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दुनिया मेरे आगे- बंद दरवाजे

राजस्थान में तो ऐसे अनेक प्रसंग हैं जब षड्यंत्र के तहत दरवाजे खोले जाने या शत्रु को गुप्त मार्ग का पता बता दिए जाने के बाद रणबांकुरों ने ‘साका’ और रानियों ने ‘जौहर’ किया।
Author August 31, 2017 05:20 am
प्रतिकात्मक चित्र।

अतुल कनक

उस दिन सुबह टहलने के लिए जाते हुए ध्यान आया कि मेरी कॉलोनी के अधिकतर मकानों के मुख्य द्वार इस तरह के हो गए हैं कि कोई परिंदा भी मकान मालिक की इच्छा के बिना पर नहीं मार सकता। पुराने जमाने में आमतौर पर ऐसे दरवाजे बड़ी हवेलियों या गढ़ों के हुआ करते थे, जो भूतल से शुरू होकर छत के स्तर तक चले जाते थे। तब मुख्य दरवाजे भी लकड़ी के होते थे और उनमें एक छोटा खिड़कीनुमा दरवाजा होता था। महलों, किलों, हवेलियों, गढ़ियों में ही नहीं, ऐसे दरवाजे शहर या बस्ती के आसपास बने परकोटे में भी होते थे। इन्हें शाम ढलने के बाद बंद कर दिया जाता था और एक निश्चित समय के बाद आगंतुक उनमें मौजूद खिड़कीनुमा दरवाजों से होकर ही परिसर में प्रवेश कर पाते थे। वह सामंतवादी षड्यंत्रों का दौर था। मुश्किल परिस्थितियों में ये द्वार परिसर की सुरक्षा व्यवस्था सुनिश्चित करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते थे। हालांकि कई बार ऐसा भी होता था कि घर के भेदिये ही कुछ ऐसा करते थे कि इन दरवाजों की भूमिका बेअसर हो जाती थी।

राजस्थान में तो ऐसे अनेक प्रसंग हैं जब षड्यंत्र के तहत दरवाजे खोले जाने या शत्रु को गुप्त मार्ग का पता बता दिए जाने के बाद रणबांकुरों ने ‘साका’ और रानियों ने ‘जौहर’ किया। ‘साका’ उस स्थिति को कहते हैं, जिसमें योद्धा अपना अंतिम दम रहने तक युद्ध के लिए प्रतिबद्ध होते हैं। राजस्थान का एक प्रसंग ऐसे वीरों के बलिदान की उच्च आकांक्षा को दर्शाता है। कहानी है कि एक बार युद्ध के समय दो योद्धा सरदारों में इस बात पर तनातनी हो गई कि अधिक वीर कौन! तय किया गया कि जो शत्रु के गढ़ में पहले प्रवेश कर लेगा वही बड़ा वीर माना जाएगा। किले के द्वार पर लोहे के बड़ी-बड़ी कीलें लगी थीं और उन कीलों की चुभन के कारण हाथी पूरे वेग से दरवाजों को धक्का नहीं दे पा रहे थे। दोनों में से एक वीर कीलों को पकड़ कर लटक गया और उसने सेनापति से कहा कि वह हाथी से उसकी काया पर प्रहार करवाएं। कीलें उसकी काया में घुस जाएंगी। वह भले ही मर जाएगा, लेकिन हाथियों के प्रहार से जब दरवाजा खुलेगा तो वह सबसे पहले शत्रु के गढ़ में प्रवेश करेगा और इस तरह सबसे बड़ा वीर घोषित हो जाएगा। जब दूसरे वीर ने अपने से शर्त लगाने वाले योद्धा को सिंहद्वार की कीलें पकड़ कर लटकते और हाथी को उसकी ओर बढ़ते देखा तो वह सारा माजरा समझ गया। हाथी ने कीलें पकड़ कर लटके हुए योद्धा पर पूरी शक्ति से प्रहार किया तो गढ़ का दरवाजा खुल गया। लेकिन इसके पहले कि दरवाजा पकड़ कर लटके योद्धा की काया परिसर में जा पाती, दूसरे योद्धा ने अपना मस्तक काट कर परिसर में फेंक दिया। इस तरह शर्त के अनुसार शत्रु के परिसर में पहले प्रवेश कर बड़ा योद्धा होने का ‘गौरव’ पाया।

दरवाजे सुरक्षा के लिए होते हैं। लेकिन केवल दरवाजों के दम पर सुरक्षा सुनिश्चित कर ली जाती तो फिर इस तरह के चरित्रों के बारे में सुनने को नहीं मिलता। सुरक्षा तो आस्था के दम पर भी सुनिश्चित की जा सकती है। महाराष्ट्र के शनि शिंगणापुर नामक स्थान पर मकानों में दरवाजे बनाने को अपशगुन माना जाता है। वहां के नागरिक सुरक्षित हैं, क्योंकि यह विश्वास है कि जो व्यक्ति वहां चोरी जैसी नीयत से किसी मकान में प्रवेश करेगा, उसका अनिष्ट तुरंत हो जाएगा।
कई बार आस्थाएं भी दरवाजों का काम करती हैं। लेकिन आस्थाएं जब अंधविश्वास को ओढ़ लेती हैं तो वे चेतना को बंदी बनाने का काम करती हैं। मुअनजोदड़ो सहित सिंधु सभ्यता की अनेक बस्तियों में पाया गया है कि वहां मकानों के दरवाजे मुख्य मार्ग पर नहीं, बल्कि अंदर उपमार्ग की ओर खुलते थे। इसका एक कारण यह भी हो सकता है कि मुख्यमार्ग की भीड़ से बचा जा सके। लेकिन जिन लोगों के मन के दरवाजे सिर्फ अपनी ओर खुलते हैं, क्या काल का प्रवाह उनके अस्तित्व को भी किसी मौत के टीले में बदल देता है?

बहरहाल, बात थी मेरी कॉलोनी के मकानों के दरवाजों की। करीब पच्चीस-तीस वर्ष पहले जब आवासन मंडल ने इस कॉलोनी का विकास किया था तब अधिकतर मकानों के मुख्य द्वार चार गुना चार वर्ग फुट के होते थे। धीरे-धीरे मकानों के मूल निर्माण में परिवर्तन होने लगे और दरवाजे भी बदलने लगे। उस समय मकानों के मुख्य द्वारों की ऊंचाई करीब पांच फुट तक होती थी। लेकिन अब स्थिति बदल गई है। अब दरवाजे फर्श से छत तक की लंबाई के होने लगे हैं। दरवाजों की डिजाइन ऐसी कि देहरी पर खड़ा आगंतुक घर के अंदर बिल्कुल नहीं झांक सके। जिन मकानों के दरवाजे में केवल लोहे के सरियों या चौकोर कोण के दरवाजे हुआ करते थे, उनके दरवाजे पर भी फाइबर की पट्टी लगवा दी गई है। दरवाजों का यह बदलाव लगातार बढ़ती असुरक्षा को दर्शाता है या फिर हमारे संकुचित होते सामुदायिक सद्भाव को। सहजता से किसी निष्कर्ष तक पहुंचना मुश्किल है।

 

 

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