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दुनिया मेरे आगेः बीच बाजार में

वे कहते हैं कि मैं खूबसूरत हूं... वे कहते हैं कि आप जो जूता पहन रहे हैं, वह सांस नहीं लेता... वे कहते हैं कि आपके टूथ पेस्ट में नमक है, इसलिए आप यह इस्तेमाल करें..! और आप उनके सम्मोहन में खुद को उनके हवाले कर देते हैं!
सांकेतिक फोटो

वे कहते हैं कि मैं खूबसूरत हूं… वे कहते हैं कि आप जो जूता पहन रहे हैं, वह सांस नहीं लेता… वे कहते हैं कि आपके टूथ पेस्ट में नमक है, इसलिए आप यह इस्तेमाल करें..! और आप उनके सम्मोहन में खुद को उनके हवाले कर देते हैं! यहां आखिर ‘वे’ कौन हैं? दरअसल, ‘वह’ हमारे आसपास खड़ा हो चुका ताकतवर बाजार है, जो हमेशा यह अहसास कराने में अपनी पूरी रणनीति झोंक देता है कि हम नए उत्पादों का इस्तेमाल करें। अगर हम ऐसा नहीं करते हैं तो पिछड़े हैं। कहा जाएगा कि अरे… अभी भी आप कपड़े सिलवा कर पहनते हैं! अगर आपके पास स्मार्ट टीवी नहीं है तो सुनना पड़ सकता है कि आपका टीवी बड़ा-सा डिब्बा है! अचानक हमें एहसास करा दिया जाएगा कि जो टीवी हम चाव से देखा करते थे, वह कबाड़ हो चुका है। नए के लिए हमारे पास पैसे नहीं हैं तो क्या हुआ! बाजार कर्ज और किश्त में महंगा टीवी घर तक पहुंचा देने के लिए तैयार है।

बाजार तैयार बैठा है सामान को बेचने के लिए और वह इसके लिए बनाई जाने वाली रणनीति पर खर्च करता है। आपके पास गाड़ी है। उसमें आपका परिवार आराम से सफर करता है। लेकिन अचानक पड़ोसी और बाजार आप पर दबाव बनाने लगेंगे कि आपको बड़ी और महंगी गाड़ी चाहिए। बाजार आपको एहसास करा देगा कि लंबी दूरी के लिए आपकी गाड़ी छोटी है और माकूल नहीं है। आपको नई और बड़ी गाड़ी लेनी चाहिए। आपने पैसे का बहाना बनाया तो बाजार अपने पंजे में कब ले लेगा, आपको पता भी नहीं चलेगा। आप कर्ज लेने न जाएं, तब भी आपके घर में बैंक वाले कर्ज दे जाएंगे। देखते ही देखते आप बड़ी गाड़ी के मालिक हो जाएंगे। बेशक इसके बाद आप पर हर रात एक आयातित तनाव हावी हो जाएगा कि इसे खड़ी कहां करें!

कभी तीन कमरों के घर में पूरा संयुक्त परिवार रहता था। आज चार-पांच कमरों में मात्र तीन सदस्य रहते हैं। बड़े घर की लालसा भी बाजार सृजित जरूरतों में है। बाजार और रिश्तेदार आपको इतने दबाव में ला देते हैं कि एक पल के लिए महसूस होने लगता है कि आप अपना मकान क्यों नहीं खरीद रहे हैं… आपको भविष्य की चिंता नहीं! फिर आप आनन-फानन में कर्ज लेकर अपनी कमाई का एक बड़ा हिस्सा किश्तों में चुकाने लगते हैं। कई बार लगता है कि मकान, गाड़ियां, भोजन, यात्रा आदि का लगातार विज्ञापन चल रहा है। लोग बड़े मकानों, गाड़ियों, बढ़िया घरेलू उपकरणों, महंगे परिधानों, घड़ियों आदि के पीछे पागल हो जाते हैं। इस सनक को 1990 के दशक में विलासिता का बुखार कहा गया। तकरीबन सौ वर्ष पहले थोर्स्टिन वेबलेन ने इसे ‘ध्यानकर्षी उपभोग’ का नाम दिया था। इस प्रवृत्ति को उन्होंने कहा था कि आम जन धनवानों के आचरण को भय, ईर्ष्या और तिरस्कार मिश्रित दृष्टि से देखते हैं।

बाजार ने खासकर महिलाओं के सौंदर्य आकर्षण को अपना शिकार बनाया है। उन्हें विभिन्न उत्पादों को आक्रामक विज्ञापन के जरिए लुभाने की कोशिश की जाती है। इसी का परिणाम है कि आए दिन नए उत्पाद बाजार में उतारे जाते हैं। इन सबका असर महिलाओं के अलावा बच्चों और बाकी पुरुषों पर भी होता है। दरअसल, हमारी जिंदगी का बड़ा हिस्सा बाजार की गोद में है। वह जैसे कहता है, हम वही करने लगते हैं। हो सकता है कि हमें किसी कपड़े या सामान की जरूरत फिलहाल नहीं हो, लेकिन जब हम मॉल में घूमने चले गए तो सामानों के साथ ‘सेल’ और ‘महासेल’ के बैनरों पर नजर पड़नी है। फिर कुछ न कुछ खरीद भी लेना है। यानी बाजार का मकसद पूरा हुआ।

अमेरिका में नौ सितंबर के हमले के बाद अमेरिकी जनता अवसाद में जानी लगी थी। तब जार्ज बुश ने कहा था कि आप लोग मॉल्स जाएं, खरीदारी करें! पैसे की चिंता न करें, बैंक आपकी मदद के लिए हैं। फिर देखते ही देखते लोग खरीदारी में इतने व्यस्त हो गए कि उनका घर सामानों से भर गया, लेकिन सिर पर कर्ज बढ़ता गया। 1960-70 के दौर में भी एक कंपनी ने उत्पाद और क्रय को बढ़ाने के लिए अपने उत्पाद की कीमत घटाई और कर्मचारियों के वेतन बढ़ाए। इसका परिणाम यह हुआ कि बाजार में खरीदारों की संख्या में इजाफा हुआ।

दरअसल, उच्च वर्ग की जीवन शैली को अपनाने की ललक में उच्च और मध्यवर्ग के बीच की विभाजक रेखा खत्म हो गई। मध्यम और निम्न वर्ग के लोग भी येन-केन-प्रकारेण वे सामान खरीदने लगे जो उच्च वर्ग इस्तेमाल करता था। मॉल खरीदारी के लिए इतने चलन में आ गए कि हमारे जीवन से मेलजोल को भी खासा प्रभावित किया। हम घूमने के लिए भी मॉलों में ही जाने लगे। वहां बाजार कुछ खरीदने के लिए हमें इस कदर मजबूर करने लगा कि बिना किसी जबर्दस्ती के गैरजरूरी चीजें भी खरीदने लगे। अब सोचना हमें है कि हम घर को बाजार बनाना चाहते हैं या सुकून की जगह!

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