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दुनिया मेरे आगे- रक्त के आंसू

किसी साल उनके अभिसार को प्रतीक्षारत धरती सूनी आंखों से आकाश को निहारती रह जाती है तो किसी साल वे उसकी प्यास पूरी तरह मिटा कर उसे ‘हरित भूमि तृण संकुलित’ में बदल देते हैं।
प्रतीकात्मक चित्र।

आकाश में काले बादल मंडराते हैं। कभी जम कर बरसते हैं तो कभी उमड़-घुमड़ का शोर मचा कर चुप हो जाते हैं। किसी साल उनके अभिसार को प्रतीक्षारत धरती सूनी आंखों से आकाश को निहारती रह जाती है तो किसी साल वे उसकी प्यास पूरी तरह मिटा कर उसे ‘हरित भूमि तृण संकुलित’ में बदल देते हैं। वर्षा जब आती है तो मेघ-मल्हार की धुन पर मनमोहक नृत्य दिखा कर उसकी रिमझिम बूंदें तन-मन को भिगा देती हैं। लेकिन वर्षा के सौंदर्य को कई गुना और बढ़ा देने वाली, लाल रेशमी परिधान में सजी वे शर्मीली सुंदरियां अब जाने कहां गुम हो गई हैं, जिन्हें देखे बिना वर्षा ऋतु का आनंद अधूरा रह जाता था। ‘घन घमंड गरजत मन मोरा पियाहीन तरपत मन मोरा’ कहने वाली आयु होने के बहुत पहले ही रिमझिम फुहारों में भीगी हरी-भरी धरती को लाल बूटियों जैसी सजाती, मंद चाल चलती जब वे नहीं दिखती थीं तो मेरा बालमन उदास हो जाता था। उन्हें बीरबहूटी के नाम से जाना जाता है। इंसान का बच्चा चाहे जितना भी अबोध हो संग्रह करने की प्रवृत्ति से कब उबर पाता है! शैशव के बाल्यावस्था में बदलते ही एक निरर्थक और क्रूर प्रवृत्ति जाग उठी थी। दरअसल, छू लेने भर से उन्हें खुद को सिकोड़ लेते देखना अच्छा लगता था, लेकिन उसकी क्रूर परिणति होती थी खाली माचिस की डिब्बी के अंदर उन्हें कैद करने में। परियों की राजकुमारी को अपने किले में कैद कर लेने वाले राक्षस की कहानी सुन कर उस पर कितना ही गुस्सा आता हो, लेकिन उन लाजवंती रक्ताभ बीरबहूटियों को अपने चंगुल में कैद कर लेने से कब मन मानता था।

बड़ों की मीठी झिड़की उन्हें तुरंत कैद से मुक्त न करने पर तीखी डांट-डपट में बदल जाती थी। वे बताते थे कि उन्हें डिब्बी में कैद करने का परिणाम होगा उनकी असमय मृत्यु, तो पश्चाताप होता था। लेकिन अगले ही दिन की बारिश में वह सारा पश्चाताप धुल जाता था। आकाश में बादल घिरते ही फिर से हरी घास पर घूमती उन बीरबहूटियों को डिब्बी में बंद कर लेने को मन आकुल हो उठता था। बहूटी और वधू-सी, दोनों शब्दों की ध्वनि में कितना साम्य है न! एक बार मेरी डिब्बी में कैद बीर बहूटी को देख कर मां ने हंस कर पूछा था- ‘तुम्हारी वधू इतनी ही सुंदर हुई तो क्या उसे भी कैद कर के रखोगे?’ तो मेरे गाल रक्ताभ हो गए थे। लेकिन अकेले में सोचने पर लगा था कि बहूटी वास्तव में वधू-सी ही होती है। लेकिन वह बीर कैसे बनी यह मैंने किसी से पूछा नहीं।

कहां गालों पर झलक आने वाली लज्जा की परछार्इं-सी बीरबहूटी का जीवित सौंदर्य और कहां रक्त जैसी लाल बेशकीमती माणिक यानी रूबी की पथराई सुंदरता। बीर बहूटी के मूल्यांकन में उसकी क्षणभंगुरता आड़े आई होगी। रूबी को सूर्यदेव का रत्न मान कर उसे बेशकीमती पत्थर मानना और इस निरीह अल्पायु जंतु को कीड़े-मकोड़ों की श्रेणी में रखना सिद्ध करता है कि इंसान क्षणभंगुरता से बेहद डरता है। अपने जीवन पर एक दार्शनिक दृष्टि डालते ही उसे अहसास होता है कि जीवन ‘पानी केरा बुदबुदा’ है। फिर वह क्यों न केवल स्थायी सुंदरता को बहुमूल्य समझे! बेचारी बीर बहूटी, कोमल सौंदर्य के बावजूद जिसका सारा जीवन एक बारिश के मौसम तक सीमित हो, इंसान की नजरों में कैसे ऊंची उठ सकती है! मरे को मारे पीर मदार! वह सीमित और क्षणभंगुर जीवन भी अक्सर उसे नसीब नहीं होता, क्योंकि कुछ लोग इसके रक्त और तेल को स्नायु की कमजोरी और पक्षाघात के उपचार में लाभदायक मानते हैं।दुख होता है जब रसिक हृदय कवियों को बीर बहूटी केवल क्रोध में जलती हुई लाल आंखों की याद दिलाती है। ‘गोदान’ में प्रेमचंद को मिर्जा के क्रोध से लाल हो गए मुख पर बीर बहूटी की तरह लाल आंखें दिखती हैं तो ‘पद्मावत’ में मलिक मुहम्मद जायसी खून के आंसुओं में उसे देखते हैं- ‘परी जो आसु रक्त के टूटी, रेंग चली जस बीर बहूटी।’ इतने सुंदर जीव के रंग ने उसे आंसुओं और खून से बांध कर रख दिया है। पद्मावत के गोरा बादल संवाद में जायसी कहते हैं- ‘बीर बहूटी भई चलीं, तबहुं रहहिं नहिं आंसु / नैनं पंथ न सूझई, लागेउ भादों मासु’! लेकिन सबसे क्रूर प्रहार किया गोस्वामी तुलसीदास ने जिन्होंने रक्त के छींटों की उपमा देने के लिए इस निरीह को चुना- ‘शोणित छींट जटानि जटे, तुलसी प्रभु सोहें महाछबि छूटी / मनो मरकत सैल बिसालन में, कहिं फैली चली बर बीर बहूटी’। ऐसे रक्तिम प्रसंगों से मेरी प्रिय बीर बहूटी को उबारा है धर्मवीर भारती ने जो ‘बोवाई’ का गीत गाते हुए कहते हैं- ‘मैं बोऊंगा बीर बहूटी इंद्रधनुष सतरंग/ नए सितारे नई पीढ़ियां, नए धान का रंग/ बदरा पानी दे..!’

 

 

 

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