April 28, 2017

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भरोसे का जीवट

वे एक व्यवस्था का रूपक होती हैं। उत्तर प्रदेश में आंबेडकर नगर जिले के घुघुलपट्टी गांव में गुजरे अपने बचपन का वह हिस्सा मुझे याद रह गया, जिसमें मैं कई वजहों से पापा के प्रति रोष से भरी होती थी।

Author April 18, 2017 11:46 am
प्रतिकात्मक चित्र।

कई बार कुछ घटनाएं, हालात या जीवन-स्थितियां व्यक्तिगत नहीं रह जाती हैं। वे एक व्यवस्था का रूपक होती हैं। उत्तर प्रदेश में आंबेडकर नगर जिले के घुघुलपट्टी गांव में गुजरे अपने बचपन का वह हिस्सा मुझे याद रह गया, जिसमें मैं कई वजहों से पापा के प्रति रोष से भरी होती थी। तब पापा ने हम भाई-बहनों को मां के साथ गांव में छोड़ दिया था। घर में बड़े होने के नाते पापा के ऊपर सबकी जिम्मेदारी थी और दिल्ली जैसे शहर में सबको साथ रख पाना तब उनके लिए मुश्किल था। इसलिए उस बार गरमी की छुट्टियों के दौरान जब हम गांव गए तो फिर छुट्टियों के बाद भी वापस दिल्ली नहीं लौटे। हमें गांव के ही एक मध्य विद्यालय की आठवीं कक्षा में दाखिला दिलवा दिया गया। जब भी कोई दिल्ली से हमारे गांव आता, तो पापा हमारे लिए जरूरत की कुछ चीजें भेज देते थे। पंद्रह-सोलह साल की उम्र में दीदी पढ़ने के साथ-साथ घर में चूल्हे पर सुबह-शाम का खाना बनाना सीख गर्इं। रात को जब ढिबरी जला कर पढ़तीं, तब आधे एक घंटे के बाद अइया चिल्लातीं थी कि ‘बंद करो ये ढिबरी… कितना तेल जला दिया इन लड़कियों ने!’ गांव में छोड़ दिए जाने का गुस्सा पहले ही मन में दबा था। ऐसे में जब भी दइया यह बोलतीं तो बदले में मैं भी चिल्ला कर बोल जाती कि अभी तो और भी तेल जलेगा! दीदी को अइया के गुस्से से बचाने के लिए मैं रात को दीदी के साथ बैठ कर पढ़ने लगी। इसके बदले में सोने से पहले मैं दीदी से एक कहानी सुनती थी।

वे कहानियां कितनी उपयोगी साबित हुर्इं, यह अब समझ में आता है। याद है कि तब दीदी ने कैसे बातों-बातों में अलंकार के बारे में समझा दिया था। तब स्कूल में सरकंडे या नरकट की कलम से लिखना होता था। छठी कक्षा से पहले कोई भी विद्यार्थी डाठ का इस्तेमाल नहीं कर सकता था। हमें सरकंडे की कलम गढ़नी नहीं आती थी। स्कूल में कई बार इस बात के लिए डांट पड़ती थी कि लिखते हुए कॉपी पर स्याही क्यों फैल जाती है। मां हमारे लिए कलम गढ़ने की कोशिश करती थीं, लेकिन वह ठीक से नहीं हो पाता। दरअसल, उन्हें अपने लिए कभीकलम गढ़ने का मौका नहीं मिला था, क्योंकि वे नहीं पढ़-लिख सकी थीं।

खैर, उस दौर के कुछ साल गुजरने के बाद हम दिल्ली वापस ले आए गए। सही है कि इस शहर ने हमें बहुत कुछ दिया है और अब भी देता आ रहा रहा है। लेकिन तब गांव में बीते समय के कारण जो सोचने-समझने का नजरिया बना, वह अब भी हमारे जेहन में है। आज उन स्थितियों को याद करती हूं तो वे महज वक्त के बिखरे पन्ने नहीं, बल्कि अब जिंदगी की बनती किताब का जरूरी हिस्सा लगती हैं। कुछ समय के लिए शहर छूटना, पापा से गुस्सा, अइया की बातों से चिढ़ना… इन सब बातों का समाजशास्त्रीय आधार अब समझ में आता है। सोचती हूं तो लगता है कि अइया पर भी तो अभाव के बीच कम संसाधनों में ही पूरे परिवार के लिए चीजें बचाने और घर चलाने का दबाव होता होगा। ऐसी ही न जाने कितनी ही अइया, दीदी, मां और पिता की वजह से तमाम लड़कियां आज अलग-अलग मुकाम तक पहुंच सकी हैं, अपनी जिंदगी की जिम्मेदारी उठा रही हैं, पहचान के लिए संघर्ष कर रहीं हैं। वे तमाम विपरीत हालात के बावजूद लड़ रही हैं, क्योंकि उन्हें अपने घरों में आज भी वे मांएं दिखती हैं जो खुद कभी पढ़-लिख नहीं सकीं, लेकिन अपनी बेटियों की पढ़ाई और नौकरियों के लिए लड़ रही हैं।

इसके अलावा भी अलग-अलग इलाकों में घरों से न जाने कितनी लड़कियां और महिलाएं रोज पढ़ाई करने या काम पर निकलती हैं। अपने सामने पैदा होने वाले तमाम द्वंद्व से टकराती हैं, कई बार उलझ कर टूटती और बिखरती भी हैं, लेकिन सब कुछ खत्म होने के पहले फिर अपने भीतर मौजूद भरोसे के साथ संभलती हैं और खड़ी होकर अपने सफर पर आगे बढ़ जाती हैं। दरअसल, ये लड़कियां अब समझने और जानने लगी हैं कि जिंदगी सस्ते में नहीं गंवाई जा सकती। अब ‘प्रोफेशनल’ करार देकर या ‘कॅरियर को प्राथमिकता देने वाली महिलाएं’ होने का तमगा देकर इन लड़कियों के हौसले को तोड़ा नहीं जा सकता और न इनका रास्ता रोका जा सकता है। सवाल यह भी है कि लड़कियों को लेकर एक खास तरह के दोहरे नजरिए को बनाए रखने से किसके हित सध रहे हैं! किसी का भी अपने भरोसे आगे बढ़ना एक सभ्य समाज की पहचान होना चाहिए। तो क्या यह जरूरी नहीं कि इस बदलते समय में एक दूसरे के साथ खड़ा हुआ जाए? उन रूढ़ियों पर सवाल उठाया जाए, उन्हें खारिज किया जाए जो किसी के भी साथ असमानता और शोषण के व्यवहार को बढ़ावा देती हैं!

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First Published on April 18, 2017 1:09 am

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