June 24, 2017

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दुनिया मेरे आगे: चित्र में होली

होली भारतीय जन-जीवन का सबसे बड़ा और प्रिय त्योहार रहा है। आदि संस्कृति से जुड़ा होने के कारण होली का स्वरूप अत्यंत प्राचीन है। वेद-पुराणों से लेकर रामायण और महाभारत में भी रंग पर्व का उल्लेख मिलता है।

Author March 11, 2017 04:05 am
रंगों के त्योहार से एक दिन पहले किया जाता है होलिका दहन।

होली भारतीय जन-जीवन का सबसे बड़ा और प्रिय त्योहार रहा है। आदि संस्कृति से जुड़ा होने के कारण होली का स्वरूप अत्यंत प्राचीन है। वेद-पुराणों से लेकर रामायण और महाभारत में भी रंग पर्व का उल्लेख मिलता है। जिस मदनोत्सव का उल्लेख हमारे पौराणिक धार्मिक ग्रंथों में मिलता है, वह भी होली के स्वरूप से ही मिला-जुला है। अनेक आध्यात्मिक कला केंद्रों और ग्रंथों में सचित्र वर्णन भी मिलता है। प्राचीन लघु चित्र शैली में कांगड़ा और कश्मीरी लघु चित्र शैली भी बहुतायत से होली से जुड़ी चित्र परंपरा को दर्शाती है। प्राचीन मध्य भारत में चित्रकारों में एक समान शैली विकसित रही और उनके मुख्य पात्र राधा-कृष्ण ही रहे हैं। कुछेक चित्रों में नायक-नायिका को भी होली का आनंद लेते दिखाया गया है।

राजस्थान भी लघु चित्र शैली में सुविख्यात रहा है और यहां बूंदी, अलवर और बीकानेरी चित्र शैली भारतीय चित्रकला के प्राचीन इतिहास को समृद्ध करती है। बूंदी शैली के चित्रों में बेहद बारीकी से चित्रात्मकता को अभिव्यक्ति दी गई है और रंगों की विविधता के साथ-साथ उनका तालमेल भी बहुत ही सधा हुआ है। अलवर, बीकानेर की चित्र शैलियां भी लघु चित्र शैली में अद्वितीय हैं और इनमें राधा-कृष्ण और नायक-नायिकाओं को रंग खेलते हुए दर्शाया गया है। बीकानेरी शैली के एक चित्र के पृष्ठ में भव्य रंगों से सुसज्जित फलक है, राधा-कृष्ण गोपियों से घिरे हैं और पास ही रंगों से भरे पात्र हैं। इनमें से गोपियां रंग पिचकारियों में भरती दिखाई गई हैं। जबकि वहीं खड़ी गोपियां मुट्ठी से गुलाल फेंक रही हैं। कृष्ण की पोशाक प्राचीन राजा-महाराजाओं की तरह है। जबकि राधा लहंगे, कंचुकी और ओढ़नी की पोशाक में दिखलाई गई हैं। राधा के केश हल्के से चेहरे पर आए हैं और वे हाथ में रंग से भरी पिचकारी लेकर कृष्ण की ओर उन्मुख हैं। अठारहवीं सदी के इन चित्रों में जिस मोहकता और सूक्ष्मता से रंग चित्रांकन मिलता है, वह अद्भुत है।रंगों की छटा के बीच नृत्य करती और संगीत में लीन गोपियों को जो पोशाक पहनाई गई है, उनमें इतनी नन्हीं-नन्हीं बुंदकी दी गई हैं कि वे बहुत ही लुभावनी लगती हैं। रंग संयोजन और चयन इतना सधा हुआ कि वह देखते ही बनता है। संपूर्ण कला सौंदर्य से सराबोर इन चित्रों में राजस्थानी जन-जीवन की छाप भी दिखती है। ये चित्र होली के सभी पहलुओं से आच्छादित हैं।

प्राचीन प्रासादों में इनका अंकन दीवारों पर भी मिलता है। लेकिन ये भित्ति-चित्र अब इतिहास के पृष्ठों में सिमट रहे हैं। इन मूल चित्रों के सामने अब इनकी जो कापियां देखने को मिलती हैं, वे हल्की हैं और स्वाभाविकता से दूर हैं। उन रंगों की आभा वर्तमान रंगों में फीकी है और चमक भी क्षीण है।अलवर शैली में उन्नीसवीं शताब्दी के एक चित्र में भी राधा-कृष्ण को होली खेलते दिखलाया गया है। इस चित्र में खुले आसमान के नीचे परिवेश प्रतिस्थापित किया गया है। पृष्ठ में प्रासाद-उपवन की दीवारें दिखाई देती हैं। इस चित्र में रंगों के बादल उभारे गए हैं। इनमें भी गोपियां नृत्य करती और गाती दिखाई देती हैं। ये गोपियां आपस में बतियाती और होली खेलने को आतुर लगती हैं। राधा-कृष्ण गोपियों के बीच हैं और रंग-गुलाल भरे दिखाए गए हैं। चित्र निर्माण में फलक इतना भव्य और लुभावना है कि वह दूर तक देखा जा सकता है। इसके चारों ओर लाल रंग में बेल-बूटे और पत्तियों को ऐसे गूंथा गया है कि देखते रहने पर भी मन नहीं थकता। इस चित्र में इतनी बारीकियां हैं कि होली का केंद्रीय भाव चित्र में मनोयोग से चित्रित हुआ है।

राधा-कृष्ण एक-दूसरे को नेत्रों से देख रहे हैं और प्रणय भाव की गहराई जताई गई है। अलवर शैली के अन्य लघु चित्रों में भी नायक-नायिकाओं को रंग खेलते बताया गया है। होली और कृष्ण के साथ आदि जुड़ाव होने के कारण चित्रकारों ने कृष्ण की लीलाओं को अभिव्यक्ति दी है।राजस्थान की लघु शैलियों में राधा-कृष्ण को आधार बना कर संयोग-वियोग और ऋतु वर्णन को भी दर्शाया गया है। आज भी हर साल लाखों चित्र कॉपी करके बनाए जाते हैं और बड़े-बड़े इम्पोरियमों के माध्यम से विदेशों में बेचे जा रहे हैं। हालांकि इससे लघु चित्र शैली की मौलिकता छिन्न-भिन्न हो रही है और भारतीय चित्रकला का व्यवसायीकरण विकृत स्वरूप ग्रहण कर रहा है। लेकिन होली को चित्रित करने वाले अनेक चित्रों में शालीन भाव का निरूपण करने में यहां के चित्रकारों ने कमी नहीं छोड़ी है। लघु चित्र शैली का स्वरूप हिंदू राजाओं के शासनकाल के अलावा मुगल शैली में भी परिलक्षित है और तत्कालीन परिवेश और चित्रकारी को प्रमुखता मिली है। राज्याश्रित होने से इन चित्रों में रागात्मक प्रेम को प्रधानता मिली है और उनमें मनोरंजन का शिष्ट स्वरूप अंकित किया गया है।

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First Published on March 11, 2017 3:40 am

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