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शब्दों का सफर

पैट्रिक फ्रेंच की किताब ‘लिबर्टी और डेथ’ के हिंदी अनुवाद की सूचना कुछ साल पहले ट्विटर पर आई थी। किताब का नाम बताया गया था- ‘आजादी या मौत’।
Author September 16, 2015 10:31 am

पैट्रिक फ्रेंच की किताब ‘लिबर्टी और डेथ’ के हिंदी अनुवाद की सूचना कुछ साल पहले ट्विटर पर आई थी। किताब का नाम बताया गया था- ‘आजादी या मौत’। हिंदी अनुवाद के बारे में आए इस ट्वीट पर किसी ने चुटकी ली थी कि हिंदी में ‘स्वतंत्रता अथवा मृत्यु’ नाम हो सकता था, ‘आजादी और मौत’ तो उर्दू के शब्द हैं। इस ट्वीट के बाद कई रोचक ट्वीट दूसरों ने किए थे। किसी ने ‘आजादी’ और ‘मौत’ को हिंदी का शब्द माना था तो कुछ ने इसे खारिज किया। हिंदी और उर्दू को लेकर वहां दो खेमों में बंटे लोग दिखे थे।

शब्दों पर ऐसी बहस अमूमन आज गुम हो चली है और शब्दों के बदलते हुए रूप पत्र-पत्रिकाओं में दिखते हैं। उर्दू का ‘खमियाजा’ अब ‘खामियाजा’ के रूप में स्वीकार्य होता गया है, ‘घमसान’ को लेकर चल रही उठापटक में ‘घमासान’ जीतता हुआ दिख रहा है। इसी तरह ‘मूसलधार’ और ‘पौधरोपण’ को अब ‘मूसलाधार’ और ‘पौधारोपण’ में बदलता हुआ देखा जा सकता है। शब्दों के इस खेल में खेल से बने शब्द ‘खेलवाड़’ के साथ खेलवाड़ हुआ और वह ‘खिलवाड़’ बन गया।

मन की तमाम गांठों के बावजूद साथ चलने को मजबूर पार्टियों से मिल कर बनी सरकार ‘गठबंधन’ कहलाने लगी, जबकि यह गांठ और बंधन से मिल कर बना ‘गंठबंधन’ है। ‘लखपती’ अब करोड़पति, अरबपति की तर्ज पर ‘लखपति’ होता जा रहा है। ‘पुंलिंग’ शब्द से एक बिंदी गायब होकर ‘पुलिंग’ और कुछ जगहों पर अतिरिक्त ‘ल’ जुड़ कर ‘पुल्लिंग’ बनता दिख रहा है।

स्त्रीलिंग और पुल्लिंग का चक्कर तो कुछ ऐसा रोचक है कि अब ‘कलह’ ही कलह का कारण बन गया। इसे बरसों तक पुलिंग के तौर पर इस्तेमाल करते लोग अब इसका स्त्रीलिंग रूप देख कर नाखुश हैं। इसी तरह ‘गेंद’ अब लुढ़क कर स्त्रीलिंग के पाले में आ गई है और इसे अब स्त्रीलिंग के तौर पर इस्तेमाल किया जाने लगा है। शब्दों के प्रति बरते जाने वाले ‘एहतियात’ ने भी अब समर्पण कर दिया है। नतीजा है कि ‘एहतियात’ शब्द का इस्तेमाल अब स्त्रीलिंग रूप में दिख जाता है।

सवाल उठता है कि आखिर शब्दों के इस बदलते रूप में हमें क्या करना चाहिए, किस रूप का इस्तेमाल करना चाहिए! गौर कीजिए कि किसी भी भाषा का व्याकरण उस भाषा को बांधने का काम करता है, जबकि भाषा विज्ञान किसी भाषा में हो रहे परिवर्तन के कारकों की पहचान करता है। उस प्रक्रिया को समझने की कोशिश करता है, जिसके तहत परिवर्तन हो रहे हैं। लंबे समय तक लोक में हो रहे इस्तेमाल के बाद किसी भी शब्द का बदला हुआ रूप मान्य हो जाता है। मसलन, ‘लोग’ अपने आप में बहुवचन शब्द है, पर इस बहुवचन का भी बहुवचन रूप ‘लोगों’ आज धड़ल्ले से इस्तेमाल हो रहा है और हमें कहीं से भी गलत नहीं लगता। इसी तरह उर्दू के कागज के बहुवचन रूप ‘कागजात’ का इस्तेमाल हिंदी में ‘कागजातों’ के रूप में देखने को लगातार मिल रहा है।

मुझे लगता है कि हिंदी भाषा में किसी शब्द के स्त्रीलिंग और पुल्लिंग रूप का निर्धारण उसकी प्रकृति (नेचर) के मुताबिक किया गया है। अब के दौर में स्त्री का पारंपरिक रूप बदल रहा है और इसी अर्थ में पुरुष भी बदल रहे हैं। आने वाली पीढ़ी इस बदलते रूप में अपने ढंग से स्त्री-पुरुष को देख-समझ रहे हैं। उनके देखने-समझने का असर अब उनके लिखने-बोलने पर भी दिख रहा है। अंग्रेजी उन्हें प्यारी लगती है तो अंग्रेजी के अधिकतर शब्द हिंदी में आकर स्त्रीलिंग हो रहे हैं। ‘रोड’ और ‘फोटो’ जैसे शब्दों का स्त्रीलिंग रूप में इस्तेमाल किए जाने के पीछे एक बड़ी वजह यह हो सकती है।

दरअसल, इस बदलाव को भाषा के पतन की तरह देखने के बदले परिमार्जन के रूप में देखने की जरूरत है। इसके साथ ही भाषा के बदलाव को लेकर तार्किक होने की भी जरूरत है। अगर आपकी भाषा में पहले से ही कोई शब्द मौजूद है और दूसरा शब्द अपना रूप बदल कर उस पहले वाले शब्द पर हावी होने की कोशिश कर रहा है तो वह होने दें या नहीं- यह सोचने की जरूरत है।

इस बात को ‘खेल’ से बने ‘खेलाया’ शब्द पर गौर करने से समझा जा सकता है। ‘तेंदुलकर को इस मैच में ‘खेलाया’ गया’- यह लिखना ज्यादा बेहतर नजर आता है, यह लिखने से कि तेंदुलकर को इस मैच में ‘खिलाया’ गया। दरअसल, ‘खिलाया’ शब्द भोजन कराने का अर्थ देता है। यों ट्विटर हो या आपसी बहस- शब्दों के इस बदलते रूप पर जंग छिड़ी हो तो यह सुखद संकेत है कि हमारे भीतर भाषा की सजगता को लेकर अभी जंग नहीं लगा है।

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