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दुनिया मेरे आग: रुचियों के पाठ

बच्चों की भाषाई क्षमताओं की पहचान कर उनके साथ काम करने से जहां अपनी संस्कृति से जुड़ाव की प्रक्रिया मजबूत होती है।
Author नई दिल्ली | August 31, 2016 23:17 pm
संस्कृत भाषा (representative image)

अब तक की पूर्व-धारणा यही कायम रही कि बच्चे गीली माटी का लोंदा होते हैं। लेकिन कई अध्ययनों के जरिए यह सिद्ध किया जा चुका है कि वास्तव में कोई भी बच्चा कच्ची माटी का घड़ा नहीं होता, बल्कि उसमें जन्मजात भाषाई क्षमताएं पाई जाती हैं और भाषाई जटिलताओं को आत्मसात करने का हुनर भी बच्चों में मौजूद रहता है। इसके साथ ही यह जानना भी जरूरी है कि बच्चों की तार्किक क्षमताओं और जिज्ञासु प्रवृत्तियों को सहज अभिव्यक्ति उनकी मातृभाषा में ही मिल पाती है। यह तथ्य इसलिए भी महत्त्वपूर्ण है कि जिन मातृभाषाओं के प्रयोग के माध्यम से बच्चे अपने विचारों, व्यक्तियों, वस्तुओं और आसपास के वातावरण से खुद को जोड़ पाते हैं, उन्हीं भाषाओं को नकार कर अपने सही संदर्भों में क्या बच्चों को मानक भाषा सिखाई जा सकती है? बल्कि बच्चों की मातृभाषा के सहज स्वरूप को स्वीकार कर मानक भाषा सिखाने की ओर बढ़ना उनकी समझ को कहीं अधिक विकसित करता है। इससे वे बिना बोझ के सहज रूप से नए माहौल में ढल जाते हैं।

शिक्षाविदों द्वारा एक सवाल अक्सर पूछा जाता है- ‘बच्चे कैसे सीखते हैं?’ जैसा कि ‘बचपन विकास और निरंतर बदलाव की अवस्था है, जिसमें शारीरिक और मानसिक क्षमताओं का पूर्ण विकास शामिल होता है।’ ऐसे में स्वच्छंदता वाला तत्त्व सीखने के लिहाज से कहीं अधिक महत्त्वपूर्ण और सृजनात्मक माहौल देने वाला होता है। यही कारण है कि बच्चे दूसरों के सिखाने की अपेक्षा खुद से अधिक सीखते हैं और अपने पुराने अनुभव को आत्मसात करते हुए आगे बढ़ते हैं। जिस तरह वे खेलों के जरिए आत्मप्रेरित अनुशासन का पाठ पढ़ते हैं, ठीक वैसे ही छोटी-छोटी बातों से वे मूल्यों का संरक्षण करना सीख जाते हैं जो शिक्षा के मुख्य उद्देश्य- ‘समाज को एक बेहतर नागरिक मिलने’ तक सतत जारी रहता है। ‘जिज्ञासा’ सीखने के लिए अनिवार्य गुण है। शायद तभी सीखने के दौरान कोई भी निश्चित ढर्रा बच्चों की सहज रुचियों का गला घोंटता है। लिहाजा इसका प्रतिकूल प्रभाव उनकी समझ पर पड़ता है। साथ ही उनकी सृजनात्मक क्षमता भी प्रभावित होती है। इसलिए सीखने के लिए उन पर कुछ थोपने के बजाय उनके लिए बेहतर अवसर उपलब्ध करवाना कहीं अधिक महत्त्वपूर्ण है।
भारत की भाषाई विविधता जटिल और चुनौतीपूर्ण भले ही हो, पर संवाद के लिए सर्वाधिक अवसर उपलब्ध करवाती है।

ऐसे में बच्चों का व्यावहारिक ज्ञान उनके सीखने में कहीं अधिक मददगार हो सकता है। इसलिए बच्चों की भाषाई क्षमताओं की पहचान कर उनके साथ काम करने से जहां अपनी संस्कृति से जुड़ाव की प्रक्रिया मजबूत होती है, वहीं बच्चों का अपनी जड़ों के प्रति गहरा विश्वास भी बढ़ता है। फिर भी, यह विडंबना है कि हमारे विद्यालय ही वे जगहें हैं, जहां स्वरुचि का गला घोंटा जाता है। यहां पहुंचते ही बच्चों की रुचियों पर लगाम लगा दी जाती है और उन्हें ‘यह मत करो… वह मत करो’ जैसी बातें लगातार सुनने का अभ्यस्त बना दिया जाता है। लेकिन वास्तव में सीखने का रुचियों से क्या संबंध है!पिछले दो साल में राजस्थान के विभिन्न जिलों में सरकारी स्कूल के बच्चों से बातचीत करने का मौका मिला। उस दौरान उनकी विषयगत रुचि के संबंध में अप्रत्याशित तथ्य सामने आए। सभी जगह एक बात ज्यादातर कक्षाओं में बच्चों से पूछी गई कि आपको अपनी पाठ्य-पुस्तकों में कौन-सी किताब सबसे प्रिय लगती है। इस पर लगभग नब्बे प्रतिशत बच्चों का जवाब था- ‘हिंदी की किताब।’ आगे पूछने पर कि उसमें आपको सबसे ज्यादा क्या पसंद है, जवाब कहानी के पक्ष में लगभग यही प्रतिशत मिला। ऐसे में गौर करने वाली बात है कि डेढ़ दर्जन स्कूलों के बच्चों का यह जवाब किस ओर संकेत करता है।

देखने में आता है कि बच्चे सुनने में सबसे ज्यादा रुचि का प्रदर्शन करते हैं। यह उनके स्वभाव का हिस्सा है। मौखिक श्रुति परंपरा विशिष्ट बौद्धिक संपदा होती है। इनका निर्माण कड़े प्रयोगों से जुड़ा होता है। श्रुति परंपरा के चलते तत्कालीन समय और समाज लोक कथाओं को मांजता रहता है, जिससे हर समय इन्हें अपनी प्रासंगिकता के सवाल से नहीं जूझना पड़ता। लोक कथाओं की संरचना में किस्सागोई का अद्भुत गुण मौजूद रहता है, जिसके चलते विभिन्न देशों के आधुनिक साहित्य में शिल्प के नए आयाम गढ़े जा सकते हैं। तो क्या भाषा सिखाने के लिहाज से लोककथाएं सर्वाधिक रुचिकर माध्यम हो सकती हैं? इन बातों पर गौर करते हुए अगर आगे बढ़ा जाए तो शायद बेहतर नतीजे हासिल किए जा सकते हैं।

 

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