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श्रम के स्वर सुहावन

देर तक बिछावन पर बैठी नारियल की तिल्लियों से बनी झाड़ू से बुहारे जाते आंगन से एक विशेष लय में बनते स्वरों को सुनती।
Author November 15, 2017 04:17 am
प्रतीकात्मक चित्र।

मृदुला सिन्हा  

स्वर तो स्वर है। कर्णमधुर लगते हैं अधिकांश स्वर। लय और ताल में संबद्ध। अक्सर मैं अपनी स्मृति में संचित कर्णमधुर स्वरों का स्मरण करती आई हूँ। मैं स्वयं सुखाश्चर्य से भर जाती हूं, क्योंकि मुझे मधुरभाषियों, गीतों के विविध मधुर स्वर, संगीत के अनेकानेक वाद्य-यंत्रों, चिड़ियों, हवा के झोकों तथा समुद्र की लहरों (मैं जहां हूं इस वक्त, वहां अभी अरब सागर की लहरों के स्वर सुनाई दे रहे हैं) के उठते-गिरते स्वरों से भी अधिक मधुर झाड़ू के स्वर लगते हैं। मुझे याद है कि अपने मायके में मां की पुकार से भी मधुर बड़े आंगन और दरवाजे पर लग रहे झाडुओं के स्वर से आंखें मूंदे होने के बावजूद सवेरा होने का ज्ञान होता था। मैं उसी स्वर के साथ उठ बैठती थी। देर तक बिछावन पर बैठी नारियल की तिल्लियों से बनी झाड़ू से बुहारे जाते आंगन से एक विशेष लय में बनते स्वरों को सुनती। कभी-कभी झाड़ू लगाने वाली बाई के कंठ से भी स्वर फूट पड़ते। दरवाजे पर खजूर की सूखी डालियों को बांध कर बनाई झाड़ू ससरती थी। उसका स्वर थोड़ा भिन्न होता था। आंगन में नारी हाथ और दरवाजे पर पुरुष हाथों के स्वर में भिन्नता रहती होगी।

अपने घर का छोटा आंगन हो (अब-तक सात-आठ घरों में रह चुकी) या मंत्री (पति के मंत्री बनने पर) के आवासों के बड़े अहाते या अब राजभवन, प्रात:काल झाड़ू लगते ही थे और दिनचर्या के साथ लेखन के कार्य में भी उन झाडुओं के स्वर पार्श्वगान की तरह सुख देते रहे हैं। स्मरण करती हूं तो मात्र झाड़ू नहीं, खेत में कुदाल चलने, गृह निर्माण के समय वजनदार उपकरण उठाते हुए मजदूरों के ऊंचे स्वर, यहां तक कि हल जोतते समय बैल को आगे बढ़ाने के लिए निकाले गए हलवाहे का स्वर मुझे सुखद अनुभूति देते रहे हैं। हमारे जमाने में खाद्य सामग्री तैयार करने के लिए जांता, ओखल-मूसल और ढेंकी जैसे उपकरणों का उपयोग होता था। मुझे उनके स्वर भी आनंद देते थे। उनकी एक लय होती थी। लय तो चूल्हे पर मिट्टी के बर्तन में भूजा या चिउरा भूजने पर भी होती है। थोड़ी दूर बैठ कर भी जाना-समझा जा सकता था कि क्या भूजा जा रहा है। हर अनाज के साथ हाथ चलाने के लय में भिन्नता होती थी।

आज सुबह अपनी स्मृति पटल पर उन स्वरों को खींच लाई हूं। सब में स्पर्धा-सी हो गई है। झाड़ू, कुदाल, करनी-वसूली, तगारी, ओखली-मूसल-जांता, सब के स्वर मानस पर गडमड्ड हो रहे हैं। आखिर संगीत से भी अधिक वे स्वर मुझे क्यों सुखद लगते हैं, निष्कर्ष पर आती हूं। मेरे मानस-पटल पर धमाचौकड़ी कर रहे सभी स्वर श्रमगीत के हैं। इनकी अपनी मिठास होती है। तत्काल श्रम का कुछ पारिणाम सामने लाने का संकल्प होता है। रसोईघर के सभी उपकरणों के भिन्न-भिन्न स्वर होते हैं। मैं बाहर बैठकर भी अंदाज लगा लेती थी कि रसोईघर में क्या-क्या पक रहा है। कभी-कभी उन उपकरणों के स्वर थम जाने पर स्वयं रसोईघर में जाती थी। स्वर के थमने की वजह जानती थी। श्रमगीत तो श्रमिकों के कंठों से भी गाए जाते हैं। कृषि कार्यों से लेकर मकान निर्माण (छत की पिटाई) के समय भी गीत गाए जाते थे, कार्य की एकरसता की बोझिलता मिटाने के लिए। लेकिन मानव कंठ से निकले स्वरों से भी अधिक लयात्मक उनके हाथों में चल रहे उपकरणों के स्वर होते हैं। जब वे किसी न किसी प्रकार का श्रम करते हैं।

वैज्ञानिकों द्वारा कितने भी डिजिटल उपकरणों की खोज हो जाए, श्रम के ये स्वर नहीं थमने चाहिए। ये स्वर मात्र मन को उद्वेलित करने वाले औजार नहीं हैं, ये जीवन से जुड़े हैं। श्रम आधारित, श्रम से सिंचित-निर्मित और श्रमगान से पूरित ही स्वर ही जीवन है। कृषि, गृह और निर्माण कार्य का भी अपना संस्कार होता है। इन क्षेत्रों की अपनी-अपनी कलाएं हैं, अपने-अपने स्वर हैं। ये श्रम कलाएं पीढ़ी-दर-पीढ़ी सीखी जाती रही हैं। एक साथ तीनों पीढ़ियों को आनंद देती हैं। श्रम का रूप और उपकरण भले ही बदल जाएं, उनके भाव नहीं बदलेंगे। भाव नहीं तो स्वर क्यों बदलें। अभी-अभी मन में उत्पन्न अपनी यह अभिनव अनुभूति समाप्त करने जा रही हूं। मन में संजो कर रख रही हूं। मेरे सामने पसरे अरब सागर की लहरों के श्रम गान के स्वर उच्च हो गए हैं। इसलिए तो नहीं कि उनके स्वर को अनसुना कर मैं लेखन में डूब गई थी। इन लहरों से क्षमा पार्थी हूं। मैं तो किसी भी श्रम से निकले स्वर की पुजारी हूं। मन मस्त कर देते हैं ये श्रम-स्वर। ये स्वर हैं तो सृष्टि है, पृथ्वी पर जीवन और सौंदर्य है। संसार है। सारे श्रमगीतों को नमन करती हूं। पाठकगण मानें, न मानें, बचपन से झाड़ू के स्वर मेरे लिए बहुत सुहावन होते आए हैं। उसके गान के साथ-साथ जमीन स्वच्छ जो हो जाती है। स्वच्छता शीतलता भी प्रदान करती है। आनंददायक होती है।

 

 

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