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दुनिया मेरे आगेः सीखने के स्तर

एक जनशिक्षा केंद्र पर शिक्षकों के साथ पांच दिनों तक संवाद के दौरान कुछ बातें लगातार और कई बार आर्इं। मसलन, कुछ बच्चे होशियार होते हैं और कुछ कमजोर होते हैं।
Author January 24, 2017 02:44 am
(Express File Pic)

प्रेरणा मालवीया

एक जनशिक्षा केंद्र पर शिक्षकों के साथ पांच दिनों तक संवाद के दौरान कुछ बातें लगातार और कई बार आर्इं। मसलन, कुछ बच्चे होशियार होते हैं और कुछ कमजोर होते हैं। होशियार बच्चे तो जल्दी सीख जाते हैं, मगर कुछ जो कमजोर होते हैं, उनके साथ कितनी भी मेहनत कर ली जाए, उनका कुछ भी नहीं हो सकता। इस बात पर मौजूद सभी सदस्यों की सौ फीसद सहमति होती। बच्चों के नहीं सीखने के लिए उनके परिवार, माता-पिता का अनपढ़ होना या घर पर पढ़ाई का वातावरण न होने को जिम्मेदार ठहरा दिया जाता। इस मान्यता के पीछे आखिर क्या कारण हो सकते हैं? जब इस बात पर गहराई से विचार किया तो इसकी बहुत-सी परतें खुलती नजर आर्इं। क्या यह जरूरी है कि हम बच्चों को इस तरह से चिह्नित करें कि यह होशियार बच्चा है और यह कमजोर बच्चा। इस तरह से बच्चों के सीखने की गति तय करना कितना ठीक है? यों आम जनमानस के बीच भी कई बार यह सुनने को मिलता है कि वंचित समुदाय से आने वाले बच्चों के दिमाग में कमी होती है और इस कारण वे जल्दी नहीं सीख पाते हैं। मगर क्या यही एक कारण है? हम लोगों के लिए यह ‘पहचान’ सिर्फ एक शब्द हो सकता है, लेकिन किसी बच्चे की जिंदगी में यह कितना मायने रखता है, इस बात का हम अंदाजा भी नहीं लगा सकते। इस तरह की पहचान से नत्थी कर देना बच्चों की निजी जिंदगी में भी गहरा और नकारात्मक असर डालता है। परीक्षा के समय बच्चों की आत्महत्या की घटनाओं से हम सभी परिचित हैं।

सीखने के सिद्धांत को देखें तो उसमें कई सारी बातें शामिल हैं। मसलन, सीखने के लिए यह जरूरी है कि बच्चा उस प्रक्रिया में कितना शामिल हो पा रहा है। अपनी बात रखने, प्रश्न पूछने और जिज्ञासा को व्यक्त करने के कितने अवसर हैं। कहीं कक्षागत सारी प्रक्रिया इकतरफा तो नहीं चल रही है! पढ़ाई जा रही विषय-वस्तु बच्चों लिए कितनी रोचक है और अगर वह रोचक नहीं भी है तो क्या उसको रोचक बनाने के कोई प्रयास किए गए! वे प्रयास क्या सभी बच्चों को ध्यान में रखते हुए किए गए या कुछ खास बच्चों के संदर्भ में ही थे? उस विषय वस्तु को क्या बच्चों के स्थानीय परिवेश से जोड़ कर बताया जाता है। क्या वह विषय-वस्तु उसको अपने संदर्भ से जोड़ कर देख पाने में मदद करती है? शिक्षक का व्यवहार किस तरह का है? बच्चों के साथ भावनात्मक रिश्ता उनके सीखने में भी मदद करता है। क्या बच्चों को कक्षा में अपनी भाषा में बात करने की गुंजाइश है। या फिर मानक भाषा में ही सारी कवायद हो रही है? बच्चों की गलतियों को किस तरह से देखा जा रहा है और उसके सुधार के तरीके किस तरह के हैं!

यानी सीखना कोई एकाकी प्रक्रिया नहीं है। कई सारी चीजें इसके साथ चल रही होती हैं। अगर बच्चे उन तबकों से आ रहे हैं, जिनके पालक बेहद गरीब हैं और दिहाड़ी मजदूरी करते हैं, माता-पिता के पास बच्चों के लिए समय नहीं है, क्योंकि जिंदगी जीना सबसे बड़ा संघर्ष है, तो इस स्थिति में तो बाल-सहित्य या अन्य शैक्षिक सामग्री से उनका वास्ता रहा हो, इसकी कल्पना भी नहीं की जा सकती। नतीजतन, ऐसे बच्चे अन्य बच्चों की तुलना में कम अनुभव लेकर आते हैं। ऐसे में एक शिक्षक की जिम्मेदारी और भी बढ़ जाती है कि इन बच्चों पर विशेष ध्यान दिया जाए। यह बात सिर्फ स्कूलों में ही नहीं, अन्य जगहों पर भी समान रूप से लागू होती है। जल्दी या देर से सीखना एक प्रक्रिया है और हर बच्चे के सीखने का एक क्रम है। सीखना तो दोनों स्थितियों में हो रहा है और हर बच्चा सीख सकता है, भले ही उनकी गति में फर्क हो। फिर यह गैरजरूरी प्रतिस्पर्धा किसलिए? अगर यह हो भी, तो एक स्वस्थ प्रतिस्पर्धा हो। मगर ऐसा नहीं है। सच यह है कि एक पालक और फिर एक शिक्षक के रूप में वास्तव में हम बच्चों को सीखने की आजादी नहीं देते।

यह सिर्फ स्कूलों में पढ़ाए जाने वाले विषयों तक सीमित नहीं है, बल्कि आम जनजीवन में भी देखने को मिलता है। ‘फलां का बच्चा तो गाड़ी चलाना सीख गया, मगर इसको तो आती नहीं है।’ ‘इसको हर चीज में टाइम लगता है।’ ऐसे वाक्य अपने आसपास हम आमतौर पर सुन सकते हैं। लेकिन इसका मतलब यह हुआ कि हम बच्चे को एक व्यक्ति के रूप में देख ही नहीं रहे हैं। एक मशीन समझ रहे हैं। याद रखना चाहिए कि बच्चे कोई मशीन नहीं हैं जो बड़ों के टाइम-टेबल के अनुरूप सब कर लें। वे स्वतंत्र व्यक्ति हैं। जरूरत बस इसकी है कि बच्चों को अपनी गति से और अपनी विधि से सीखने के अवसर दिए जाएं।

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