December 11, 2016

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दुनिया मेरे आगेः अपनापे के अभाव में

वह समय चला गया जब लोग अपनी जमीन, अपने गांव-कस्बे, घर-मुहल्ले, रिश्तेदारों, पड़ोसियों, अपनी संस्थाओं और अपने देश से प्यार करते थे।

Author October 21, 2016 02:00 am
प्रतीकात्मक तस्वीर

सदाशिव श्रोत्रिय

वह समय चला गया जब लोग अपनी जमीन, अपने गांव-कस्बे, घर-मुहल्ले, रिश्तेदारों, पड़ोसियों, अपनी संस्थाओं और अपने देश से प्यार करते थे। कई तरह के अभाव सहते, सर्दी-गरमी और कई प्राकृतिक आपदाओं की मार खाते हुए भी वे अपने स्थान और अपने ही लोगों के बीच बने रहना पसंद करते थे। पुश्तैनी घर और धरती को छोड़ना उन्हें दुर्भाग्यपूर्ण लगता था। अपनी जमीन और जड़ों से लोगों का वह लगाव हमारे यहां जैसे अब बिल्कुल समाप्त हो गया है। ज्यादा कमाने और ज्यादा खर्च कर पाने की चाह आज के युवाओं को अपनी धरती और अपने लोगों से दूर ले जाते हुए कई बार देश की सीमा ही पार करवा देती है। इस बात का इन युवाओं को अब कोई अफसोस भी नहीं होता। सवाल यह है कि कोई भी वृक्ष तब तक कैसे बड़ा आकार लेकर फल-फूल सकता है, जब तक वह लंबे समय तक एक ही स्थान पर खड़ा रह कर अपनी जमीन में जड़ें न जमाए-फैलाए और खुद के लिए वह पोषण प्राप्त न करे जो उसे अपनी मिट्टी से मिल सकता है! अपनी जमीन, जबान, विरासत और संस्कृति से कट कर कोई भी व्यक्ति अपने लोगों, अपने समाज और देश के लिए कैसे उपयोगी हो सकता है?
एक पहलू यह भी है कि अगर किसी गांव, कस्बे, मोहल्ले, शहर, संस्था से किसी को लगाव नहीं होगा तो उसकी रक्षा और उसे बेहतर बनाने की कोशिशें कौन करेगा? अगर सभी लोग उन्हें पिछड़ा और अनुपयोगी कह कर किसी और जगह चले जाएं या फिर अपने स्वार्थों के लिए उनके पर्यावरण, स्वास्थ्य, उनकी सुंदरता, सुरक्षा आदि की चिंता न कर केवल उनका दोहन करने में लग जाएं तो वे कैसे सुरक्षित रह सकेंगे! अगर बाहर के स्वार्थी तत्त्वों के वहां आकर अपने आर्थिक लाभ के लिए उनका दोहन करने पर भी वे चुप रहें और कुछ नहीं कहें तब तो उनके पूरी तरह नष्ट हो जाने को कौन रोक सकेगा? हर व्यक्ति केवल अपने आराम, आर्थिक लाभ और सुख-सुविधा के बारे में ही सोचने लगे और इसके लिए किसी स्थान की रक्षा करने वाले और वहां व्यवस्था बनाए रखने वाले समूचे तंत्र को ही नष्ट-भ्रष्ट हो जाने दे तो इसका परिणाम आखिर क्या हो सकता है?


किसी स्थान के काबिल और होशियार लोगों का अधिक बड़े और विकसित स्थानों की ओर पलायन कर जाना वैसा ही है, जैसा किसी रेलगाड़ी के इंजन का ही उसे छोड़ कर दूसरी ओर चले जाना। ज्ञानवान और प्रतिभाशाली लोगों से यह अपेक्षा की जाती है कि वे अपने लोगों के कष्ट-निवारण में सहायक होंगे। जिस तरह के कष्ट पिछड़े और वंचित लोग झेल रहे हैं, उसमें वे अपने प्रयासों से कमी लाएंगे। लेकिन हम देखते हैं कि अधिकांश युवा आज केवल अपने के लिए कोई ‘स्वर्ग’ ढूंढ़ लेना चाहते हैं। परीक्षित साहनी ने एक बार आकाशवाणी के एक साक्षात्कार में बताया था कि उनके सोवियत रूस में ही बस जाने की चाह जाहिर करने पर पंडित नेहरू ने उन्हें किस तरह फटकार लगाई थी।

स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद हमारे यहां लोकतंत्र का जो स्वरूप विकसित हुआ, उसकी विडंबना यह रही कि उसमें किसी स्थान के विकास और व्यवस्था का जिम्मा अक्सर उन लोगों को सौंप दिया गया, जिन्हें उस स्थान से कोई भावनात्मक लगाव नहीं था। ये लोग आमतौर पर वे राजकीय अधिकारी और कर्मचारी होते थे जो अपनी राजकीय सेवा में केवल संयोग से उस स्थान पर पदस्थापित होते थे और थोड़ी-थोड़ी अवधि के बाद वहां से स्थानांतरित होते रहते थे। प्रगति और विकास की इस नई व्यवस्था ने किसी स्थान के लिए स्थायी संरक्षकों का भारी अभाव पैदा कर दिया।

यह देख कर निराशा होती है कि बहुत से चुनाव क्षेत्रों का प्रतिनिधित्व करने वाले लोग ही अब सपरिवार उन क्षेत्रों में बसने को अपने पिछड़ेपन के रूप में देखते हैं। यानी हमारे इन जन-प्रतिनिधियों को अब कई बार अपनी जमीन ही इस लायक नहीं लगती कि वे उसमें अपनी जड़ें जमाएं और फैलाएं। स्थानीय लोगों के जीवन की गुणवत्ता में सुधार को ऐसे जनप्रतिनिधि कभी बहुत गंभीरता से नहीं लेते, क्योंकि उनका खुद का अधिकांश जीवन इन स्थानों के बजाय कहीं और ही बीतता है। जबकि आवश्यकता शायद इस बात की है कि हर नगर में स्थायी रूप से निवास करने वाले कुछ ऐसे विश्वसनीय, निस्वार्थ,पढ़े-लिखे, अनुभवी, जानकार और सत्ता के लोभ से दूर रहते हुए उस नगर से वास्तव में प्रेम करने वाले लोगों को चिह्नित किया जाए और उन लोगों की किसी ऐसी समिति का गठन किया जाए जो उस नगर के विकास और परिवर्तनों पर बराबर अपनी नजर रख कर उनका आकलन कर सके। ज्यादा से ज्यादा आर्थिक लाभ और मुनाफाखोरी का जो भूत आज हर आदमी पर सवार हो गया है, उसे देखते हुए किसी ऐसी समिति के अभाव में आज किसी नगर के वास्तविक कल्याण और उसके दीर्घकालीन विकास की बात शायद नहीं सोची जा सकती।

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First Published on October 21, 2016 1:57 am

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