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दुनिया मेरे आगे : अनमोल खजाना

इतना कहकर मैं दरवाजे की तरफ बढ़ा। मांगी राम के दोनों बेटे दरवाजे के बेड़े पकड़े खड़े थे। उन्होंने मेरा रास्ता रोकना चाहा।
Author नई दिल्ली | June 2, 2016 04:22 am
सूरज। (रॉयटर्स फोटो)

सुबह के शायद नौ-दस बजे थे। बाजार की अधिकतर दुकानें बंद थीं। सड़कों पर सन्नाटा था। मैं अपने डेरे से निकल कर बेकापुर की तरफ चला। रास्ते में ही था मांगी राम का बैठका, जहां वे हमेशा की तरह एक साफ-सुथरे गद्दे पर सड़क की तरफ नजरें जमाए बैठे थे। मुझे जाते देख हाथ के इशारे से अपने पास बुला लिया। आसपास की गलियों में सन्नाटा था। हलचल का कोई संकेत नहीं था। पर अचानक किन्हीं दो दिशाओं से उन्मादी नारों की गूंज सुनाई देने लगी।

गली के एक छोर पर खड़े मुहल्ले के एक रिक्शा चालक ने मुझे मांगी राम की दुकान में दाखिल होते देखा था। जब नारे गूंजने लगे तो उसे मेरी जान खतरे में फंसी नजर आई। बेचैन होकर वह मुझे बचाने दुकान की तरफ भागा। तब तक सौ-दो सौ की दंगाई भीड़ सामने वाली सड़क पर आ गई थी। उनकी भागती नजरों ने रिक्शेवाले को दुकान की सीढ़ियां लांघते देख लिया था। कुछ ही देर में भीड़ मांगी राम की दुकान और सिगरेट-गोदाम को घेर चुकी थी।

हम मांगी राम के बैठके में थे। दुकान के दरवाजे बंद हो गए थे। रिक्शावाला दुकान के एक कोने में दुबका बैठा था। उसकी एक मासूम चूक ने सबको परेशानी में डाल दिया था। बाहर खड़ी भीड़ मांगी राम पर हमें बचाने का आरोप लगा रही थी। वह हमें भीड़ को सौंपे जाने की मांग भी कर रही थी। अद्भुत साहस और संकल्प का परिचय दिया था मांगी राम ने। अपने दो बेटों के हाथ में बंदूकें थमा कर उन्होंने ठोस और गैर-बनावटी तेवर में बाहर खड़ी दंगाई भीड़ को चेतावनी दी- ‘मेरे जीते-जी इन पर कोई हाथ नहीं उठा सकता। मैं अपनी जान देकर भी इनकी रक्षा करूंगा। मेरे बेटे बंदूक लिए दरवाजे पर खड़े हैं। कोई आगे बढ़ा तो उसे महंगा पड़ेगा।’

बाहर खड़ी भीड़ ने मांगी राम की चेतावनी सुन ली थी। पर इससे उनका उन्माद ठंडा होने के बजाय और उग्र हो गया। कई उत्साहित दंगाई सीढ़ियां चढ़ कर मांगी राम के गोदाम में आग लगाने की धमकियां देने लगे। दुकान के बाहरी पटरों पर उनकी उन्मादी चाप बढ़ती गई। हमारी रगों में दौड़ने वाला खून जमने लगा था। मेरे भीतर का तनाव मुझसे ज्यादा मांगी राम के बैठके में मौजूद दूसरे लोगों के चेहरे से जाहिर हो रहा था। मैंने बारी-बारी से सबके चेहरों पर दर्ज इबारत पढ़ी। मुझे लगा कि इन चेहरों को एकबारगी तनाव और पीड़ा से मुक्त कर देना चाहिए। मैंने आगे बढ़ कर मांगी राम को कहा- ‘मुझे जाना चाहिए। आप सबको खतरे में इस प्रकार डालने का कोई हक नहीं मुझे।’

इतना कहकर मैं दरवाजे की तरफ बढ़ा। मांगी राम के दोनों बेटे दरवाजे के बेड़े पकड़े खड़े थे। उन्होंने मेरा रास्ता रोकना चाहा। तभी मांगी राम के इस बैठके में अचानक एक तेज हवा-जैसी बही। भीड़ के उन्मादी नारों की तकरार के बीच मैंने महसूस किया कि किसी ने दरवाजे की छिटकनी तक पहुंचे मेरे हाथ पीछे की ओर खींच लिए। दूसरे ही क्षण मैंने देखा कि मांगी राम की पत्नी मुझे खींचे-खींचे घर के भीतरी हिस्से में ले गर्इं। लंबे बरामदे के उस छोर पर, जहां घर का पिछला भाग एक तंग गली में खुलता है। और जिसकी दाहिनी ओर एक छोटा-सा पूजा-घर है, जहां देवी-देवताओं की मूर्तियां रखी थीं। इसी पूजा-घर के दरवाजे पर लाकर मांगी राम की पत्नी ने मुझे छोड़ दिया- ‘हम तुम्हें भीड़ को नहीं सौंप सकते। अब जो कुछ भी होगा, यहीं भगवान की शरण में होगा। अच्छा-बुरा जो होगा, यहीं होगा।’

मुझे मूर्छा की स्थिति थी। पूजा-घर से उठने वाली धूप-अगरबत्ती की खुशबू ने मेरी आंखों पर छाये आतंक को धो दिया था। एक तिलिस्म था, जो मेरे ऊपर छा गया था। यह तिलिस्म टूटा, उस वक्त, जब गली में और सामने वाली सड़क पर अचानक नारों की आवाज बंद हो गई। और उनकी जगह ले ली तेज सायरन की आवाज ने।

माहौल का तनाव शिथिल पड़ गया था। मांगी राम ने अपनी दुकान के सारे पटरे दोबारा खोल दिए थे। बाहर सीढ़ियों पर आग की कमजोर होती लपटों और धुएं के निशान के सिवा कुछ नहीं था। अपने हाथों से मांगी राम ने हमें शरबत पिलाया। अमृत से भी ज्यादा मीठा शरबत! मांगी राम और उनकी पत्नी के चेहरे एकबारगी खिल उठे थे। हमारी जान बचा कर जैसे उन्हें कोई अनमोल खजाना मिल गया था। उनके चेहरे से फूट रही खुशियां हमें अभिभूत कर रही थीं!

(जाबिर हुसेन)

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