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पाठक और किताबें

रामशंकर द्विवेदी बड़ी भीड़ थी। वैशाली पर मेट्रो की प्रतीक्षा कर रहा था। आने पर, दरवाजा खुला और मैं लपक कर सीट की ओर बढ़ा। एक सज्जन मेरी उम्र देख कर खड़े हो गए। घोषणा हो रही थी- कृपया दरवाजे से हट कर खड़े हों, अगला स्टेशन कौशांबी, दरवाजे बार्इं ओर खुलेंगे। मेरे बगल में […]
Author May 6, 2015 09:06 am

रामशंकर द्विवेदी

बड़ी भीड़ थी। वैशाली पर मेट्रो की प्रतीक्षा कर रहा था। आने पर, दरवाजा खुला और मैं लपक कर सीट की ओर बढ़ा। एक सज्जन मेरी उम्र देख कर खड़े हो गए। घोषणा हो रही थी- कृपया दरवाजे से हट कर खड़े हों, अगला स्टेशन कौशांबी, दरवाजे बार्इं ओर खुलेंगे। मेरे बगल में एक सज्जन बड़ी तल्लीनता से अपने मोबाइल पर शतरंज खेल रहे थे। मैं सोच रहा था कि इनके शतरंज का दौर समाप्त हो तो मैं कुछ पूछूं।

मेट्रो की धड़धड़ से कभी उद्घोषणा सुन पाता था, कभी नहीं। शंका थी कि कहीं मेरा गंतव्य निकल न जाए। मुझे मंडी हाउस जाना था। तब तक मेरे साथी ने शतरंज खेलना बंद कर दिया था। मेरे पूछने पर उन्होंने कहा- मुझे भी मंडी हाउस उतरना है। मैंने ध्यान से देखा, मोबाइल के साथ उनके हाथ में एक पुस्तक भी थी। उन्होंने मुझसे पूछा, मंडी हाउस आप कहां जाएंगे? मैंने कहा साहित्य अकादेमी। उन्होंने कहा, साहित्य अकादेमी तो मैं भी जाता हूं। क्या आप वहां काम करते हैं? नहीं, दरअसल मैं वहां के पुस्तकालय का सदस्य हूं। फिर उन्होंने मुझे चौंकाते हुए वह पुस्तक खोल कर दिखाई। हम बातों में खो गए। उन्होंने कैफियत देते हुए कहा, मुझे दफ्तर जाने-आने में एक तरफ से पच्चीस मिनट लगते हैं।

इस समय का उपयोग मैं पढ़ने में करता हूं। दफ्तर में भी खाली समय मिले तो गपशप के बजाय पढ़ने में खर्च करता हूं। उनकी बातों से मुझे हिंदी के एक गंभीर पाठक की झलक मिलने लगी। मैंने पूछा, अब तक आपने किन-किन लेखकों को पढ़ा है? उन्होंने कहा- मैंने अज्ञेय, निर्मल वर्मा, राजेंद्र यादव, मन्नू भंडारी, रमेशचंद्र शाह को पढ़ा है। फिर बातें चलती रहीं। हमारा गंतव्य आ गया था। मैं उन्हीं के साथ उतरा, उन्हीं का हाथ पकड़े सीढ़ियां उतरता-चढ़ता बाहर आया। विदा होने से पहले उन्होंने मेरी डायरी में अपना नाम और मोबाइल नंबर लिखा और चले गए। मैं सोच रहा था कि लोग कहते हैं हिंदी में पाठक नहीं हैं। ऐसे कितने अनचीन्हे, अनजाने पाठक हैं, आज भी पुस्तकें जिनके जीवन का अंग बनी हुई हैं।

एक और चित्र देखिए। उन दिनों मुझे गाजियाबाद से दिल्ली के लिए बस यात्रा करनी पड़ती थी। बसों में सीट का झंझट तो रहता ही है। घुसते ही एक सज्जन ने इशारा किया और मैं उनकी बगल में चैन की सांस लेता हुआ बैठ गया। बस चल दी। बगल के साथी ने अपने बैग से एक पुस्तक निकाली और पढ़ने में मग्न हो गए। मेरी नजर पड़ी, वह कोई धार्मिक पुस्तक थी। शायद किसी के प्रवचनों का संग्रह। मुझे पुरानी सीमापुरी के निकट शाहदरा उतरना था। मैं अपने साथी को पढ़ने में मग्न छोड़ कर उतर गया।

तीन-चार दिन बाद संयोग कुछ ऐसा हुआ कि वही बस और उन्हीं साथी की बगल में मुझे सीट मिली। कभी-कभी ऐसा होता है कि बिना शब्दों के आदान-प्रदान के लोगों से हार्दिक संबंध स्थापित हो जाता है। लेकिन इस बार जो दृश्य देखा उससे मैं अपने साथी से परिचय किए बिना खुद को रोक नहीं सका। इस बार उसके हाथ में कोई धार्मिक पुस्तक नहीं, बल्कि अंगरेजी-हिंदी की एक पॉकेट डिक्शनरी थी। मैं सोचने लगा, डिक्शनरी भी क्या कोई पढ़ने की चीज है! पर मेरा साथी उसी को पढ़ने में मग्न था। वह एक-एक पन्ने पर पांच-पांच, दस-दस मिनट तक रुका रहता था। अब मैं अपने को रोक नहीं सका। मेरी उसकी जो बातचीत हुई वह और भी अचरज भरी और पढ़ने की एक नई दिशा की ओर संकेत करती थी। मैंने उससे पूछा कि आप इस डिक्शनरी में क्या पढ़ रहे हैं?

उसने बताया कि मैं यह डिक्शनरी याद कर रहा हूं। मुझे गाजियाबाद से दिल्ली आने में एक घंटा लगता है। मैं एक-दो महीने में इस पॉकेट डिक्शनरी को याद कर लूंगा। मैंने उससे पूछा, क्या तुम कोई परीक्षा दे रहे हो? उसने कहा, नहीं। तो फिर तुम्हें इससे क्या लाभ? उसने बताया कि इससे मुझे बहुत लाभ हुआ है। यह डिक्शनरी ही नहीं, इसके पहले मैं रेन और नेसफील्ड की ग्रामर पढ़ चुका हूं। मेरी अंगरेजी बहुत अच्छी हो गई है। मैं टेलीफोन विभाग में काम करता हूं, दफ्तर में मेरा महत्त्व बढ़ गया है। जब कोई किसी शब्द पर अटक जाता है या स्पेलिंग लिखने में दुविधा होती है तो मुझे ही बुलाया जाता है, इससे मुझे बहुत खुशी होती है। बात को मोड़ते हुए उसने कहा, मुझे अपने बच्चों को ट्यूशन नहीं पढ़ाना पड़ता है। आठवीं कक्षा तक की अंगरेजी मैं अपने बच्चों को मजे से पढ़ा लेता हूं।

पढ़ने वाले नहीं हैं, पुस्तकें बिकती नहीं हैं, टीवी, इंटरनेट आदि के कारण छपे हुए शब्द अपना महत्त्व खोते जा रहे हैं यह एक मिथक है। सुदूर अंचलों में ऐसे अनेक पाठक हैं, जो बिना पढ़े सोते नहीं हैं, जिनके तकिए के पास या झोले में पुस्तक जरूर रहती है।

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  1. केशव अरोड़ा
    May 6, 2015 at 12:39 pm
    आप की बात सुन कर मैं भी चिंतित हूँ की जब मेरी बेटी एक साल बाद बेस स्कूल पढ़ने जाएगी तो क्या होगा? अभी वो टॉडलर से प्री-नर्सरी में होगी|
    (1)(0)
    Reply
    सबरंग