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मुफ्त की सलाह

बिन मांगे मुफ्त में सलाह देना शायद हमारा राष्ट्रीय शगल है। विदेशियों के बीच यह धारणा भी है कि भारत में हर व्यक्ति डॉक्टर और हर र्इंट-पत्थर भगवान है। आपको भले कोई शारीरिक तकलीफ या बीमारी हो, हर आने-जाने वाला मजे में आपको कोई दवाई या फिर किसी डॉक्टर का नाम बता ही देगा और […]
Author August 21, 2015 08:02 am

बिन मांगे मुफ्त में सलाह देना शायद हमारा राष्ट्रीय शगल है। विदेशियों के बीच यह धारणा भी है कि भारत में हर व्यक्ति डॉक्टर और हर र्इंट-पत्थर भगवान है। आपको भले कोई शारीरिक तकलीफ या बीमारी हो, हर आने-जाने वाला मजे में आपको कोई दवाई या फिर किसी डॉक्टर का नाम बता ही देगा और कहेगा कि उसने फलां-फलां व्यक्ति की फलां बीमारी चंद दिनों में ठीक कर दी। ऐसे ‘रायचंद’ या ‘रायबहादुर’ आपको हर जगह मिल जाएंगे।

यह बात सिर्फ बीमारी में नहीं, अन्य क्षेत्रों में भी आम है, भले वह खरीद-फरोख्त का मामला हो या फिर शादी-ब्याह का। खास बात यह है कि अगर आप कुछ निर्णय लेने के बाद उनसे बात करें तो वे आपको विश्वास दिलाने की पूरी कोशिश करेंगे कि अगर आपने उनसे पहले पूछा होता तो फायदे में रहते।

अगर किसी के घुटने में तकलीफ है तो जिसने अपना घुटना बदलवा लिया है, वह घुटना बदलवाने की राय देगा और वह भी उसी डॉक्टर से, जिससे उसने कराया। लोग यह भूल जाते हैं कि घुटने की हर बीमारी में आॅपरेशन जरूरी नहीं है। यह भी जरूरी नहीं कि जो दवा आप खा रहे हैं वह सभी के लिए मुफीद हों। हमारे यहां बीसियों डॉक्टर बदलते हैं और श्रेय हमेशा उसी डॉक्टर को मिलता है, जिसे आपने आखिरी बार दिखाया है। कुछ लोग दिखाते तो अनेक डॉक्टरों को हैं, पर दवाई किसी की भी नहीं खाते। फिर बड़ी शान से कहते फिरते हैं कि शहर के फलां-फलां डॉक्टरों से वे इलाज करवा चुके हैं। वे मानते हैं कि ऐसा करने से समाज में प्रतिष्ठा बढ़ती है और रुतबा भी।

इसके अलावा, सलाह हाजिर करने के लिए समाज में किसी बात या व्यक्ति पर कायम आस्था का सहारा भी लिया जाता है। बल्कि कई बार यह अंधविश्वास की हद तक चला जाता है। एक बार एक साधु आए। उनके बारे में शहर भर में फैला दिया गया कि वे सभी असाध्य बीमारियों का इलाज करते हैं। फिर क्या था? भीड़ उमड़ने लगी। जबकि वे साधु खुद मधुमेह और रक्तचाप से पीड़ित थे।

भक्तों ने कहा कि वे स्वस्थ थे, पर उन्होंने मरीजों को ठीक करके उनकी बीमारियां ले लीं। यह भी कहा कि मीठा खाकर उन्होंने तप की ताकत से अपनी शुगर शून्य कर ली। सच यह था कि वे दूसरों का इलाज क्या करते, खुद अपना ही ध्यान नहीं रख पाए। वे पहले चलने-फिरने से मोहताज हुए, फिर असमय ही कम उम्र में चल बसे। इंदौर जैसे शहर में न प्रशासन ने यह अंधविश्वास में फैलने के खिलाफ कोई कार्रवाई की और न कोई समाज सेवी और नेता उनके खिलाफ बोला। वे भी दरअसल झोला छाप डॉक्टर ही थे। पर लोग मूर्ख बनते रहे और उन साधु महाराज की आड़ में उनके चमचे लोगों को सलाह देकर अपना प्रभाव बढ़ाते रहे।

हालत यह है कि धर्म के नाम पर आप कंजूस व्यक्ति की भी जेब ढीली करवा सकते हैं। लोग अपनी काली कमाई सरकार को सौंपने करने के बजाय धार्मिक स्थानों पर रखे दानपात्रों में डालना ज्यादा पसंद करते हैं। आप भले ही कैसे भी धन कमाएं, अगर उसका कुछ हिस्सा मंदिर में दान कर दें तो आपके सारे पाप धुल जाएंगे। धर्म की आड़ में और अंधी आस्था के नाम पर हमारे देश में क्या नहीं होता! रतजगे होते हैं, जोर-शोर से ऊंची आवाज में लाउडस्पीकर बजाए जाते हैं, आरती और भजन के नाम पर लोगों को परेशान किया जाता है, सड़क अवरुद्ध कर जुलूस निकाले जाते हैं और जबरन चंदा उगाही होती है। यह साबित करने का प्रयास किया जाता है मानो धर्म के नाम पर गैरकानूनी काम करने का अधिकार मिल जाता है। इसके पीछे भी कुछ लोगों की यह सलाह होती है कि जागरण या ऐसे धार्मिक आयोजनों से भगवान प्रसन्न होते हैं और व्यक्ति का कल्याण करते हैं।

बहरहाल, सलाहों पर आधारित सामाजिक जीवन और धार्मिक गतिविधियों के संदर्भ में एक मराठी लघुकथा बड़ी सारगर्भित है। एक संत थे जो मंदिर में बड़ी धूमधाम से लाउडस्पीकर लगा कर आरती, प्रवचन और धार्मिक आयोजन करते रहते थे। आसपास के निवासी परेशान थे। पर धर्म आड़े आने से सब सहन करते रहे। एक बुजुर्ग तंग आकर मर गए। एक विद्यार्थी न पढ़ पाने से फेल हो गया और फिर मंदिर में लोगों का आना भी कम होने लगा। संत का देहावसान हुआ और वे बड़े गर्व से स्वर्ग में जाकर अपना स्थान पूछने लगे। उन्हें बताया गया कि उनके खिलाफ एक हत्या, एक विद्यार्थी के फेल होने का पाप और अन्य भक्तों को भगवान से दूर करने का अपराध है। इसलिए उनका स्थान स्वर्ग में नहीं, नरक में है!

सूर्यप्रकाश चतुर्वेदी

 

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