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दुनिया मेरे आगे- बुद्ध और युद्ध

इसके बावजूद मैं निराश नहीं हूं। मुझे लगता है कि एक दिन वह साल भी आएगा जब हम अच्छाई का पर्व मना रहे होंगे।
Author मनोज कुमार | September 26, 2017 06:18 am
बुद्ध पूर्णिमा का शुभ मुबूर्त 190 मई से शुरु होकर 11 मई तक रहेगा।

एक बार फिर हम अधर्म पर धर्म की जीत का उत्सव मनाने की तैयारियों में जुट गए हैं। बुराइयों पर अच्छाई की जीत का पर्व सदियों से मनाते चले आए हैं लेकिन ऐसा क्या है कि ये बुराई कभी खत्म होने का नाम ही नहीं लेती है? मैं अक्सर सोचता रहा हूं कि क्या कभी ऐसा वक्त भी आएगा जब हम अच्छाइयों का पर्व मनाएंगे। वाकई विजय का पर्व! किसी की पराजय की चर्चा तक नहीं करेंगे, पराजित करना तो दूर रहा। लेकिन आखिर वह साल अब तक मेरे जीवन में नहीं आया है। इसके बावजूद मैं निराश नहीं हूं। मुझे लगता है कि एक दिन वह साल भी आएगा जब हम अच्छाई का पर्व मना रहे होंगे। इस अवसर का दीप जला रहे होंगे। सवाल है कि सदियां गुजर जाने के बाद भी जब यह संभव नहीं हो पाया तो यह होगा कैसे? मुझे लगता है कि इसमें मुश्किल कुछ भी नहीं है। बस, थोड़ी-सी दृष्टि और थोड़ी-सी सोच बदलने की जरूरत है। अब तक हम जय बोलते आए हैं और बुराई को पराजित कर उत्सव में मगन हो गए हैं। क्यों न हम किसी को पराजित करने के बजाय उस बुराई की जड़ को ढूंढ़ने की कोशिश करें, जो अपनी विषबेल बार-बार छोड़ जाती है। जो साल बीतते-बीतते फिर एक बड़े आकार में हमारे सामने खड़ी हो जाती है। सवाल यह है कि हमें बार-बार युद्ध को चुनना है या बुद्ध को? हां, यह जरूर है कि बुद्ध को चुनने से पहले युद्ध के कारणों को तलाश करना पड़ेगा।

महात्मा गांधी कहते थे कि पाप से नफरत करो, पापी से नहीं। लेकिन हमारी नजर में पाप दूजे स्थान पर है और पापी पहले। यही एक गलती बार-बार हमें बुद्ध से दूर और युद्ध के करीब ले आती है। बुराई क्या है? क्या रावण बुराई है या बुराई का प्रतीक है? हम हर वर्ष प्रतीकों को मारते हैं। भारतीय समाज उत्सवधर्मी है। वह हर अवसर को उत्सव के अनुरूप बना लेता है। दशहरा का पर्व भी इसी बात का द्योतक है। वर्तमान समाज में हमें रावण जैसा ज्ञानी तो नहीं मिल रहा है लेकिन बुराई का प्रतीक रावण हरेक कदम पर बिठा दिया गया है। एक चपरासी के घर से अवैध कमाई का लाखों रुपया, जमीन-जायदाद और जाने क्या-क्या मिलता है तो हम उसकी कमाई की ओर देखते हैं। विधिसम्मत उसे सजा दिलाने की कार्रवाई करते हैं लेकिन कभी हमने यह जानने की कोशिश नहीं की कि आखिर वह इस बुराई के रास्ते पर चलने को क्यों मजबूर हुआ? आर्थिक कमजोरी उसके भीतर के बुद्ध को हरा देती है और वह युद्ध के भाव से गलत रास्ते पर चल पड़ता है।

जब हम इस बुराई की जड़ की तरफ जाने का प्रयास करेंगे तो पाएंगे कि पहले पहल जब उसने दस या पांच हजार रुपए गलत ढंग से हासिल किए होंगे तो उसके हाथ भी कांपें होंगे और मन भी कांपा होगा। भयभीत हुआ होगा। उसे एक बार तो लगा होगा कि वह गलत कर रहा है। लेकिन जब यह प्रक्रिया एक से अधिक बार होने लगी तो वह निश्चिंत हो गया कि उसका कोई कुछ नहीं बिगाड़ सकता। माया बिगड़ते व्यक्ति के चेहरे पर चमक ला देती है। उसके ऊपर के अफसरान को भी इस बात की खबर होगी लेकिन उन्होंने भी रोकने और टोकने की हिम्मत नहीं की होगी। करते भी तो कैसे? उन्हीं को देखकर उसके भीतर लोभ जागा। उसके भीतर का बुद्ध विलुप्त होता गया और वह युद्ध के भाव से जीवन को जीने लगा। यह वही क्षण है जहां से हम बुराई की जड़ को ढूंढ़ सकते हैं। भ्रष्टाचार की ओर कदम बढ़ाते आदमी को समझने की कोशिश कर सकते हैं कि आखिर उसने गांधी का रास्ता क्यों छोड़ा? वह रावणरूपी बुराई का प्रतीक क्यों बन गया?

जिस दिन हम इस बुराई की जड़ पर चोट करेंगे, यकीनन हमें हर साल रावण के वध के लिए हथियार नहीं उठाना पड़ेगा। वह दिन भी दूर नहीं होगा जब हम अच्छाई का पर्व मनाएंगे। एक ऐसा पर्व, जिसमें किसी की पराजय नहीं होगी बल्कि चौतरफा जय और जय होगी। इसे करने के लिए अपने भीतर गांधी और बुद्ध को जिंदा करना होगा। कबीर और तुलसी को समझ कर अपने जीवन में उतारना होगा। भौतिक सुविधाओं के फेर में आज बहुतेरे लोग अपना धरम-करम भूल गए हैं। जिस ‘कनक’ के पाने से लोग बौरा जाते हैं, उसकी संख्या बढ़ रही है। ऐसा कनक जीवित व्यक्ति की भी आत्मा को मार देता है। हमें तय करना होगा कि हम युद्ध के रास्ते पर चलेंगे या बुद्ध के रास्ते पर? हमें रावण बनना है या राम? ऐसा क्यों है कि आम व्यक्ति बुराइयों की अंधेरी राह पर बढ़ता जाता है और जब उसे यह समझ आती है तब बहुत देर हो चुकी होती है। जब तक हम अपने भीतर के दानव को नहीं मारेंगे, हमारे भीतर का मानव जागृत नहीं होगा। हम गांधी और कबीर बन कर एक नए समाज का निर्माण करेंगे या जीवन भर युद्ध के रास्ते पर चलते रहेंगे! यह तय करना जरूरी हो गया है।

 

 

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