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दुनिया मेरे आगे- दूसरों की खातिर

हवा, पानी, खुशबू, रंग, सौंदर्य, फल, फूल ही नहीं, आग, रोशनी और संगीत- सभी औरों के लिए हैं।
प्रतीकात्मक चित्र

अपने किसी काम को कोई व्यक्ति अपने लिए मान सकता है, लेकिन सच यह है कि वह जितना अपने लिए होता है, उससे ज्यादा दूसरों के लिए होता है। एक तरह से देखें तो सभी कुछ दूसरी चीजों के लिए हैं। हवा, पानी, खुशबू, रंग, सौंदर्य, फल, फूल ही नहीं, आग, रोशनी और संगीत- सभी औरों के लिए हैं। यही जीवन का सत्य है। फिर इतनी भागमभाग और उठा-पटक क्यों होती है? पानी चाहे आसमान से होने वाली बारिश का हो, नदी या फिर तालाब या कुएं का, लोगों के लिए ही है। सूरज की किरणें या धूप किसी एक के लिए नहीं, बल्कि सारे संसार के लिए हैं। संगीत और कविता खुद संगीतकार या कवि के लिए न होकर सुनने और पढ़ने वाले के लिए होती है। वह सिद्धांत अब पुराना पड़ चुका है जिसमें कहा गया था कि कविता केवल कवि के लिए होती है। फूलों के रंग और उनकी खुशबू उन्हीं के लिए हैं जो उन्हें चाहते और सराहते हैं। मीठे से मीठे फल भी उनके लिए हैं जो उन्हें खाने के शौकीन हैं, खुद पेड़ों के लिए नहीं। सुंदर से सुंदर प्रतिमा निरर्थक है, अगर बनाने वाले के अलावा दूसरे लोग इसे न देखें और सराहें। इससे इतर, परिवार तभी तक सुखी और संपन्न है, जब तक सदस्यों में एक दूसरे के लिए कुछ भी कर सकने की भावना हो। जैसे ही खुदगर्जी हावी होती है, परिवार का चैन और सुख समाप्त हो जाता है। कहा भी जाता है कि सदस्य परिवार के लिए, परिवार मोहल्ले के लिए, मोहल्ला शहर के लिए, शहर प्रांत के लिए और प्रांत देश के लिए है। निसार अख्तर ने ठीक ही कहा था- ‘यों तो मेरे अशआर जमाने के लिए हैं, कुछ शेर मगर तुमको सुनाने के लिए हैं!’ यानी जो कुछ भी है जमाने के लिए ही है, भले ही उसमें थोड़ा-सा किसी खास शख्स के लिए हो।

इंसान ही नहीं, जड़-चेतन, पशु-पक्षी और वनस्पति- सभी की क्रिया, प्रक्रिया, गतिविधि और दिन-प्रतिदिन की कार्य प्रणाली खुद के लिए न होकर औरों के लिए ही है। मिठाई बनाने वाला हलवाई स्वादिष्ट मिठाइयां बनाता है। इसमें व्यवसाय और निर्भरता का पहलू जरूर है, लेकिन आखिर होता यही है कि जो मिठाइयां वह दूसरों के लिए बनाता है, अपने लिए नहीं। अगरबत्ती का धुआं और गंध या फिर हवा, पानी और कला, सभी खुद के लिए न होकर औरों के लिए हैं। खिलाड़ी भी जब खेलते हैं, तो दर्शकों के लिए ही खेलते हैं। वे कभी नहीं चाहेंगे कि उनका खेल देखने के लिए कोई मैदान या स्टेडियम में न हो। दर्शकों की मौजूदगी ही उन्हें ऊर्जा और जोश देती है। यह समर्थन ही उनका ‘टॉनिक’ है। जैसे हर शायर और कवि दाद चाहता है, वैसे ही खिलाड़ी भी तालियों की गड़गड़ाहट चाहते हैं। अखबार अधिक से अधिक लोगों तक पहुंचना चाहते हैं। विज्ञापन से प्राप्त आय उनकी जीवन रेखा है, लेकिन विज्ञापन भी उसी अखबार को अधिक मिलते हैं जिसकी प्रसार संख्या अधिक हो। यानी अखबार और टीवी भी आम लोगों के लिए हैं, खुद मालिक के लिए नहीं। दुनिया का हर प्रदर्शन दूसरों को दिखाने के लिए ही होता है। फिर चाहे वह आतिशबाजी हो या फिर शादी या कोई और जुलूस। खर्च कोई और करता है और उसका आनंद दूसरे लोग उठाते हैं। यानी आतिशबाजी भी दूसरों के लिए हैं और बैंड-बाजे या जलूस और बाने भी दूसरों के लिए।

दूसरों का ध्यान अपनी ओर आकर्षित करना इंसानी कमजोरी है और ताकत भी। कौन नहीं चाहता कि लोग उसे चाहें, सराहें और उसकी ओर देखें। यानी आज सजते-संवरते और तड़क-भड़क के सारे कौतुक भी औरों यानी दूसरों के लिए ही करते हैं। महफिल हो या समाज के कुछ लोग, दूसरों से एकदम अलग नजर आने के लिए कोई कसर बाकी नहीं छोड़ते। और यह भी दूसरों की खातिर ही किया जाता है। यानी कई खुद से संबंधित और एकदम निजी लगने वाले फैसले भी औरों की खातिर ही लिये जाते हैं। यानी अपनी जिंदगी में बहुत कुछ भले खुद के लिए किया जाए, लेकिन आखिरकार वह अपने लिए नहीं रह जाता। वह किया हुआ तभी महत्त्व पाता है, जब वह आसपास के लोगों, वातावरण और समाज के अन्य लोगों के लिए हो जाता है। यह जमाना मार्केटिंग का है और इसका सीधा संबंध अधिक से अधिक लोगों तक पहुंच कर उन पर अच्छा प्रभाव छोड़ने से है। मार्केटिंग भी भले खुद के लिए की जाती हो, लेकिन वह भी दूसरों से सीधे तौर पर जुड़ी रहती है। उम्दा और आकर्षक कपड़े, खुशबूदार इत्र, महंगे जूते और अन्य तड़क-भड़क इसीलिए है कि लोग उन्हें देख कर तत्काल प्रभावित हों और हैरत में पड़ जाएं। जहां जाएं, अपना असर छोड़ें, यही लोकप्रियता की महत्त्वपूर्ण शर्त है। कौन नहीं चाहेगा कि वह हमेशा लोगों की स्मृति में बना रहे!

 

 

 

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First Published on May 8, 2017 4:49 am

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