March 28, 2017

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दुनिया मेरे आगे- अनोखा संगम

मौत की घड़ी के चुनाव यानी स्वैच्छिक मृत्यु को लेकर कानूनी विशेषज्ञों और मानवाधिकार संरक्षकों के बीच चल रही बहस के पक्ष और विपक्ष दोनों में ही अपने तर्क हैं।

Author March 6, 2017 06:00 am
प्रतीकात्मक तस्वीर

अरुणेंद्र नाथ वर्मा

परिवार में किसी विशेष आयोजन पर जब मैंने अपने एक डॉक्टर मित्र को आमंत्रित किया तो उन्होंने अपनी मोबाइल डायरी पर एक नजर डाल कर क्षमा मांग ली। बताया कि वे एक सप्ताह बाद की उस तिथि पर आमंत्रण के नियत समय पर व्यस्त रहेंगे। वे एक कुशल स्त्रीरोग विशेषज्ञ हैं। कहीं भी नियत समय पर पहुंच जाने का वादा नहीं करते। बस इतना कह पाते हैं कि बच्चों और मृत्यु के आने का समय तय नहीं होता, अन्य व्यस्तता न हुई तो अवश्य आऊंगा। लेकिन इस बार एक सप्ताह आगे के नियत समय पर व्यस्त रहेंगे, उन्हें कैसे मालूम था? पूछने पर उन्होंने बताया कि एक नहीं, दो महिलाओं के सामान्य प्रसव उस दिन शाम को छह से आठ बजे के बीच उन्हें कराने थे। मेरे कौतूहल के उत्तर में बोले कि आजकल सामान्य प्रसव का अर्थ ‘सीजेरियन सेक्शन आॅपरेशन’ हो गया है। अब तक जिसे प्राकृतिक या समान्य प्रसव समझा जाता था, अब वही असामान्य है। मेरा भी यह मानना रहा है कि ज्यादातर मामलों में यह अधिक फीस वसूलने के लिए डॉक्टरों या अस्पतालों का षड्यंत्र भर होता है। लेकिन उन्होंने बताया कि जन्म की तिथि और समय का निर्णय अब आमतौर पर जच्चा और उसके परिजनों की मर्जी से होता है।

मुझे थोड़ा आश्चर्य हुआ। अभी तक जीवन और मौत की घड़ी कुदरती तौर पर तय होती रही है। मौत की घड़ी के चुनाव यानी स्वैच्छिक मृत्यु को लेकर कानूनी विशेषज्ञों और मानवाधिकार संरक्षकों के बीच चल रही बहस के पक्ष और विपक्ष दोनों में ही अपने तर्क हैं। विपक्ष के मुख्य तर्क विशेष परिस्थितियों में स्वैच्छिक मृत्यु की वांछनीयता को लेकर नहीं, बल्कि उसके दुरुपयोग की आशंका को लेकर दिए जाते हैं। लेकिन जन्म के समय का स्वैच्छिक चुनाव जिन कारणों से किया जाता है, वे अजीबोगरीब हैं।प्रसव के समय के चुनाव से पहले प्रश्न उठता है कि प्रसव प्राकृतिक रूप से क्यों न होने दिया जाए। पीड़ारहित प्रसव या शल्यक्रिया द्वारा प्रसव करके प्रकृति के काम में दखलंदाजी क्यों की जाए! मेरे मासूम प्रश्न के उत्तर में मेरे मित्र ने हंस कर कहा- ‘जब पीड़ारहित प्रसव संभव हो तो कौन ऐसा नहीं चाहेगा!’ मैंने कहा कि शायद प्रसव पीड़ा मां और शिशु के बीच एक जीवन भर का स्नेह-सूत्र बांध देती है तो इसे उन्होंने परंपरावादी और अवैज्ञानिक सोच बताया। वेदना का उपचार करने के लिए इतने प्रकार की औषधियां उपलब्ध हैं तो खामख्वाह प्रसव की वेदना क्यों सही जाए। उसे मातृत्व सुख से जोड़ने की बात वही कर सकता है, जिसका स्वयं कुछ दांव पर न लगा हो। मैं सकुचा गया।

शायद प्रसव वेदना की पैरवी मेरी पुरुषवादी स्वार्थी दृष्टिकोण की परिचायक ही थी। बहरहाल, पीड़ारहित प्रसव के लिए एक अच्छे प्रसूति केंद्र की आवश्यकता तो होती ही है। उस केंद्र में कुशल एनेस्थेटिस्ट यानी बेहोशी विशेषज्ञ, अच्छे सर्जन और अच्छे देखरेख उपकरण (मॉनीटर्स, जिन पर मांसपेशियों और भ्रूण की स्थिति लगातार देखी जा सकती हो) होना भी आवश्यक है। जाहिर है कि यह सब खर्चीला होगा। इसलिए पीड़ारहित प्रसव अभी भारत में आम नहीं हुआ है। डॉक्टर भी इसके विशेष समर्थक नहीं हैं, क्योंकि ऐसे प्रसव के बीच यदि सीजेरियन की आवश्यकता पड़ी तो गलतफहमी हो सकती है कि शल्यक्रिया अनावश्यक होते हुए भी कर दी गई। लेकिन अगर यह होना ही हो तो अनिश्चय और अप्रत्याशित के बीच झूलने के बजाय प्रसव का समय खुद चुन लेने में हर्ज क्या है! यों भी यह विकल्प एक सीमित दायरे के बीच की तिथियों में ही मिलता है। वह भी पूर्वानुमान वाले समय के हफ्ते या दस दिन पहले। इस समय के बाद प्रसव को टालना अभी तक संभव नहीं हुआ है।

प्रसव की घड़ी का चुनाव कभी-कभी कामकाजी महिलाओं की व्यावसायिक और नौकरी संबंधी व्यस्तताओं से निर्देशित होता है। पर जन्म की घड़ी का चुनाव करने में सबसे महत्त्वपूर्ण कारण ग्रह-नक्षत्रों की स्थिति होती है। यह व्यवस्था विसंगतियों का एक बहुत मजेदार मिश्रण मालूम होती है। पोथी-पत्रा विचार से किसी शिशु के संसार में पदार्पण करने के लिए सबसे सौभाग्यशाली क्षण का चुनाव पारंपरिक आस्था और संस्कृति के साथ अधुनातन विज्ञान का अनोखा सम्मिश्रण मालूम होता है।भारत में सदियों से मान्यता रही है कि ‘करम गति टारे नहीं टरे’। दलील दी जाती है कि मुनि वशिष्ठ से पंडित ज्ञानी ने सोच के लगन धरी, तब भी प्रारब्ध ही भारी पड़ा। हालांकि इसके लिए मुनिवर नहीं, बल्कि वह बेचारी घड़ी दोषी पाई जाती है, जिसकी सही समय दिखाने की क्षमता जाती रही। अब इसे तकनीकी खामी समझिए या प्रारब्ध का षड्यंत्र। मुझे लगता है कि भविष्य में प्रसव की लग्न विचारने के बाद किसी एटमिक घड़ी से त्रुटिहीन समय दिखाने का प्रबंध भी किया जाएगा, ताकि प्रायोजित प्रसव प्रारब्ध और घड़ी के सम्मिलित ‘षड्यंत्र’ का शिकार न होने पाए! अब यह अलग बात है कि विज्ञान पर जब आस्था का सवाल हावी होगा तो वैज्ञानिक दृष्टि कसौटी पर होगी!

 

 

 

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First Published on March 6, 2017 6:00 am

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