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दुनिया मेरे आगेः जगह का समाजशास्त्र

किसी जगह का इस्तेमाल कौन कर सकता है और कौन नहीं- यह बात हमें उस समाज के बारे में कई पहलुओं को समझने में मदद कर सकती है।
Author June 23, 2017 02:52 am
प्रतीकात्मक तस्वीर

किसी जगह का इस्तेमाल कौन कर सकता है और कौन नहीं- यह बात हमें उस समाज के बारे में कई पहलुओं को समझने में मदद कर सकती है। किसी जगह और उसके साथ उस समाज के सदस्यों की अंत:क्रिया यह दिखाती है कि कोई ‘जगह’ मात्र एक ‘भौतिक स्पेस’ न होकर, इससे ज्यादा कुछ होती है। उस जगह का कौन किस तरह इस्तेमाल कर सकता है, इस बात से संबंधित व्यक्ति की समाज में जो स्थिति है, उसे समझा जा सकता है। उस दिन मैं और मेरी दोस्त जिंदगी की रोजमर्रा की उथल-पुथल से थक कर शांत हो गए थे और जल्दी घर पहुंचने की जद्दोजहद करने के बजाय सड़क किनारे लगी लकड़ी की एक बेंच पर थोड़ी देर बैठ कर सुस्ताने लगे। शाम के करीब छह बजे थे। हमने आपस में बातें करनी शुरू कर दीं। तमाम सपने, शहरों की दुनिया, संबंधों की जटिलताएं, प्रेम के मायने, रिश्तों के अर्थ, वजीराबाद का जाम, पारिवारिक जिम्मेदारियां और इन सबके बीच कुछ पलों के लिए बेपरवाह हो जाने की चाहत…! यही सब था हम दोनों की बातों में। कुछ कहते हुए मेरी दोस्त ने एक बात थोड़े भावनात्मक आवेग में रखी। उसका स्वर सामान्य से थोड़ा ऊंचा था। मैं उसे सुन रही थी।

हमने गौर किया कि पास से गुजरने वाले ज्यादातर लोग हमें अजीब तरह से देखते हुए निकल रहे हैं। लड़कों का एक समूह, जिसमें एक लड़की भी थी, हमें देख कर हंस रहा है। हम कुछ देर सोचते रहे कि इन्हें क्या हो रहा है! अक्सर बातें करते-करते सहज होने पर मैं अपने पांव कुर्सी या बेंच के ऊपर रख कर बैठ जाती हूं या पाल्थी मार लेती हूं। उस दिन भी मैं वैसे ही बैठी थी और मेरे एक हाथ की मुट्ठी बंधी हुई थी और वह घुटने के ऊपर था। हमने सोचा कि शायद कुछ लोगों को दो लड़कियों का सड़क किनारे इस तरह बैठना अजीब लग रहा है या फिर दोस्त का भावुक होकर मुझसे कुछ कहना आकर्षण का केंद्र बन रहा है। या शायद हमारी बातों में जो मुद्दे हैं वे सामान्य तौर पर जोर से बात करने के लायक नहीं हैंं। लेकिन जब घड़ी पर निगाह गई तो रात के नौ बज चुके थे।

तो क्या लोगों की हैरानी की वजह यह वक्त था? लंबे समय से हम विश्वविद्यालय के अपेक्षाकृत खुले माहौल में रह रहे हैं और अब इस तरह बात कर पाना हमें उस दिन कठिन नहीं लग रहा होगा। फिर भी हमने आपस में बात की कि क्या दो लड़के ठीक ऐसे ही बात कर रहे होते तो लोगों का ध्यान इसी तरह आकृष्ट होता!

लेकिन ऐसी बातें एक ‘जगह’ के इस्तेमाल पर भी उस समाज में निहित जेंडर आधारित दृष्टि और उसमें मौजूद भेदभाव को उजागर करती हैं। बचपन में गली के किसी कोने पर खड़े होकर बात करने की मनाही, जोर से आवाज देकर अपने ही दोस्त या भाई-बहन को पुकारने पर रोक-टोक, क्योंकि हम ‘बड़े’ हो रहे थे और जिस दोस्त को पुकारना था, वह लड़का था। स्कूल के लिए झुंड में निकलना और छुट्टी के वक्त उसी झुंड में लौटना। स्कूल में बाथरूम जाने के लिए भी किसी लड़की दोस्त को साथ ले जाने की बन गई आदत, खेल के मैदान में एक साथ हाथ पकड़ कर ‘चेन-चेन’ खेलने की मनाही। इस तरह छीन लेते हैं हम एक दूसरे के साथ सहज रूप से साझा करती आई बहुत-सी ‘जगहों’ को। ये जगहें भले ‘भौतिक स्पेस’ होती हैं, लेकिन इन ‘जगहों’ के साथ हम जिस तरह की अंत:क्रिया करते हैं या करेंगे, उससे हम समाज के अलग-अलग लोगों की जगहें भी तय करेंगे।

इसी संदर्भ में एक नया अनुभव जोड़ा हमारे उस दोस्त ने, जिसने एक दिन हमें परेशानी में देख हमसे ‘अपनी जगह’ को साझा किया और हमें एक भौतिक जगह के इस्तेमाल पर सोचने के लिए मजबूर कर दिया। एक दिन हम खेल कर घर जाने से पहले ‘वॉशरूम’ जाने के लिए गए तो देखा कि लड़कियों के ‘वाशरूम’ पर ताला लग चुका है। मुझे नहीं पता कि क्यों कभी-कभी सुरक्षा का हवाला देकर उस ‘वॉशरूम’ पर छह बजे ताला जड़ दिया जाता है और कभी आठ बजे तक भी वह खुला रहता है। खैर, यह देख हमारे दोस्त ने कहा कि तुम दूसरे वॉशरूम में चले जाओ। मैंने पूछा कि लेकिन दूसरा तो कोई वॉशरूम है ही नहीं यहां, तो उसने पुरुषों के वॉशरूम की ओर इशारा किया। मैंने कहा- ‘अरे वह तो तुम्हारा है!’ उसने कहा कि उसके इस्तेमाल में तुम्हें दिक्कत क्या है! मैंने कहा कि हम उसे कैसे इस्तेमाल कर सकते हैं? उसने हमें बड़े ही सहज रूप से समझाया कि हम भी उस जगह का इस्तेमाल कर सकते हैं। उस दिन उस दोस्त ने एक ‘जगह’ के इस्तेमाल के नए आयाम हमारे सामने खोले, जिसे देखने में हम अपने समाजीकरण के कारण असमर्थ रहे थे। उसके दिमाग में वह ‘उसकी जगह’ नहीं थी, बल्कि जरूरत पड़ने पर इस्तेमाल किया जाने वाला एक ‘भौतिक स्पेस’ मात्र था। आखिर घर में आमतौर पर ऐसा होता ही है। इस तरह किसी ‘जगह’ के साथ अंत:क्रिया का भी पूरा एक समाजशास्त्र है, जो हमें किसी खास स्थिति में खास तरह से व्यवहार करने या प्रतिक्रिया देने के लिए तैयार करता है।

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