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बिन बरसे बदरा

बरसात लगभग चली गई। लेकिन इस बार बदरा पहले की तरह नहीं घिरे, न गरजे और न ही घुमड़ कर बरसे। अलौतियां भी ठीक से नहीं टपकीं। गांव में घर-मकान पक्के हो गए हैं, सो छप्पर-छानी अब नहीं हैं..
Author नई दिल्ली | September 8, 2015 16:27 pm

बरसात लगभग चली गई। लेकिन इस बार बदरा पहले की तरह नहीं घिरे, न गरजे और न ही घुमड़ कर बरसे। अलौतियां भी ठीक से नहीं टपकीं। गांव में घर-मकान पक्के हो गए हैं, सो छप्पर-छानी अब नहीं हैं। छप्पर थे तो अलौतियों से झरता बरसात का पानी दूल्हे के चेहरे पर पड़े सेहरे की लड़ियों की मानिंद सौंदर्य की सृष्टि करता था। बूंदों की लड़ियां बन कर नीचे गिरतीं तो छोटे-बड़े बुलबुले उठते और वे थोड़ी दूर जाकर अपना अस्तित्व खो देते। बरसते मेघा की बूंदें जब नदी की धार पर पड़तीं तो संतूर-सा बजता महसूस होता। कई बार ऐसा भी लगता कि झिलमिल तारों भरा आकाश सदानीरा की लहरों पर उतर आया हो। पिछले सालों में बाढ़ का प्रकोप हुआ तो कठिना नदी गांव की तरफ खिसक आई। कई खेत नदी के पेटे में समा गए। जिनके खेत-बाग बचे, वे दुआ कर रहे थे कि इस बार कटान न हो। कलेजे कांप उठे थे, जब हरहराती धार में सब कुछ बहता दिखाई दिया। ढोर-डंगरों के लिए चारा जुटाना मुहाल हो गया। गीली लकड़ियों से चूल्हे कैसे सुलगें। ऊपर बने बांध से पानी छोड़ा गया तो जानवर तक बह गए। पानी के बहाव में सांप चौपालों तक चढ़ने लगे। पशुओं का चारा जुटाना सबसे बड़ी किल्लत। पशु भूखे पेट रंभाते तो सुन कर कलेजा मुंह को आ जाता।

पर अबकी मेघा आए, थोड़ा बरसे और लौट गए। पता नहीं किसने उनका मन मोह लिया जो वे इधर से मुंह फेर कर चले जाने लगे, जैसे जानते ही न हों। हमारी पुकार उन तक नहीं पहुंची या फिर क्या ठिकाना कि सुन कर ही अनसुना कर गए हों वे। गांव-गिरांव की ओर अब कौन झांके! सबकी दौड़ महानगरों की तरफ है, सो वे भी यहां क्यों ठहरें। कठकरेजा बदरा पहले की तरह नहीं पिघले तो नदी किनारे हरियाली के बीच गगनधूर भी दिखाई नहीं पड़ी। कहते हैं कि बादल गरजने के साथ ही उसका जन्म होता है। और वीर बहूटी ने तो अब मायके आना ही बंद कर दिया है। लाल रंग के मखमली गोलमटोल इस खूबसूरत बरसाती कीड़े पर फिदा होकर प्रख्यात उर्दू शायर दुर्गा सहाय सुरूर जहानाबादी ने कभी कहा था- ‘आह! ओ नन्हे-से कीड़े नाजिशे-सहरा है तू, दश्त में इक सुर्ख छोटा-सा गुले-राना है तू।’

बदरा कम बरसे तो हरियाली भी ज्यादा नहीं बढ़ी। फिर झूले कैसे बनते! आम-इमली के दरख्त काट कर खेत बना लिए गए तो झूले क्या यूकलिप्टस की टहनियों पर डाले जाते? कजरी के बोल अबोल हो चले हैं। अखाड़ों की माटी सूनी पड़ी रही। सरस सलिला कलछौंही पड़ गई। होठों से उसके जवल का आचमन करने से मन डरता है। रोट चढ़ाने और बच्चों के मुंडन कराने बैइरबानियां डनलप के पहियों वाली भैंसागाड़ियों या ट्रैक्टर की ट्रॉलियों में भर कर ढोलक और मजीरा बजाते हुए गउनई करती आती तो हैं, पर नदी में नहाती नहीं वे। बस दो बूंद मथुवा से छुआ लेती हैं और सिर पर छिड़क कर दुआ मांगती हैं। जिन दुवारों पर आल्हा गाई जाती थी, वे चौपालें सुनसान पड़ी हैं। अब किसी के मन में लाखन का ब्याह गाने की तरंग नहीं उठती। नए किशोरों के हाथों में मोबाइल आ गए। वे उसी में मगन हैं। कारे-कजरारे बादलों की बाट वे नहीं जोहते। अब आसमान की ओर देख कर कोई नहीं कहता- ‘बरसौ राम जियै दुनिया।’ नहर में तो कई सालों से पानी नहीं आता, फिर भी पतरौल खेतों की आबपाशी भर देता है।

बरसात छिछली हुई तो धान की बेड़ सूखने लग गई। खेतों में जगह-जगह सूखी टपरियां बन गर्इं। किसानों के कलेजे अटके पड़े हैं। औरतें खेत की मेड़ पर चहोरा गाड़ने के लिए उदास बैठी हैं। खेत लबालब भरें तो बात बने। कारी बदरिया के झमाझम बरसने के लिए उनकी आंखें तरस गर्इं। बड़े किसानों के खेत में ट्यूबवेल से पानी चल रहा है, सो कुछ महिला मजदूर वहां धान की बढ़ती फसल के साथ ही अपनी जीविका की उम्मीद भी देख रही थीं। इस बार बादल फोड़ कर न चंदा निकला और न चिड़िया धूल में नहाती दिखाई पड़ी, तो फिर जम कर वर्षा होती भी कैसे! मानसून का चाल-चलन भी नए जमाने के साथ बदल गया है। देश के वित्तमंत्री ने कहा था कि इंद्रदेव की कृपा से इस बार फसल खूब होगी। पर वे धान के खेतों की प्यास नहीं जानते। थोड़े पानी से उनका गला नहीं सिंचता। शहरों के लिए जो बरसात डुबाऊ हो जाती है, उससे गांव-गिरांव के गले में बस थोड़ी तरावट हो पाती है। संसद और दफ्तरों में बैठे लोग खेती-किसानी की दुनिया को क्या जानें! उनके लिए तो मूंगफली भी किसी वृक्ष की फुनगी पर लगती है।

(सुधीर विद्यार्थी)

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