाव उभर कर सामने आए। हमें उन तमाम घटकों की प्रकृति और बुनावट को पहचानने की जरूरत है जो बच्चों से बचपन को छीन लेने पर आमादा हैं। इनमें सबसे मजबूत घटक है विभिन्न माध्यमों में बच्चों के लिए आयोजित होने वाली प्रतियोगिताएं।

मैं प्रतियोगिताओं से परहेज करने की बात नहीं कर रहा हूं। लेकिन उन प्रतियोगिताओं के बाजार के दर्शन और सिद्धांतों से असहमति होती है, क्योंकि इन मंचों पर प्रतियोगिता के साथ कुंठा, निराशा, दुश्चिंता को धीरे से सरका कर किनारे कर दिया जाता है। दूसरा घटक तकनीक है, जिसने धीरे-धीरे बच्चों की पारंपरिक सहगामी क्रियाओं, खेलों, मनोरंजनों का गला घोंटा दिया। कभी समय था जब बच्चे पत्रिकाएं, कहानी की किताबें आदि पढ़ते थे। अब न किताबें रहीं और न घर में पढ़ने का माहौल। इस संस्कृति को विकसित करने में टीवी की बड़ी भूमिका रही। भूमिका तो सूचना और तकनीक क्रांति की भी कम नहीं रही, जिसने खेल के सामान छीन कर बच्चों के हाथों में स्मार्ट फोन, टैबलेट्स, आईपैड पकड़ा दिए। फोन में होने को तो ‘वडर््स गेम’ भी होते हैं, जिससे अपने शब्द-भंडार को बढ़ाया जा सकता है, लेकिन उसकी जगह पर गेम खेलने की प्रवृत्ति ज्यादा विकसित होती गई। इसके अलावा, हमारे बीच से पढ़ने-सुनने और सुनाने की आदतें छीजती गई हैं।

टीवी चैनलों पर बच्चों के लिए सामग्री के नाम पर जिस प्रकार के जाल बिछाए गए उनमें हमारे अभिभावक, बच्चे और हमारा नागर समाज धीरे-धीरे फंसता चला गया। हमें सामग्री और उसकी उसकी प्रस्तुति के स्तर और दर्शन पर सवाल उठाना चाहिए था। लेकिन हमने, बगैर विमर्श के, उनका अपने घरों में स्वागत किया। नतीजतन, अब अभिभावक शिकायत करते हैं कि उनके बच्चे उनकी नहीं सुनते; दिन भर टीवी के सामने बैठे रहते हैं। मेरा मानना है कि इसमें दोष सिर्फ बच्चों का नहीं है, अभिभावक भी उतने ही जिम्मेवार हैं।

दरअसल, अपना काम निबटाने की खातिर बच्चों को व्यस्त रखने के लिए उन्हें टीवी में उलझा देने शुरुआत हमने ही की थी। लेकिन जब वही टीवी के कार्यक्रम बच्चों की आम जिंदगी में शामिल होने लगे तब हमारी चिंता बढ़ी। हालांकि फिलहाल यह अनुमान लगाना जल्दबाजी होगी कि टीवी कैसे हमारे बच्चों के महत्त्वपूर्ण समय को खत्म कर रहा है। फिर भी, इतना एहतियात तो बरता ही जा सकता था कि जिन चैनलों के हाथों में हम अपने बच्चों को सौंप रहे थे, पहले उन्हें खुद देख-परख लें। इसी लापरवाही का नतीजा है कि आज बच्चे घंटों, कई बार दिन भर टीवी से चिपके होते हैं। टीवी पर प्रसारित होने वाले बच्चों के कार्यक्रमों की वेशभूषा पर नजर डालें तो एक दिलचस्प बात यह नजर आएगी कि बड़ों और बच्चों के पहनावे, मेकअप आदि में बुनियादी अंतर खत्म हो चुके हैं। बाल रखने के स्टाइल, वेशभूषा, बोलने के अंदाज आदि सब एक दूसरे में ऐसे मिल चुके हैं कि उन्हें अलग करना मुश्किल होगा। कहीं न कहीं बच्चों की सहज दुनिया और उनकी देहभाषा व पहनावे को बड़ी चतुराई से उनसे छीन लिया गया और हम उसे स्वीकृति भी देते रहे।

तकनीक के विकास के साथ ही बच्चों तक के हाथों में मोबाइल आ गए। अब मोबाइल सिर्फ संवाद का माध्यम भर नहीं रहा, बल्कि मनोरंजन के अन्य साधनों के तौर पर भी हमारी मुट्ठी में ऐसे बंधा कि सोना, जगना, बाथरूम जाने तक में साथ होता है। जब बच्चे देखते हैं कि मां-बाप, भाई बहन सब, शौचालय में भी फोन लेकर जाते हैं तो वे क्यों पीछे रहें। तकनीकी विकास का फंदा आज इतना कस चुका है कि हमारा निजी से निजी पल भी उसी के हाथ में है। वही बच्चे भी सीख रहे हैं। सुबह आंखें मीचते, रात सोते हाथ में मोबाइल देख सकते हैं। बच्चों की मुट्ठी से हमने पत्रिकाएं, किताबें छीन ली हैं।पढ़ने की आदत न केवल बच्चों में खत्म-सी हो गई, बल्कि बड़ों की जिंदगी से भी कम और कम होती चली गई। जब बच्चे अपने घरों में पत्रिकाएं, किताबों के स्थान पर गजट्स देखेंगे तो उनकी रुचि भी उन्हीं में होगी, न कि किताब पढ़ने या पत्रिकाओं को उलटने-पलटने में। हम यह दोष देकर नहीं बच सकते कि आजकल बच्चे किताबें नहीं पढ़ते। बच्चों के आसपास यानी परिवेश से ही पठनीय सामग्रियां खत्म हो गई हैं। बची हैं केवल पाठ्यपुस्तकें, जिनमें उनकी रुचि अमूमन मुश्किल से जगती है। पाठ्यपुस्तकों से इतर पठनीय सामग्रियां उपलब्ध कराना हमारी जिम्मेदारी बनती है।

 

 

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First Published on October 24, 2016 3:27 am

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