ताज़ा खबर
 

दुनिया मेरे आगे-चिड़िया का मन

कविता और चिड़िया में कोई साम्य हो, न हो, ‘उड़ान’ की अद्भुत क्षमता होती है। दरअसल, यह उड़ान ही दोनों की जीवंतता का रहस्य है।
Author May 17, 2017 06:06 am
प्रतीकात्मक चित्र

जयप्रकाश मानस

कविता और चिड़िया में कोई साम्य हो, न हो, ‘उड़ान’ की अद्भुत क्षमता होती है। दरअसल, यह उड़ान ही दोनों की जीवंतता का रहस्य है। कविता निराकार शून्य में विचरती हुई संपूर्ण बनती है और चिड़िया भी जीवन भर निराधार शून्य में जाने क्या तलाशती रहती है! शून्य में कलाबाजी दिखाने में संभवत: कविता और चिड़िया ही समर्थ हैं। ‘उड़ान’ भी कैसी? रंगमय, रूपवान, रसदार! निराकार में साकार की रचना कविता और चिड़िया के अलावा और कौन करता है? कविता का आकाश मन है और चिड़िया का मन आकाश में होता है। मन कविता का आकर्षण है और आकाश चिड़िया का। मन और आकाश का आकर्षण उनकी शून्यता में है। यह शून्यता निर्मलता का भी पर्याय है। प्रदूषित मन और आकाश में आकर्षण की उपस्थिति नहीं होती। निर्मलता ही ‘उड़ान’ का केंद्र है, जिससे कविता और चिड़िया दोनों चित्तरंजक बन जाते हैं। मनुष्य का स्वभाव है- चितरंजक का सान्निध्य। चित्ताकर्षक वही हो सकता है, जो सर्वदा सत्य हो। सत्य होगा तो निश्चय ही उसमें आनंद की संप्राप्ति होगी। यही सत्, चित् और आनंद है। मनुष्य इसी सच्चिदानंद को तलाशता है, जाने या अनजाने। कविता और चिड़िया दोनों मनुष्य के लिए सुखद हैं, सच्चिदानंद के विषय हैं।

कविता स्वयं में मनुष्यता का स्वप्न है। उसे अराजक घोषित करके पाबंदी के घेरे में लाने की कुचेष्टा और चिड़िया को पिंजरे में जकड़ने की मानसिकता में बुनियादी तौर पर मुझे अंतर नहीं दिखाई देता। कविता की उड़ान चिड़िया-सदृश होनी चाहिए। उड़ान तो कविता में अंतर्निहित होती है। उड़ानरहित कविता फुदक सकती है, उन्मुक्त गगन में उड़ नहीं सकती। कुछ आचोलक यथार्थ को कल्पना के बरक्स खड़ा कर देते हैं। यथार्थ तो क्षणिक होता है। यथार्थ हर क्षण बदलता है। हर क्षण का एक विशेष यथार्थ होता है। फिर यथार्थ ऐसा नीम होता है, जिसके स्वाद और गंध से मन बिदकने लगता है। नीम में थोड़ा गुड़ और थोड़ा केवड़ा मिला दिया जाए तो क्या कहना! नीम का अनुभव भी हो जाए और मन भी कड़वा न होने पाए।
कविता संवाद है। उसे वाद-विवाद की खाई में धकेलना बहेलिए का काम है। भावों के अनंत आकाश में कवि जब तक नहीं उड़ेगा, उसकी कविताई उस पतंगबाज की तरह ही सिद्ध होगी, जो जब चाहे जिधर चाहे, पतंग की दिशा तो मोड़ सकता है, पर कविता कोई पतंग नहीं, वह तो पक्षी है, जो अपने डैने से हवा को काटते हुए सिर्फ उड़ना जानती है। मौसम के व्याकरण से उसे ज्यादा क्या लेना-देना? आंधी चली, बिजली कड़की, ओले गिरे, तो थोड़ा थम लिया, फिर उड़ान, उड़ान और सिर्फ उड़ान!

चिड़िया गाती है, गुनगुनाती है। कविता भी गेय है। कविता में भी कलरव होता है। यह कलरव कविता का सौंदर्य है। ध्वनिवादियों के यहां कलरव को ही कविता कहा गया है। कुछेक मीमांसाकार सौंदर्य से कहीं ज्यादा सार्थकता का समर्थन करते हैं। कविता में सर्वदा सार्थकता का आग्रह प्रकारांतर से अतिवाद है। सच है कि सौंदर्य और सार्थकता के द्वंद्व में हम बहुधा सार्थकता को पक्ष में जा खड़े होते हैं। लेकिन यह भी उतना ही सच है जो इस विवशता से छुटकारा पाते ही सौंदर्य की समीपता के लिए छटपटाने लगते हैं। नन्हे बच्चों को अर्थहीन शब्दों को गाते-दोहराते सुन कर हम उनकी सार्थकता पर अंगुली नहीं उठाते, बल्कि गाने-दोहराने के रिद्म पर, सौंदर्य पर रीझ-रीझ जाया करते हैं। बहरहाल, विहंग-गान यानी कलरव में हम पक्षी विज्ञानी हुए बिना, समझे बिना भी रस लेते हैं। जैसे एक चिड़िया दूसरी से कह रही हो- ‘यहां आओ न! कहां हो तुम?’ तो दूसरी चिड़िया कहती हो- ‘तुम आओ; देखो, गदराए फलों से लदी डालियां हैं यहां!’

कविता और चिड़िया दोनों के सर्जकों के व्यक्तित्व में काफी मेल होता है। कविता कवि के अनुभव, भावना और बुद्धि की उपज है, तो चिड़िया प्रकृति या ईश्वर की। कवि को उसकी साधना के लिए ‘ब्रह्म’ कहा गया है। कविता का मर्म एकांत में खुलता है। ठीक उसी तरह चिड़िया का मर्म भी किसी चिड़ियाघर के शोरगुल में नहीं, किसी निर्जन वन में खुलता है। या फिर फूटते हुए भोर और चुकती हुई रात के बीच के एकांत में। कविता और चिड़िया उजियारे की ही मुनादी करती हैं। चिड़ियों की प्रभाती से पहले ‘सुरुज नारायन’ कभी नहीं जागते। कवि के बारे में भी मान्यता है कि अगर वह ईमानदार है तो उसकी हर गुनगुनाहट अक्षरों में पहले रूपायित होगी, भोर बाद में होगी।लोक विश्वास है- चिड़िया बहेलिया और साधु को पहचानने में नहीं चूकती। अगर उन्हें यह पता चल गया कि समीप पहुंचने वालों से नुकसान है तो चिड़ियों में एकाएक हलचल मच जाती है। कविता भी अमानवीय पदचापों को भांप कर खतरों से सावधान कराने वाली हलचल है। स्मृति की सदानीरा कविता में कभी नहीं सूखती। स्मृति भविष्य के लिए बाधा नहीं, वह भविष्य की कविता है। चिड़िया भी स्मृतिवान होती हैं। बदलते हुए मौसम से आदतन परदेशी बन जाते छत्तीसगढ़िया आदमी को भले ही गांव-घर की सुध न आए, पर कई प्रवासी पक्षी ऐसे हैं, जो उसी दिन वापसी के लिए डेरा उसाल लेते हैं, जिस दिन वे गत वर्ष वापस आए थे।

 

 

 

Hindi News से जुड़े अपडेट और व्‍यूज लगातार हासिल करने के लिए हमारे साथ फेसबुक पेज और ट्विटर हैंडल के साथ गूगल प्लस पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News App

First Published on May 17, 2017 6:06 am

  1. No Comments.
सबरंग