ताज़ा खबर
 

दुनिया मेरे आगे- पूर्वग्रह के दंश

बाकी मुल्कों के मुकाबले भारत में औरतों को कितने ज्यादा हकूक हासिल हैं! यह तर्क भी दीजिए कि यहां की औरतें और लड़कियां काफी पहले से ही सशक्त हैं, रजिया सुल्तान ने कैसे अपने दम पर सत्ता हासिल की थी!
Author August 30, 2017 05:35 am
प्रतीकात्मक तस्वीर

जीनत

किसी सवाल पर मैं एक मर्द और एक औरत को कहती हूं कि आप दोनों अपने मन में एक लंबी रेखा खींचिए और दौड़ लगाइए। दौड़ने के रास्ते मैं आपको बताती चलती हूं। आपको अपनी दौड़ उत्तरी सिरे से शुरू करनी है। आधुनिक अमेरिका, फिर बेहतर जिंदगी के लिए छटपटाते और लैटिन अमेरिका के कीचड़ से सने रास्ते से होते हुए। विकसित और आधुनिक यूरोप का एक चक्कर लगा कर अफ्रीका के शोषण के घाव से बहते मवाद से गुजरते हुए एशिया के चक्कर लगाने हैं। इस बीच जापानी सैनिकों द्वारा कोरिया की औरतों के साथ जो किया गया था, उसकी पूरी जानकारी जुटानी है। खाड़ी देशों की औरतों के वास्तविक हालात के सबूत साथ लेकर अफगानिस्तान से होते हुए पाकिस्तान और फिर भारत या इंडिया में प्रवेश करना है। ये हो गया! अब आप दोनों ने दौड़ के दौरान जो अनुभव किया है, उसके आधार पर बताइए कि बाकी मुल्कों के मुकाबले भारत में औरतों को कितने ज्यादा हकूक हासिल हैं! यह तर्क भी दीजिए कि यहां की औरतें और लड़कियां काफी पहले से ही सशक्त हैं, रजिया सुल्तान ने कैसे अपने दम पर सत्ता हासिल की थी! वे कहानियां छिपा लीजिएगा कि हमारे यहां जिन्हें ईश्वर माना जाता रहा है, उन्होंने अप्सराओं का क्या किया था या दूसरी महिलाओं के प्रति क्या बर्ताव किए थे। ये सब जरूर छिपा लीजिएगा, नहीं तो शायद हमारी सभ्यता का सत्य उन सभी देशों के सामने आ जाएगा, जिनकी आपने दौड़ लगाई है। वह वर्तमान सत्य भी छिपाने की कोशिश कीजिएगा जिसमें भारत की देह पर बड़े-छोटे घाव से बहते मवाद में आज भी वर्ण व्यवस्था के कीड़े बिलबिला रहे हैं। इस वजह से आज भी दलित-पिछड़ी जातियों की स्थिति में कोई खास परिवर्तन नहीं आया है।

सवाल है कि आजादी के इतने दशकों बाद क्या हम लैंगिक पूर्वग्रह से उबर पाए हैं या अभी भी उनमें उलझे हुए हैं? क्यों स्त्रियां आगे बढ़ कर भी पीछे रह जाती हैं? दुगना श्रम करके भी क्यों अश्रमिक कहलाती हैं? जहां पुरुष आठ घंटे काम करके भी ‘परिवार का अहम स्तंभ’ कहलाते हुए गर्व महसूस करता है, वहीं उस घर की महिला उससे दुगना यानी आठ नहीं, सोलह घंटे बिना रुके काम करती है, फिर भी वह सिर्फ आश्रित और स्त्री बन कर रह जाती है।स्त्री आज भी एक प्रतियोगिता में बस दौड़ रही है। लेकिन कहीं न कहीं प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से स्वीकार कर चुकी है कि वह कुछ नहीं करती, क्योंकि उसे यह सोचने का अवसर ही नहीं दिया जाता है कि वह कुछ करती है। उदाहरण के रूप में मास्टर शेफ संजीव कपूर को ले सकते हैं जो होटल की रसोई में खाना बनाने का काम करते हैं और उनकी तनख्वाह दो मिलियन डॉलर है। सवाल यह है कि जो काम संजीव कपूर होटल में करते हैं, वही काम घर में जब स्त्रियां करती हैं तो वेतन क्या, एक अहम स्थान तक नहीं दिया जाता है। ऐसा क्यों है, इसका जवाब हम सबके पास है। इसी तरह पुरुषों के काम में सहयोग के लिए आॅफिस में सेक्रेटरी होता है, जिसे निर्धारित वेतन मिलता है। लेकिन आमतौर पर उसी तरह के सहयोग घर की स्त्री कर रही होती है। बल्कि कई बार उससे ज्यादा करती है। घर का सारा हिसाब-किताब उसके पास होता है। वह होटल प्रबंधन की पढ़ाई किए बिना घर में किसी दफ्तर के सेक्रेटरी से बेहतर प्रबंधन करती है। तो क्या यह मान लिया जाए कि पुरुष को मुफ्त की नौकरानी की आवश्यकता होती है?

स्त्रियों के लिए क्या दृष्टि बनाई गई है और वह कितनी सक्षम है, इसे दोहराने की जरूरत नहीं है। बेशक बाहर काम करने वाली स्त्रियां आत्मनिर्भर होती हैं। मगर घरों में काम करने वाली ‘अवैतनिक’ स्त्रियां भी बहुत ज्यादा सक्षम होती हैं। उनके पास जितना व्यावहारिक तजुर्बा होता है, वह किताबी ज्ञान से परे होता है। मां किसी बच्चे के हाव-भाव और क्रियाएं देख कर उसकी सांकेतिक भाषा को समझ जाती है, जो उस परिवार के पुरुष के लिए आम बात नहीं है। विचित्र है कि अगर कोई पुरुष अपने बच्चे की देखभाल के लिए आया के रूप में किसी महिला को रखता है, तो उसे वेतन देता है। लेकिन वही काम जब मां करती है तो उसका कोई मोल नहीं, क्योंकि वह उसका बच्चा है, उसी की जिम्मेदारी है। ऐसा लगता है कि बच्चे के पैदा होने में पुरुष का कोई हाथ नहीं होता है!दरअसल, केवल समय बदला है। पूर्वग्रह का दंश आज भी मौजूद है। आए दिन समाचार चैनलों और अखबारों में महिलाओं के खिलाफ हिंसक गतिविधियां, कत्ल और आत्महत्या की खबरें सुनते-पढ़ते हैं। ये क्रूरताएं किन चीजों के परिणाम हैं? भारत में अभी भी लगभग अस्सी प्रतिशत स्त्रियां चुपचाप पूर्वग्रहों की लीक पर अपनी जिंदगी गुजार रही हैं। आए दिन आहत होती हैं, लेकिन आवाज उठाने के लिए तैयार नहीं होती हैं। अगर स्त्रियां आत्मनिर्भर होंगी और अपने लिए आवाज उठा पाएंगी, तब शायद कोई भी उन्हें हीन दृष्टि से नहीं देखेगा। इसके लिए खुद के भीतर जीने की चाह पैदा करनी होगी।+

 

 

 

Hindi News से जुड़े अपडेट और व्‍यूज लगातार हासिल करने के लिए हमारे साथ फेसबुक पेज और ट्विटर हैंडल के साथ गूगल प्लस पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News App

  1. No Comments.