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दुनिया मेरे आगेः लाचारी का सफर

सुबह का समय था। ट्रेन अपनी पूरी गति से चाय बागान के बीच से गंतव्य की ओर जा रही थी। चाय के पेड़ों पर उगते नए पत्ते नव जीवन का संदेश दे रहे थे।
Author March 3, 2017 02:52 am
प्रतीकात्मक तस्वीर

सुबह का समय था। ट्रेन अपनी पूरी गति से चाय बागान के बीच से गंतव्य की ओर जा रही थी। चाय के पेड़ों पर उगते नए पत्ते नव जीवन का संदेश दे रहे थे। बीते कल के साथ पुरानी यादें धुंधली होने लगती हैं। कोहरे के बीच से झांकती सूर्य की किरणें धुंधलके को समाप्त करने को आतुर थीं। तो क्या मैं भी अपने बीते हुए कल के अनुभवों से मुक्त हो जाऊं? नहीं-नहीं! इस तरह तो हमेशा से ही करती आ रही हूं। कभी तो आवाज उठानी होगी! लेकिन कैसे? मैंने कोशिश कई बार की। लेकिन क्या फल मिला! सोच कर परेशान हो जाती हूं।
यों भी पूर्वोत्तर का रेल का सफर हर बार एक नया अनुभव दे जाता है। दरअसल, हम पूर्वोत्तर के लोग इस उम्मीद पर जीते रहे हैं कि सब ठीक हो जाएगा। एक ओर लगातार बढ़ती टिकट की दर, दूसरी ओर घटती सुविधाएं। पिछले महीने की कड़ाके की ठंड में तीन घंटे इंतजार कराने के बाद जब राजधानी एक्सप्रेस आई, तब ठंडी हवा ने जितना भी सताया था, सब उसी के झोंकों के साथ बह गया। इधर-उधर इंतजार में बैठे लोग दनादन ट्रेन की ओर लपकने लगे थे।

मैं भी लपकी। उतरने वालों की संख्या चढ़ने वालों से अधिक थी। किसी तरह ट्रेन में चढ़ सकी। लेकिन टिकट के लिए दिए गए अधिक दामों का परिणाम इतना दुखी करने वाला होगा, यह हमने नहीं सोचा था। पहले तो रेलवे के लिए सीनियर सिटिजन यानी वरिष्ठ नागरिक होने का अहसास जाता रहा, जब टिकट काटने के साथ ही हमें केवल गुवाहाटी से तिनसुकिया तक के लिए राजधानी एक्सप्रेस का किराया तीन हजार रुपए भरना पड़ा।
डिब्बे में प्रवेश कर जब अपनी बर्थ तक पहुंचे तो सिर चकराने लगा। सीट पर कंबल-चादर का ढेर। सामान रखने को झुके तो बर्थ के नीचे खाली थाली, चिप्स के पैकेट, आइसक्रीम के कप, पानी की खाली बोतलें। भीतर खाने-पीने की सेवा से लेकर शौचालय तक की सफाई का आलम ऐसा था जो बार-बार सुरक्षा और सुविधा के नाम पर बढ़ाए गए बेलगाम किराए की याद दिला रहा था। यानी ऐसा लगा कि इतना पैसा चुका कर कचरे के डिब्बे में सफर करना है। सफाई के दावे के सामने जहां-तहां बिखरे इस तरह के सामान ‘स्वच्छ भारत’ अभियान को मानो मुंह चिढ़ा रहे थे। इसी तस्वीर के साथ हमारी रेल विश्वस्तरीय सेवा देने का दम भर रही है। क्या इसी बल पर हम भारत को स्वच्छता की ओर ले जाएंगे? यह शिकायत एक आभासी भरोसे में दखल थी। गलती शायद हमारी थी। हमें भी यहां के अन्य लोगों की तरह मोने-मोने थाका यानी चुपचाप रहो की नीति अपनानी चाहिए थी शायद! लेकिन क्यों? क्या हमें सही-गलत में फर्क नहीं करना चाहिए?

ज्यादा देर जगह छोड़ कर रहना भी मुनासिब नहीं लग रहा था। अभी दो महीने पहले हमारी इसी उच्च स्तर वाली ट्रेन से बेटी बिहार जा रही थी और उसका फोन गायब हो गया। रेलवे पुलिस ने रंगिया स्टेशन पर आकर नाम के लिए थोड़ी जांच की, आइआरटीसी ने एकाध मेल और एसएमएस का जवाब दिया। बिटिया खुश कि शिकायत का असर हुआ। लेकिन फोन न मिलना था, न मिला। अब उसे कौन समझाए कि यह सब थोथी दलील है। परिवर्तन इतना आसान नहीं है। कुछ हमें बदलना होगा और कुछ सरकार करेगी तभी परिवर्तन संभव होगा। लेकिन जब तक जनता जनार्दन के स्वभाव में बदलाव नहीं आएगा, सोच नहीं बदलेगी, तब तक कुछ संभव होगा क्या?

पता नहीं हर यात्रा एक यादगार यात्रा कैसे हो जाती है! इस बार के सफर के बाद अब आगे से इतनी कोशिश करूंगी कि किसी सस्ती ट्रेन में ही सफर करूं। कम से कम इस बात का संतोष तो होगा कि हम साधारण ट्रेन में चल रहे हैं! आम लोगों के लिए गंदगी भारत में आम बात है। तो उसे बर्दाश्त करने के लिए कई गुना पैसे तो खर्च नहीं करने पड़ेंगे! हालांकि यह तस्वीर भी मेरे सामने एक हकीकत है कि साधारण ट्रेनों में आरक्षित सीटों के लिए टिकट मिल पाना कितनी टेढ़ी खीर हो चुका है। इसके अलावा, तत्काल से लेकर प्रीमियम और फ्लेक्सी जैसी किराया व्यवस्था ने किस कदर उन मुसाफिरों के शोषण की एक नई व्यवस्था खड़ी है, जो कई बार बेहद लाचारी या मजबूरी में अचानक कहीं जाने के लिए ट्रेन का सहारा लेते हैं। खैर, बाहर सूर्य ऊपर चढ़ने लगा था। एक नई आशा के साथ हम भी आगे अपने गंतव्य की ओर बढ़ रहे थे। शिरीष के पत्तों से छन-छन कर सूर्य की किरणें चाय के नन्हें पौधों पर गिर कर चमक रही थीं और मेरे हृदय में एक आशा की ज्योति भी धीरे-धीरे प्रज्ज्वलित हो रही थी कि अगले सफर में कुछ न कुछ परिवर्तन अवश्य आएगा… उदास न हो मेरे मन!

नूतन पांडेय

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