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दुनिया मेरे आगे : प्यास का कारोबार

हमें जीने के लिए पानी के साथ-साथ और भी बहुत-सी चीजों की आवश्यकता होती है। आज कुएं, नदियां और तालाब इतने गंदे हो गए हैं कि जो व्यक्ति पानी खरीदने में सक्षम नहीं है, वह नदियों से पानी लेने और उसे पीने लायक बनाने के बारे में सोच भी नहीं सकता।

Author नई दिल्ली | June 7, 2016 00:22 am
सॉफ्ट ड्रिंक

गरमी का मौसम आते ही हमें सबसे ज्यादा जरूरत अगर किसी चीज की होती है तो वह है पानी। यों यह सिर्फ मनुष्य की नहीं, बल्कि जीव-जंतु, पेड़-पौधों की भी पहली जरूरत है। हवा की तरह यह भी हमारे लिए नैसर्गिक रूप से प्रकृति से मिलता है। लेकिन अब इसकी उपलब्धता के साथ ऐसे आयाम जुड़ गए हैं, जिनसे शायद इसे प्रकृति का नैसर्गिक उपहार कहना मुश्किल हो गया है। आज लोग गरमी में अपनी प्यास बुझाने के लिए केवल बोतलबंद पानी में नहीं, बल्कि बाजार में मिलने वाले कोल्ड ड्रिंक्स या ठंडे पेयों को पीने में ज्यादा दिलचस्पी दिखाते हैं। सब ऐसे पीते हैं जैसे उसे पीने से उनका कद बढ़ रहा हो और कोई फायदेमंद चीज हो।

ऐसे तमाम अध्ययन आ चुके हैं जिनमें बताया जा चुका है कि कोल्ड ड्रिंक्स का लगातार सेवन करना शरीर को क्या-क्या नुकसान पहुंचा सकता है। लेकिन जब कोई चीज फैशन और श्रेष्ठता प्रदर्शित करने के भाव से जुड़ जाती है तो सेहत के सवाल हाशिये पर चले जाते हैं। हम चाहें तो इसकी जगह दूध, लस्सी, छाछ, नींबू पानी जैसी चीजें ले सकते हैं। ये पेय-पदार्थ हमारी प्यास बुझाने के साथ-साथ स्वास्थ्य के लिए भी लाभदायक हैं। गरमी के मौसम में तरबूज और खरबूज जैसे फल खाने में अच्छे लगते हैं, सेहत के लिए लाभकारी हैं और इनसे हमारे शरीर में पानी की कमी दूर होती है।

लेकिन मेरे लिए यह समझना मुश्किल है कि सब कुछ जानते हुए भी लोग अच्छी चीजों को छोड़ कर खराब चीजों का सेवन करने में ज्यादा रुचि क्यों दिखाते हैं और बीमारी को बुलावा क्यों देते रहते हैं! फिर एक दिन ऐसा आता है कि जितने रुपए हम इन चीजों को खाने में खर्च करते हैं, उससे कहीं ज्यादा धन हमें उससे पैदा होने वाली बीमारी का इलाज कराने में लगाना पड़ता है। अगर हम कोल्ड ड्रिंक की जगह पानी पीते हैं तो न तो हमें ज्यादा पैसे खर्च करने की जरूरत पड़ती है और न इसकी वजह से कोई बीमारी होती है।

गांवों में आज भी बहुत सारी समस्याएं हैं। इसके बावजूद गरमी के मौसम में गांवों में पीने के लिए पानी आसानी से मिल जाता है, लेकिन शहर में हमें पानी के लिए किन हालात का सामना करना पड़ रहा है, यह हम सब जानते हैं। घर से बाहर निकलते ही या कई बार घर में भी बिना अलग से खरीदे हम अपनी प्यास नहीं बुझा सकते। कहीं कोई ऐसी जगह नहीं दिखती है, जहां नल लगा हो और बिना पैसा खर्च किए प्यास बुझाई जा सके। ऐसे में कमाई के हिसाब को देखें तो शहरी गरीबों की प्यास कैसे बुझती होगी, इसका अंदाजा लगाया जा सकता है।

हमें जीने के लिए पानी के साथ-साथ और भी बहुत-सी चीजों की आवश्यकता होती है। आज कुएं, नदियां और तालाब इतने गंदे हो गए हैं कि जो व्यक्ति पानी खरीदने में सक्षम नहीं है, वह नदियों से पानी लेने और उसे पीने लायक बनाने के बारे में सोच भी नहीं सकता। इसके बावजूद ऐसे तमाम लोग हैं जो मजबूरी में ऐसे पानी से अपनी प्यास बुझाते हैं जो उन्हें कई बीमारियों के जाल में फंसा देता है। सवाल है कि एक नागरिक के रूप में गरीब लोगों के क्या अधिकार हैं और जीवन के लिए जरूरी पानी के इंतजाम में सरकार की क्या जिम्मेदारी है!

यह अचानक नहीं हुआ कि हमारे देश के एक बड़े हिस्से में पानी का अभाव एक संकट बन गया। पानी के टैंकरों को रेलगाड़ियां ढो रही हैं, नलों के आगे बाल्टियों की लंबी-लंबी लाइनें लगी हुई हैं। दरअसल, हमने अपनी नदियों, तालाबों, पोखरों, झीलों, कुओं को कभी इन संकट के दिनों के लिए बचाने की कोशिश नहीं की। हम बस पम्प सेटों से अपने घरों की टंकियां भरते रहे। जमीन में पानी दुबारा भरता भी तो कैसे? जमीन पर सीमेंट और दूसरी चीजों की पट्टियां बिछ रही हैं, बरसात का कोई तय वक्त नहीं रह गया है, किसान इंतजार में मर रहे हैं। दूसरी ओर, सरकार को इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता कि बोतलबंद पानी का कारोबार करने वाली कंपनियों को कभी भी पानी की किल्लत नहीं होती, कोल्ड ड्रिंक्स की कंपनियां जमीन से बेलगाम तरीके से पानी सोख रही हैं, उन्हें कोई दिक्कत नहीं है।

यह हमारा समाज तो नहीं था। उसने प्याऊ बनवाए थे, कुएं भी खुदवाए थे। हमारी संस्कृति में जल जीवन का उद्गम है। लेकिन इधर बीस या चालीस रुपए की पानी की बोतलें खरीदते हुए कोई नहीं पूछता कि सरकारी हैंडपंपों की हालत इतनी खराब क्यों है, कहीं भी सार्वजनिक जगह पर पीने के पानी की व्यवस्था क्यों नहीं है! बस अड्डों और रेलवे स्टेशनों पर पानी खरीदना नहीं पड़ता था, लेकिन आज बिना पैसे चुकाए प्यास बुझना मुश्किल है। क्या यह सरकार की विफलता भी नहीं है कि कभी कुदरत का तोहफा रहा समूचा पेयजल एक कारोबार बन चुका है!

(हिमांशी पटवा)

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First Published on June 7, 2016 12:22 am

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