ताज़ा खबर
 

किसके लिए शहर

जयपुर जो कभी हिंदी प्रदेशों में उच्च शिक्षा का सबसे महत्त्वपूर्ण केंद्र था, अब शिक्षा के प्रशासनिकीकरण का शिकार हो गया है।
Author नई दिल्ली | March 3, 2016 01:43 am
राज्य की राजधानी होने के कारण बाजार, आवास, प्रशासनिक भवनों आदि के निर्माण ने निर्माण-उद्योग को जयपुर में महत्त्वपूर्ण तरीके से स्थापित किया।

हाल ही में मुझे जयपुर के विभिन्न आवासीय और व्यावसायिक परिसरों को किसी अध्ययन के दौरान गहराई और व्यापकता से देखने-समझने का अनुभव हुआ। मेरा मानना है कि इसे समाजशास्त्रीय विमर्श का हिस्सा बनाया जाना चाहिए। समाजशास्त्र की दृष्टि से जयपुर औद्योगिक नगर नहीं है। यह एक ऐतिहासिक और नियोजित नगर के रूप में विश्वविख्यात है और इसे ‘गुलाबी नगरी’ के रूप में जाना जाता है। हालांकि विश्व के सभी हिस्से में नगरों का विकास मुख्य रूप से औद्योगीकरण की अनिवार्यता रही है। औद्योगीकरण ने उद्योगपतियों और औद्योगिक श्रमिकों को नगरों का मुख्य वर्गीय ढांचा बनाया। साथ ही पूंजीपति की सहयोगी इकाइयों और प्रशासनिक सामाजिक श्रेणियों के रूप में मध्यवर्ग का उभार हुआ जो कालांतर में आधुनिकीकरण की प्रक्रिया का मुख्य वाहक बन जाता है। इन तीनों वर्गों के आवासीय क्षेत्रों में सुविधाओं की असमानता शुरू से ही नगरीय प्रशासन ने विकसित कर दी। परिणामस्वरूप नगरों में आवासीय असमानता या संस्तरण वैधता प्राप्त ढांचा बन गया। उच्च वर्ग (एचआइजी), मध्य वर्ग (एमआइजी), निम्न वर्ग (एलआइजी) और आर्थिक दृष्टि से कमजोर श्रेणी (ईडब्ल्यूएस) से संबद्ध आवासीय कॉलोनियों को इस संदर्भ में देखा जाना चाहिए।

स्वाधीनता के बाद राजस्थान में शिक्षा और उच्च शिक्षा के हुए विकास ने उत्तर भारत के विभिन्न प्रदेशों के शिक्षित लोगों को जयपुर में बसने के अवसर दिए। बहुलता और विविधता की संस्कृति जयपुर की विशेषता बन गई। राज्य की राजधानी होने के कारण बाजार, आवास, प्रशासनिक भवनों आदि के निर्माण ने निर्माण-उद्योग को जयपुर में महत्त्वपूर्ण तरीके से स्थापित किया। नतीजतन, उच्च और मध्य वर्ग के लिए जयपुर आकर्षण का केंद्र बना। इस निर्माण उद्योग के तीव्र विकास ने जयपुर के आसपास के किसानों को प्रेरित किया कि वे आवासीय संरचनाओं के निर्माण में अपनी जमीन बेच कर भूमिका निभा सकते हैं। किसानों का एक हिस्सा इस कारण मध्य वर्ग के रूप में उभर कर आया। उसने मध्यवर्गीय जीवन जीने का सपना देखा और उसे अपनाने की कोशिश की। जयपुर में उपभोक्ता बाजार के विकास में इस समूह ने प्रभावी योगदान किया। यही वजह है कि जयपुर के आसपास के सभी गांव नगरीय आवासीय संरचना में परिवर्तित हो गए। विला, फ्लैट, मॉल आदि के उभार को इस दृष्टि से भी देखा जाना चाहिए।

उच्च और मध्य वर्ग में पनपी राजनीतिक और आर्थिक शक्ति ने जयपुर के महानगर बनने की प्रक्रिया को वैश्वीकरण के बाद तेज किया। लेकिन इस शक्ति के कारण सभी प्रकार के नियमों की धज्जियां भी उड़ने लगीं और देखते-देखते पिछले पच्चीस वर्षों में जयपुर विकसित होने के साथ-साथ बिखरता चला गया। आज यह नियोजित नगर नहीं है, क्योंकि नियोजन की परंपरा को अव्यवस्थित आधुनिकता ने निगल लिया है। सड़कें तेजी से पार्किंग स्थल का रूप लेती जा रही हैं। चौड़ी सड़कों के कारण निर्धारित गति से तेज गति में वाहनों का चलना आम बात है। बच्चों और किशोरों को बिना लाइसेंस तेजरफ्तार गाड़ियां चलाते देखा जा सकता है। सड़क दुर्घटनाओं में जयपुर अन्य नगरों से बाजी मारता है। गाड़ियों के शीशे पर काली फिल्में, प्रतीकों का खुलेआम प्रयोग के यथार्थ दर्शाते हैं कि अगर आप शक्तिशाली हैं तो सब कुछ चलता है।

ऐसा लगता है कि एक जीवनशैली की लालसा ने उच्च और मध्य वर्ग के अधिकतर युवाओं को विचलनकारी व्यवहार करने की अनुमति प्रदान कर दी है। अपराध की दर में तीव्र वृद्धि हुई है और इसमें ऐसे लोगों की सहभागिता ज्यादा है जो निम्न वर्ग के नहीं हैं। जयपुर एक ऐसा शहर है, जहां अवैध रूप से इमारतों का निर्माण तेज गति से जारी है। चौड़ी सड़कों पर फ्लाईओवर बनाते हुए इस बात ध्यान गंभीरता से रखा जाता है कि इनसे शक्तिशाली और समृद्ध लोगों की जिंदगी में कोई बाधा तो नहीं पड़ रही है।

जयपुर जो कभी हिंदी प्रदेशों में उच्च शिक्षा का सबसे महत्त्वपूर्ण केंद्र था, अब शिक्षा के प्रशासनिकीकरण का शिकार हो गया है। अब यहां बहुत कम विदेशी विद्यार्थी अध्ययन के लिए आते हैं। अन्य प्रदेशों से भी विद्यार्थियों का आना रुका है। शिक्षा की गुणवत्ता का तीव्र ह्रास और राजस्थान विश्वविद्यालय के चरित्र का कमोबेश स्थानीय हो जाना वे पक्ष हैं, जिनके कारण सभी सुविधाएं होने के बावजूद जयपुर एक शिक्षा नगरी के रूप में उभर कर नहीं आ सका। जबकि साठ और सत्तर के दशक में इसकी पूरी संभावना थी।

इस तरह का विकास जनसंख्या के एक तबके को शहरों से पूरी तरह धकेल कर उन्हें नगर की सीमा के बाहर बसने को छोड़ देता है। फिर जब नगर उस जगह पर पहुंच जाते हैं तो उन्हें और पीछे धकेल दिया जाता है। उन्हें समाप्त नहीं किया जा सकता, क्योंकि उच्च और मध्य वर्ग को अराजक जिंदगी बिना किसी बाधा के जीने के लिए सस्ते श्रम की जरूरत पड़ती है। लेकिन क्या कंक्रीट के ये बढ़ते हुए जंगल प्रकृति का मुकाबला करने में सक्षम हैं? यह एक ऐसा सवाल है जिसे अराजक होते उच्च और मध्य वर्ग को समझने की जरूरत है।

(ज्योति सिडाना)

Hindi News से जुड़े अपडेट और व्‍यूज लगातार हासिल करने के लिए हमारे साथ फेसबुक पेज और ट्विटर हैंडल के साथ गूगल प्लस पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News App

  1. No Comments.
सबरंग