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दुनिया मेरे आगेः प्रेम पर पहरा

मुझे आज भी याद है कि जब उसके घरवालों को पता चला था कि उसे किसी से प्यार हो गया है तो किस तरह उसके परिवार वालों ने उसे गांव ले जाकर घर में कैद करने की कोशिश की थी।
Author March 29, 2017 03:45 am
चित्र का इस्तेमाल प्रतीक के तौर पर किया गया है

तहसीन मजहर

कॉलेज के दिनों में मेरी एक दोस्त थी। मुझे आज भी याद है कि जब उसके घरवालों को पता चला था कि उसे किसी से प्यार हो गया है तो किस तरह उसके परिवार वालों ने उसे गांव ले जाकर घर में कैद करने की कोशिश की थी। उसकी शादी किसी और से करने की तैयारी की जा रही थी। पर इश्क कहां कैद हो पाता है! शादी के ठीक पहले वह अपने प्रेमी के साथ निकल पड़ी आजाद पंछी की तरह। आज जब भी उससे बात होती है तो वह बताती है कि अपने साथी के साथ वह खुश है। इसी तरह मेरे ननिहाल में एक युवती ऐन शादी वाले दिन ही उस लड़के के साथ निकल कर अपनी दुनिया बसाने निकल पड़ी थी, जिससे उसने प्रेम किया था। ये महज रूमानी बातें भर नहीं है। ये घटनाएं हैं, जो बतौर उदाहरण हमारे आसपास मौजूद हैं। ऐसे फैसले लेने वाले किसी दूसरी मिट्टी के बने लोग नहीं हैं, बल्कि संभव है कि इनमें से कई हमारे अपने भी हों।

यों भी, प्राकृतिक और स्वाभाविक चीजों को भला कोई रोक भी पाता है क्या! जरूरत पड़ने पर इश्क करने वाले सारे बंधन तोड़ कर निकल पड़ते हैं। न जाने कितने जमाने से यह चला आ रहा है! हीर-रांझा, शीरी-फरहाद या रोमियो-जूलियट के नाम तो पिछली कुछ सदियों की यादें हैं। लैला-मजनूं पर कयामत ढाए गए, हीर-रांझा मार दिए गए। लेकिन क्या वे मिट पाए? रोमियो-जूलियट की प्यार की दास्तान किसी को भी भावुक कर दे सकती है।

लेकिन हमारे समाज और उसकी संस्कृति में क्या समस्या है! जो रोमियो मुहब्बत के एक प्रतीक के रूप में दुनिया भर में याद किया जाता रहा है, वह आज हमारे सत्ता-संस्थानों की ओर से एक ‘दुश्मन’ की छवि में कैसे पेश किया जा रहा है! यह कैसे संभव हो पा रहा है कि जो नाम मानवीय सभ्यता के अलग-अलग दौर में एक दूसरे से प्यार बांटने के संदर्भों में लिया जाता रहा है, उसे अपराध का पर्याय बना कर कठघरे में खड़ा किया जा रहा है, लोगों के बीच इसके प्रति एक तरह से नफरत का भाव भरा जा रहा है? महिलाओं या लड़कियों को परेशान करने वालों के खिलाफ अभियान चलाने के लिए क्या कोई दूसरा शब्द नहीं तय किया जा सकता था? असल में प्रेम के प्रति हमारे समाज की इसी जड़ता और आग्रहों के चलते हालत यह है कि जो युवा किसी से प्रेम करते हैं, समाज के ज्यादातर लोग उनके खिलाफ जहर उगलने आगे आ जाते हैं। इसे झूठे सम्मान का सवाल बना कर प्रेमी जोड़ों की हत्याएं तक कर दी जाती हैं।

उम्मीद थी कि वक्त के साथ आधुनिक होते समाज में हालात कुछ सुधरेंगे और लोगों के सोचने-समझने का दायरा बड़ा होगा, उनके भीतर उदार चेतना का विकास होगा। लेकिन सच यह है कि पिछले कुछ सालों के दौरान प्रेम संबंधों के लिए घर छोड़ने और झूठे सम्मान के नाम पर हत्याओं के मामलों में तेजी से इजाफा हुआ है। इससे ज्यादा अफसोस की बात और क्या होगी कि बड़ी तादाद में युवकों या युवतियों को सिर्फ इसलिए मार डाला गया कि वे किसी से प्रेम करते थे। समाज और सभ्यता का जो भाव मनुष्यता का उच्चतम शिखर है, उसके लिए किसी की हत्या कर देने वाली सामाजिक परंपराएं आखिर किन ग्रंथियों से संचालित होती हैं? यानी मन में उगते प्रेम को जाहिर करने पर हजार बंदिशों से आगे हमेशा के लिए खत्म कर देने का रास्ता अपना कर समाज के सत्ताधीशों ने प्रेम को रोकना चाहा। लेकिन यह इश्क है जो किसी भी चुनौती के सामने होने के बावजूद रुकता नहीं है। कुछ समय पहले ही हरियाणा के हिसार में एक दलित युवक की इसलिए हत्या कर दी गई कि उसने एक ऊंची कही जाने वाली जाति की लड़की से शादी कर ली थी। लेकिन यह केवल हरियाणा में सिमटा हुआ जहर नहीं है। यह अमूमन हर राज्य में किसी न किसी रूप में मौजूद है। अगर जाति या धर्म के दायरे दो लोगों के बीच प्रेम होने से नहीं रोक पाते हैं, तो जाति या धर्म को मानने वाले आखिर क्यों इसे रोकने के लिए हर संभव क्रूरता करने की हद तक चले जाते हैं?

दरअसल, बंधनों और जड़ताओं में जीते समाज में प्रेम पितृसत्ता की जड़ों पर चोट करता है और इसलिए जैसे ही प्रेम का कोई मामला सामने आता है, इस सत्ता के सभी सक्रिय होकर इसके खिलाफ खड़े हो जाते हैं। अब बहाना महिलाओं की रक्षा का है, लेकिन व्यवहार में जो चल रहा है, उससे यही लगता है कि संविधान से मिले अधिकारों को भी छीनने के लिए सामंती पितृसत्तात्मक रिवायतों के साथ खुद सरकारें भी खड़ी हो रही हैं। जबकि सरकारों की यह जिम्मेदारी है कि वह संवैधानिक अधिकारों की रक्षा करे। इन सबके बावजूद न प्रेम को रोका जा सका है, न यह रुकेगा। मुखर प्रेम कुछ देर के लिए मौन हो जा सकता है, लेकिन शायद यही मौन जड़ता के खिलाफ एक बगावत साबित होगा!

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