April 28, 2017

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दुनिया मेरे आगे- भीड़ में सन्नाटा

जब दो या तीन दिन की छुट्टियां एक साथ आती हैं, तब हम बाहर भागने का प्रयास करते हैं।

चीन में बिल्डिंग के बीच से गुजरती हुई ट्रेन। (Photo Source: Twitter)

शहरों-महानगरों में अगर कोई अकेला महसूस कर रहा हो, निराश हो, एकाकीपन से भरा हो तो उसके पास शहर में भटकने और मॉल में घूमने के अलावा क्या कोई और जगह है जहां वह जा सके? शायद यह हमारी आज की जिंदगी की सबसे बड़ी विडंबना है कि जैसे-जैसे हम आधुनिक हुए हैं, वस्तुओं से घर को दुकान की तरह बना लिया है, वैसे-वैसे अंदर से इतने खाली और खोखले हो गए हैं कि हर वक्त बाहरी चीजों से उस खालीपन को भरने की कोशिश करते हैं। किसके पास वक्त है किसी के अकेलेपन, खुशी, निराशा में साथ होने का। सबके सब अपने-अपने अकेलेपन के साथ हैं। जो अकेला नहीं है वह भीड़ में है। भीड़ उसके अंदर इस कदर बैठ चुकी है कि वह भीड़ से बाहर खुद को न देख पाता है और न पहचान पाता है।

जब दो या तीन दिन की छुट्टियां एक साथ आती हैं, तब हम बाहर भागने का प्रयास करते हैं। जिनके पास सुविधा है, उनकी गाड़ियां उत्तराखंड, पंजाब, राजस्थान या हिमाचल की ओर दौड़ने लगती हैं। जिनकी जेब मोटी हैं, वे सिंगापुर, बैंकाक, थाइलैंड या श्रीलंका तक दौड़ आते हैं। रफ्तार में रहने वाली हमारी जिंदगी हर वक्त गतिमान रहती है। लेकिन इस रफ्तार में हम बहुत कुछ खो भी रहे हैं, इसका अहसास शायद कुछ समय बाद हो। यह भी संभावना है कि हमें इसका इल्म तक न हो और हम एक लंबी यात्रा पर निकल पड़ें।
हो सकता है कि यह खालीपन एक महानगरीय शहराती माहौल की उपज हो। लेकिन यह एकाकीपन बहुत तेजी से महानगरीय धड़कनों का हिस्सा बनता जा रहा है। यही कारण है कि युवाओं के अलावा वयस्क होती पीढ़ी भी अपने अंदर के खालीपन को मॉल जैसी भीड़ में भरने की कोशिश करती है। भला हो आजकल के फोन का जिसमें अच्छे कैमरे आने लगे हैं। कोई कहीं जाता है, घूमता-टहलता है, तो उस क्षण को लेंस में कैद कर सबको बताता है कि देखो, वह भी भीड़ में है, एकाकी नहीं है… जीवन की भाग-दौड़ में वह भी शामिल है।
छोटे और मंझोले शहरों की जिंदगी भी बदली है। लेकिन महानगरों के मुकाबले कम। यों तो घर पर काम यहां भी हैं, लेकिन उसकी प्रकृति अलग है। घरों में कामकाज, खाने-पीने की रुचियां बदल रही हैं और लोग कई बार औसत ही सही, रेस्टोरेंटों का रुख करते हैं। मगर छोटे शहरों में अभी भी घर पर नाश्ता बनाने का चलन बचा हुआ है। इसके बावजूद वहां अब तेजी से फास्ट फूड घरेलू नाश्तों, शाम के नाश्तों का गला घोंट रहे हैं। हर गली, मुहल्ले के मुहाने पर चाउमिन, बर्गर, मोमोज की दुकानें देखी जा सकती हैं।

कुछ अंतरराष्ट्रीय ब्रांड खानपान, वेशभूषा बनाने वाली कंपनियां छोटे और मंझोले शहर को निशाना बना रही हैं। आखिर वे भी तो सूचना और खबर की दुनिया का हिस्सा हैं और उन्हें भी देश-दुनिया के ब्रांडेड सामान देखने-सुनने को मिल रहे हैं। इसलिए अब वे तमाम चीजें शहरों-कस्बों में भी उपलब्ध हैं जिनके लिए कभी दिल्ली या कोलकाता जैसे महानगरों का मुंह जोहना पड़ता था। इसने स्थानीय बाजार और दुकान की बिक्री को प्रभावित किया है। छोटे स्तर पर व्यवसाय करने वाले लोगों को अब अपनी जिंदगी बसर करने के लिए कुछ और कामों की ओर मुड़ना पड़ रहा है। यही नहीं, जनरल स्टोर को अपनी पहचान और रोजगार बचाने के लिए अन्य सामानों की बिक्री भी करनी पड़ रही है। जब से लोगों को एक छत के नीचे वातानुकूलित हवा खाते हुए शॉपिंग की लत लगी है तब से जनरल स्टोर खाली होते चले गए।हालांकि यह सच है कि परिवर्तन और विकास दोनों एकरेखीय नहीं होते। इसके बहुस्तरीय प्रभाव देखे जा सकते हैं। समाज का विकास और परिवर्तन दोनों एक साथ होते हैं। इस दौर में न केवल शहर का भूगोल फिर से परिभाषित होता है, बल्कि वहां की सांस्कृतिक थाती भी नए चोले में ढलती है। फिर इससे किसी को गुरेज नहीं होना चाहिए कि शहर की हवा ही खराब हो गई… बच्चे मॉलों में इश्क ला रहे हैं… या बच्चों को महानगर की हवा लग गई! इसके लिए भी हमें मानसिक रूप से तैयार होना होगा कि शहर का भूगोल बदला है तो वहां का मिजाज भी बदलेगा। उपभोक्ता बाजार के लिए लोग सिर्फ उपभोक्ता होते हैं। बाजार को मुनाफा कमाना होता है। चाहे आपकी संस्कृति, संवेदना पिछले रास्ते से कूच कर जाएं। कभी वक्त था जब व्यक्ति उदास या अकेला होता था तो घर-परिवार या दोस्तों के बीच टहल आता था। अपनों से अपनी बातें, कसक बांट आता था। लेकिन आज कोई ठीक से बात सुनने तक के लिए कोई तैयार नहीं है। हम सब कुछ कहना और अभिव्यक्त करना चाहते हैं… मन की बेचैनी को साझा करना चाहते हैं, लेकिन सवाल है कि किससे कहें? हर कोई तो भीड़ में सन्नाटा बुनने में लगा है तो कोई अपने खालीपन को बाजार से भरने में व्यस्त है!

 

 

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First Published on April 13, 2017 5:37 am

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