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दुनिया मेरे आगे: फड़ और पगड़ी का शाहपुरा

तीनों बारहठ क्रांतिकारियों की दुर्लभ निशानियों, चित्रों और उस इतिहास का एक-एक पृष्ठ यहां संजो कर रखा गया है।
Author January 20, 2017 02:56 am
प्रतीकात्मक तस्वीर।

सुधीर विद्यार्थी

राजस्थान के शाहपुरा और भीलवाड़ा की यात्रा पर निकला हूं। कंक्रीट के जंगल सरीखी दिल्ली को पार करते ही हरियाणा की धरती का हरित सौंदर्य आंखों को सुकून देने लगा है। पर ट्रेन के राजस्थान में प्रवेश करते ही सूनापन ओढ़े उदास पहाड़ों की शृंखला मुझे अवसाद से भर देती है। हरियाली के मामले में ये पहाड़ उत्तराखंड की भांति संपन्न नहीं हैं। अजमेर पहुंचते-पहुंचते शाम का सुरमई रंग अधिक गाढ़ा होने लगा है। शाहपुरा से ठीक पहले जिस नकोडा होटल में हम ठहरे वह खेतों के मध्य बना है। उसके ठीक पीछे एक झील का दृश्य सवेरे की अनमनी रोशनी में बहुत आकर्षक लग रहा है। यहां उत्तर भारत की तरह सर्दी नहीं है। झुकझुके में भी कोहरे की कोई पर्त दिखाई नहीं देती। थोड़ी ही देर में चटख धूप अपना साम्राज्य विस्तारित करने की योजनाओं में संलग्न हो चली है। दूर तक झील के नीले पानी की फैली चादर को मैं एकटक देख रहा हूं, गोया जमीन पर आसमान बिन बुलाए उतर आया हो।

दूर तक जल का झिलमिल फैलाव। यह सरेरी डैम है। सरेरी गांव में बना यह डैम भीलवाड़ा के बड़े बांधों में से एक है। सुना है कि राजस्थान में बादल बहुत कम आते हैं। पर्यावरणविद अनुपम मिश्र ने एक बार कहा था कि यहां के लोग बादलों को बहुत प्यार करते हैं। वे पानी की हर बूंद की कीमत समझते हैं इसलिए वे बारिश के पानी को बड़े करीने से बचा कर पूरे साल काम चलाते हैं। यहां बादलों के नाम भी हैं। प्यार से रखे गए नाम। जैसे ‘लू बादड़ी’ (लू के मौसम में आने वाला बादल)। इस पर एक काव्य भी रचा गया है। शाहपुरा में क्रांतिकारी केसरीसिंह बारहठ, जोरावर सिंह बारहठ और ‘बनारस षड्यंत्र केस’ के शहीद प्रतापसिंह बारहठ के भव्य स्मारक देख सुखद अनुभूति हुई। केसरी सिंह क्रांतिकारी तो थे ही, राजस्थानी भाषा में भी एक रचनाकार के तौर पर उनका बहुत ऊंचा स्थान है। साहित्य अकादेमी ने ‘भारतीय साहित्य के निर्माता’ शृंखला में उनके कृतित्व पर एक पुस्तक प्रकाशित की है। उनके भाई जोरावरसिंह ने रासबिहारी बोेस की योजनानुसार 23 दिसंबर 1912 को दिल्ली के चांदनी चौक में वायसराय लार्ड हार्डिंग पर बम फेंका था।

केसरीसिंह के पुत्र प्रताप की शहादत 24 मई 1918 को बरेली के केंद्रीय कारागार में हुई। इन शहीदों की स्मृति में आयोजित एक कार्यक्रम में मुझे लोक चित्रकला फड़ की एक पेंटिंग भेंट की गई। वैसे फड़ कपड़े पर बनाई गई कलाकृति होती है जिसमें किसी लोकदेवता विशेष रूप से पाबू जी या देवनारायण की कथा का चित्रण किया जाता है। फड़ को लकड़ी पर लपेट कर रखा जाता है। इसे धीरे-धीरे खोल कर भोपा या भोपी द्वारा लोक देवता की कथा को गीत व संगीत के साथ सुनाया जाता है। यहां भोपा का अर्थ किसी देवता का पुजारी होता है। फड़ बांचने वाले भोपा नामक विशेष जाति के होते हैं। शाहपुरा के विशाल पियूूणियां जलाशय की अथाह जलराशि बेहद आकर्षक है। रेगिस्तान में रहने वाले समाज के लिए जमीन पर कुंड बना कर पानी का संचय करना कोई नई बात नहीं है। शायद यही राजस्थान की धरती पर हजारों साल से चली आ रही रेनवाटर हार्वेस्ंिटग है जो वर्तमान जल संकट के समय में भी बेहद कारगर है। मुझे अनुपम मिश्र की पुस्तक ‘आज भी खरे हैं तालाब’ याद आ रही है जो पिछले पंद्रह-बीस वर्षों में सबसे ज्यादा पढ़ी गई किताब है।

शाहपुरा के चारों ओर बने विशाल द्वारों (फाटक) में से एक के भीतर से गुजरते हुए हम उस जमाने की सुरक्षा-व्यवस्था से दो-चार होते हैं, जिसे तबके सामंत शासकों ने निर्मित कराया था। कभी एक प्राचीर से घिरे शाहपुरा की स्थापना 1629 में हुई थी। थोड़ी ही देर में हम बारहठ परिवार की उस हवेली के भीतर पहुंचे जो अब क्रांतिकारी बारहठ परिवार की विरासत के तौर पर अद्भुत संग्रहालय में तब्दील कर दी गई है। तीनों बारहठ क्रांतिकारियों की दुर्लभ निशानियों, चित्रों और उस इतिहास का एक-एक पृष्ठ यहां संजो कर रखा गया है। इनकी आवक्ष प्रतिमाओं पर पगड़ियां शोभायमान हैं। पगड़ी राजस्थान के पहनावे का अभिन्न अंग है। यह लगभग 18 गज लंबे और 9 इंच चौड़े अच्छे रंग के कपड़े के दोनों सिरों पर व्यापक कढ़ाई की गई एक पट्टी होती है। पगड़ी सिर के चारों ओर विभिन्न और विशिष्ट शैलियों में बांधी जाती है। यहां किसी व्यक्तिके समुदाय और जाति को उसकी पगड़ी के रंग तथा उसे बांधने की शैली से कुछ हद तक पहचाना जा सकता है। पगड़ियों के प्रकार में पेंचा, साफा, फेंटा, पोतिया होती हैं। पगड़ी में पीला, हरा, लाल और बैंगनी रंगों के साथ सफेद बिंदियां हैं। बाजार में अब बनी-बनाई पगड़ियां भी हैं, पर उनमें साफे वाला सौंदर्य और धज कहां। भीलवाड़ा में सरकारी इमारतों की चहारदीवारी और पुलों की रैलिंग पर स्थानीय लोक चित्रकारी फड़ का चित्रांकन देखना सुखद है। नगर को लोक रंगत प्रदान करने का यह अनूठा प्रयोग मुझे बहुत खींचता है।

 

 

 

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