June 25, 2017

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दुनिया मेरे आगेः हर रंग मुहब्बत का

मैं जब बड़ी हो रही थी तो मेरे आसपास अनेक बोली और भाषा के रंग थे। मैथिली, मगही, बांग्ला, उर्दू, पंजाबी, तेलुगू समेत बिहार के हर कोस पर बदल जाने वाली बोली हमारे बीच थी।

Author March 17, 2017 02:54 am
प्रतीकात्मक तस्वीर

निवेदिता

मैं जब बड़ी हो रही थी तो मेरे आसपास अनेक बोली और भाषा के रंग थे। मैथिली, मगही, बांग्ला, उर्दू, पंजाबी, तेलुगू समेत बिहार के हर कोस पर बदल जाने वाली बोली हमारे बीच थी। हम सबने उसी परिवेश में रहते हुए कुछ भाषाएं बिना मेहनत किए सीख लीं। जैसे बांग्ला, उर्दू और मैथिली, कुछ पंजाबी और कुछ तेलुगू के शब्द। बांग्ला और उर्दू तो जैसे हमारे बीच की ही भाषा हो गर्इं। भाषा के संस्कार जेर, जबर, नुख्ता दुरुस्त हुए। ये सब इसलिए हुआ कि अलग-अलग भाषा, संस्कृति से जुड़े लोग एक ही मुहल्ले में साथ रहते थे। हमारे बीच भात और रोटी का साथ था। मां कोई सालन बनाती तो शबनम चाचा के घर भेजती, चच्ची गोश्त भेजती। उसी मुहल्ले में केरल से आकर बसे परिवार से हम लोगों की गहरी दोस्ती थी। रज्जी उस परिवार का बेटा और मैं उसकी दीदी थी और अरमान भाई हम सबके भाई।

अरमान भाई को इस बात का मलाल वर्षों तक रहा कि मेरी वजह से मुहल्ले की सारी लड़कियों के वे भाई हो गए थे। राखी के दिन हमारे अपने भाइयों से ज्यादा मुहल्ले के भाई थे जो बहनों की सुरक्षा में लगे रहते थे। कभी-कभी हमें खीझ होती थी उनके भाई वाले रौब से। लेकिन हम सीख रहे थे, जीवन के अनेक रंगों से घुल-मिल रहे थे। आज जब मैं अपने देश में भाषा को लेकर गहरी हो रही दीवार को देखती हूं तो लगता है कि हम किस रास्ते चल पड़े हैं। हम कौन-सी जुबान को अपनी कहें, किसे पराई! सारी जुबानें हमारे देश की रगों में बह रही हैं। हिंदी-उर्दू तो बहनें हैं। उन्हें कैसे अलग कर सकते हैं!

मैंने उर्दू और बांग्ला का संस्कार अपने बचपन से पाया। अगर नसीम चाचा, शबनम चाचा और उस जुबान को बोलने वाली मेरी सहेलियां नहीं होतीं तो हम सब उर्दू की खुशबू से, उसकी तहजीब से वाकिफ नहीं होते। मुझे याद है छुटपन में हम सारे दोस्त कभी शबनम चाचा तो कभी रज्जी के घर पड़े रहते। हिंदी, उर्दू, कन्नड़, बांग्ला जुबान का घाल-मेल होता रहता। हम लोग खूब हंसते। अक्सर देर हो जाती तो चच्ची कहती- ‘अरे अपने घर जाओ। रात हो रही है।’ उनका कहना था कि बाज (बुरी आत्मा) बदरूहें बच्चों की शक्ल में निकलती हैं। बदरूहें हवा में चिरागों की तरह उड़ती हैं। हमारी बोउदी बांग्ला में कहतीं- ‘तुमरा एकला जाबे ना, दादा संगे निये जाओ’ और काकी कहतीं- ‘भादों के पूर्णमासी रैत में आत्मा सब नाव पर सवार भ घुमैत रहे छै!’

हम बच्चे थोड़ा डरते और थोड़ा आत्मा की रहस्यमय दुनिया के असर में रहते। यह कितनी अनोखी बात थी कि एक ही तरह की चिंता सारी जुबान में थी। बांग्ला मैंने सबसे आसानी से सीखी। बांग्ला और मैथिली आसपास लगती हैं। भला हो उस समय का जिसमें सारी जुबानें एक दूसरे की कातिल नहीं दोस्त थीं, बहनें थीं। ये जुबान हमारी रूहें हैं। इसी दौर में मैंने उर्दू पढ़ी, बांग्ला और मैथिली भी। उर्दू की लिपी नहीं सीख पाने का मलाल है मुझे। इस बात का गहरा अफसोस है कि मैं अपने देश की और जुबान नहीं सीख पाई। उर्दू से मुहब्बत हुई। फ़ैज़ मेरे पसंदीदा शायर हैं। क्रांति और मुहब्बत से लबरेज उनकी नज्म हम जवां दिलों पर राज करती थीं, आज भी करती हैं।

मैंने उर्दू में लिखने वाले तमाम अफसानानिगार को पढ़ा। मंटो, इस्मत, कुर्रतुल-एन हैदर को पढ़ते हुए जाना कि जुबान और देश की मुख्तलिफ तहजीब को जाने बगैर आप न तो बेहतर अफसानानिगार हो सकते हैं, न बेहतर इंसान। जब मैं कुर्रतुल-एन-हैदर को पढ़ती हूं तो लगता है कि उन्होंने अपने देश की संस्कृति को कितने बेहतर तरीके से समझा है। कितनी गहराई है उनमें। अपनी एक कहानी में लंका का बयान जो उन्होंने किया वह क्या बगैर अपनी संस्कृति को समझे लिखा जा सकता है? वे लिखती हैं- ‘समंदर के वस्त में एक पहाड़ है। उस पर ब्रह्मा ने एक मजबूत किला बनाया है। जो इंद्र के शहर अमरावती से भी ज्यादा खूबसूरत था, जो लंका कहलाता था। उसके चारों ओर समंदरी पानी की खंदक थी और उसकी दीवारें सोने की थीं जिनमें हीरे-जवाहरात जड़े थे। रावण ने उस लंका को अपनी राजधानी बनाया था। इशरत, दौलत, बेटे, अफवाज, फतहो-नुसरत, ताकत, जहानत, सब कुछ उसका था।’

ये कुर्रतुल-एन-हैदर ही लिख सकती हैं, जिनके लिए रामायण और कुरान अलग नहीं हैं। जिन्होंने दुनिया की सारी तहजीब, इतिहास और संस्कृति को समझा है। अब जो लोग भाषा को लेकर नफरत की दीवार खड़ी कर रहे हैं, वे बताएं कि ये किसकी भाषा है? किसकी तहजीब है? तुम कौन-सा रंग चुनोगे/ हर रंग मुहब्बत का है/ हर जुबान हमारी है/ हर तहजीब में देश बसा है/ और हर शब्द में महकते हैं/ रंग-बिरंगी जुबां के फूल।

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First Published on March 17, 2017 2:53 am

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