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दृष्टि के धुंधलके

कलात्मक वस्तुएं दुकान पर सस्ते में बिक रही थीं। वहां एक सजावटी सामान के रूप में गौतम बुद्ध की प्रतिमा थी, जिसमें पेड़ के नीचे बैठे हुए गौतम बुद्ध परम ज्ञान की मुद्रा में थे।
Author February 21, 2017 05:20 am
प्रतीकात्मक चित्र।

ज्योति सिडाना

कलात्मक वस्तुएं दुकान पर सस्ते में बिक रही थीं। वहां एक सजावटी सामान के रूप में गौतम बुद्ध की प्रतिमा थी, जिसमें पेड़ के नीचे बैठे हुए गौतम बुद्ध परम ज्ञान की मुद्रा में थे। उस दुकान पर अचानक दो लड़कियां आर्इं जो आधुनिक पोशाक में थीं और काफी महंगा मोबाइल हाथ में लिए हुए थीं। उन्हें बुद्ध की वह प्रतिमा पसंद आई और उसकी कीमत पूछने के बाद उसने दुकान में मौजूद एक कर्मचारी से पूछा- ‘इस शोपीस में यह कौन है?’ कर्मचारी ने उत्तर दिया कि मुझे नहीं पता, लेकिन इसकी कीमत दो सौ रुपए है। मैं कुछ बोल पाती, उसके पहले वहां संभ्रांत परिवार की दिखने वाली एक महिला आई और उसने भी उस मूर्ति को पसंद करने के बाद वही प्रश्न दोहराया कि ‘यह कौन है?’

मुझसे रहा नहीं गया और मैंने वहां पर बताया कि ये गौतम बुद्ध हैं और इस पेड़ के नीचे बैठ कर वे परम ज्ञान प्राप्ति की मुद्रा में हैं। इतना कह कर मैं उस दुकान से चल पड़ी, लेकिन मेरे जेहन में ऐसे अनेक प्रश्न उठ रहे थे जो एक शिक्षक के रूप में मुझे उत्तेजित और चिंतित कर रहे थे। एक और उदहारण है। मेरे एक परिचित आइआइटी की प्रवेश परीक्षा की तैयारी कर रही अपनी बेटी के लिए प्रेमचंद का कहानी संग्रह लेकर आए और कहा कि इन कहानियों को पढ़ना, क्योंकि तकनीकी ज्ञान के साथ-साथ समाज को समझना भी जरूरी है। इस पर उसने अपने पापा से पूछा कि ‘ये प्रेमचंद कौन हैं?’ उसका सवाल सुन कर मैं सोचने लगी कि मैंने तो अपनी प्रारंभिक कक्षाओं में ही प्रेमचंद की लोकप्रिय ‘ईदगाह’ कहानी पढ़ ली थी तो क्या इसने नहीं पढ़ी होगी! या फिर ऐसी कहानियां अब हमारे स्कूली पाठ्यक्रम का हिस्सा नहीं रही हैं! सवाल यह है कि आज बच्चे मशहूर स्कूलों में दाखिला लेकर आधुनिक शिक्षा प्रणाली के तहत जो शिक्षा हासिल कर रहे हैं, उसने उन्हें देशज ज्ञान, देशज दर्शन और देशज इतिहास से अलग या दूर करना शुरू कर दिया है?

क्या वर्तमान पीढ़ी अ-ऐतिहासिकतावाद की तरफ अग्रसर हो रही है या किसी उद्देश्य को ध्यान में रख कर उसे इस ओर धकेला जा रहा है। असल में बुद्ध को न पहचानना प्राचीन भारतीय संस्कृति की बहुलता और विविधता को नकारने जैसा है। मैं यहां बुद्ध के दर्शन की चर्चा नहीं कर रही, लेकिन इतना जरूर कह सकती हूं कि जातिवादी मानसिकता और मूर्ति पूजा पर केंद्रित धर्मांधता पर आक्रमण करने के लिए बुद्ध का ज्ञान एक प्रभावी हथियार है। दूसरी तरफ प्रेमचंद की कहानियों में किसानों, मजदूरों, स्त्रियों, दलितों आदि की समस्याएं गंभीरता से चित्रित हुई हैं। उन्होंने समाज सुधार, देशप्रेम, स्वाधीनता संग्राम आदि से संबंधित कहानियां लिखी हैं। उनकी ऐतिहासिक कहानियां और प्रेम संबंधी कहानियां भी काफी लोकप्रिय रही हैं।
बहरहाल, मॉल की उस घटना के बाद घर आकर मैंने प्रारंभिक या प्राथमिक और उच्च-माध्यमिक स्तर की किताबों को पलटा और उसके बारे में जानने की कोशिश की तो पता चला कि बुद्ध पर केंद्रित या उनके बारे में जानकारी देने वाले पाठ बहुत कम हैं। असल में ज्ञान और चिंतन रूढ़िवादिता और जातियों को तोड़ कर कैसे सुधार आंदोलन का प्रारंभिक स्वरूप बनता है, इस पर बहुत अधिक बल नहीं दिया गया। शिक्षा के क्षेत्र में इस प्रकार का क्रांतिकारी और सुधारवादी प्राचीन भारतीय चिंतन अगर उपेक्षा का शिकार होता है तो निश्चय ही वर्तमान पीढ़ी उन परिवर्तन प्रक्रियाओं को समझने में असमर्थ होगी, जिनके माध्यम से भारत ज्ञान के क्षेत्र में अपनी श्रेष्ठता को स्थापित कर सकता है। कोटा के महाविद्यालय में भी मैंने यह पाया कि केवल विद्यार्थियों के बीच नहीं, बल्कि शिक्षकों में भी प्राचीन भारतीय चिंतन, मध्ययुगीन विविधता और स्वाधीनता संघर्ष की विभिन्न विचारधाराओं पर विश्लेषणात्मक दृष्टि के प्रति रुचि का अभाव है।
‘एक भारत श्रेष्ठ भारत’ पर एक शैक्षणिक कार्यक्रम के दौरान भी मैंने पाया कि रवींद्रनाथ ठाकुर, राजा राममोहन राय, स्वामी विवेकानंद आदि के अंतराष्ट्रीयतावाद के मूल्यों को एक बड़ी संख्या में विद्यार्थियों ने अपनी चेतना में स्थान नहीं दिया है। इसमें शिक्षा प्रणाली और शिक्षकों का दोष अधिक है। चूंकि मैं खुद भी एक शिक्षक हूं, इसलिए कहने की स्थिति में हूं कि हम शायद अपने विषय की विशेषज्ञता में इतना अधिक उलझ गए हैं कि विषयों के परे समाजविज्ञान की आंतरिक अनुशासनात्मक दृष्टि को महत्त्व नहीं देते। लगभग यही हाल सामाजिक अनुसंधानों का हो गया है। इन दोनों ही क्षेत्रों में गैर-ऐतिहासिकतावाद का वर्चस्व हमें उस दृष्टि और चिंतन की तरफ ले जाता है, जिसका सामना उस दुकान पर मुझे आधुनिकता में रची बसी गैर-ऐतिहासिक होती पीढ़ी के साथ करना पड़ा। क्या शिक्षा नीति के निर्धारक इस बदलाव और इससे उभरते उन खतरों को महसूस कर रहे हैं जो भारतीय समाज के लिए बहुत घातक साबित होंगे?

 

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